क्रिकेट की दुनिया में महान खिलाड़ियों के सर्वोत्तम लक्षणों में एक लक्षण यह भी माना जाता है कि आउट होने पर वह खिलाड़ी अंपायर के फैसले की प्रतीक्षा नहीं करता है, ख़ुद मैदान से चला जाता है. इस पैमाने पर वैसे तो कई खिलाड़ी हैं लेकिन सबसे ऊपर ऑस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज़ा एडम गिलक्रिस्ट का नाम आता है. 2003 के विश्व कप में श्रीलंका के खिलाफ खेलते हुए गिलक्रिस्ट के बल्ले से डिसिल्वा की गेंद छूकर पीछे गई. अंपायर को लगा कि गेंद पैड पर लगी है. इसलिए आउट नहीं दिया लेकिन गिलक्रिस्ट ख़ुद पिच छोड़ कर चले गए. महान खिलाड़ी खेल के ईमान से समझौता नहीं करते हैं. वो थर्ड अंपायर या चुनाव आयोग के लिए मैदान में खड़े नहीं रहते हैं.
राजनीति में गिलक्रिस्ट नहीं होते इसलिए 8 अगस्त की रात चुनाव आयोग के सामने बीजेपी के अनेक मंत्री और कांग्रेस के बड़े नेताओं की आवाजाही को लेकर सवाल तो एक ही होना चाहिए था कि ये जो एमएलए तोड़ो आंदोलन चल रहा है उसके पीछे सत्ता ने कौन सा खेल खेला है. सवाल तो उठे मगर जल्दी ही मीडिया का फोकस रणनीतिकारों की तारीफ की तरफ चला गया जहां कम जोखिम था. पूरी रात दोनों तरफ से अनेक मंत्री और अनेक प्रवक्ता बारी-बारी से आयोग के भीतर जाते रहे और बाहर आकर एक ही बात बारी बारी से कहते रहे ताकि लंबे समय तक टीवी के स्क्रीन पर डटे रहें. कोई भी एडम गिलक्रिस्ट की तरह महानता नहीं दिखाना चाहता था. यही करते करते 9 अगस्त की रात आ गई लेकिन मीडिया इसी हिसाब में लगा रहा कि कौन सा विधायक बिका है, कौन सा विधायक झूठ बोल रहा है. घटना गुजरात की ही थी जिसके गांधी की ज़िंदगी का बेहद चुनौतीपूर्ण और शानदार क्षण था भारत छोड़ो आंदोलन. रात के उजाले और दिन के अंधेरे में साफ-साफ दिखा कि भारत की राजनीति में न तो कोई गिलक्रिस्ट न ही गांधी है.
पढ़ें: भारत छोड़ो आंदोलन के 75 वर्ष: पीएम मोदी ने अपने भाषण में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का नहीं किया जिक्र
ऐसी कमज़ोर और भयावह रात के बाद आती है 9 अगस्त 1942 की सालगिरह वाली सुबह. वही राजनीति अब ख़ुद को भारत छोड़ो आंदोलन का वारिस घोषित करते हुए इस तरह के एलान करती है जैसे 9 अगस्त के दिन भारत में नैतिकता की कोई नई सुबह आ गई हो. कई दलों ने ताबड़तोड़ भारत छोड़ों आंदोलन के नाम पर अपने अपने आंदोलनों के ब्रांड लांच कर दिए. लालच भारत छोड़ो आंदोलन,देश बचाओ देश बनाओ आंदोलन और बीजेपी भारत छोड़ों आंदोलन. प्रधानमंत्री ने भी 6 प्रकार के आंदोलन लांच कर दिये हैं. संकल्प से सिद्धी. भ्रष्टाचार,जातिवाद, संप्रदायवाद मुक्त भारत का संकल्प के विज्ञापन कई अखबारों में छपे. कहीं ऐसा न हो जाए कि 9 अगस्त का दिन असली 9 अगस्त 1942 को भूलने का दिन बन जाए और सारे दल आज लांच हुए अपने अपने आंदोलनों की सालगिरह मनाने लग जाएंगे.
पढ़ें: संसद में पीएम नरेंद्र मोदी ने 'करेंगे और करके रहेंगे' नारे के साथ लिए ये 5 संकल्प
संसद के दोनों सदनों में एक अलग ही बेचैनी दिखी. सब अपने अपने इलाके और कुछ अपने परिवार के इतिहास को सदन के भीतर रखने के लिए जूझते नज़र आए. मेरा बनाम तेरा इतिहास का इंसाफ दुनिया की किसी अदालत में नहीं हो सकता. बेहतर है ज़्यादा से ज़्यादा लोग इतिहास पढ़ें और लिखे, मगर इतिहास के अनुशासन का पालन करते हुए न कि मंत्री की मर्जी से. मेरी मांग है कि राजनीति में इतिहास की लोकप्रियता को देखते हुए भारत सरकार दस हज़ार करोड़ का एक इतिहास फंड बनाए. इस पैसे से भारत भर में व्याप्त इतिहास की असमानता को दूर किया जाएगा. कई नेताओं के भाषण में इतिहास का अपराध बोध भी झांकता रहा. सीताराम येचुरी ने तुरंत प्रतिक्रिया दी कि गलत बात है कि कम्युनिस्टों ने आंदोलन का बहिष्कार किया. कई उदाहरण गिना दिए. समाजवादी नेता ने कहा कि कांग्रेस ने लोहिया और जेपी को छोड़ दिया. गुलाम नबी आज़ाद ने संघ की भूमिका पर नहीं बोला मगर सुभाष चं बोस से लेकर भगत सिंह और चंशेखर आज़ाद को याद किया. कम्युनिस्टों की तरह संघ का भी दावा है कि उसके कार्यकर्तांओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था. जबकि दूसरा दावा है कि हिस्सा नहीं लिया था. अच्छा होता कि इस प्रश्न का सदन के मुख्य वक्ताओं द्वारा सामना किया जाता. राज्यसभा में अरुण जेटली और लोकसभा में प्रधानमंत्री इस सवाल को किनारे लगा गए. प्रधानमंत्री मोदी इतिहास की तारीखों को जश्न में बदलने के लिए इतने तत्पर रहते हैं तब फिर वे क्यों इतिहास के इन सवालों से बचते हैं. कम से कम पता तो चलता कि संघ की भूमिका पर उनकी क्या राय है जिसके स्वंयसेवक होने पर उन्हें गर्व होता है. उनकी एक बात की तारीफ की जाना चाहिए कि वे गांधी को लेकर संघ की तरह असमंजस में नहीं रहते हैं.
पढ़ें: संसद में पीएम मोदी की जुबां पर आई एक कविता, जानें उसे रचने वाले के बारे में..
बलिया के चित्तू पांडे, सतारा के नाना पाटिल और बंगाल के सतीश सामंत और अजय मुखरजी को याद किया गया और इन्हें लेकर कोई नहीं झगड़ा. कई बार लगता है कि हमारी राजनीति इतिहास का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है. इतिहास में भूमिका नहीं होने के आधार पर क्या किसी को आज के समय में खारिज किया जा सकता है. मेरे हिसाब से नहीं. 9 अगस्त 1942 का इतिहास बड़े नेताओं के साथ भारत की असंख्य जनता का इतिहास है. यह इतिहास बताता है कि जब सारे नेता जेल चले गए, कोई नेतृत्व करने वाला नहीं रहा तो भी भारत की जनता ने सत्ता के गरूर को कुचल दिया. किसान, मज़दूर और छात्रों की भूमिका ज़बरदस्त थी.
पढ़ें: 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने दिया था 70 मिनट का भाषण
पटना का यह शहीद स्मारक किसी को याद भी रहा. 11 अगस्त 1942 को बिहार सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेज़ों की गोलियां खा गए और शहीद हो गए. पटना ज़िला के रामानंद सिंह और रामगोविंद सिंह, सिलहट के देवी प्रसाद चौधरी,गया के जगपति कुमार, भागलपुर के सतीश प्रसाद झा और सारण के उमाकांत प्रसाद सिंह और राजेंद सिंह थे. सारण ज़िले में ऐसा जन विदरोह हुआ कि अंग्रेज़ी हुकूमत ने पूरे सारण ज़िले को कुख्यात रूप से अपराधी ज़िला घोषित कर दिया. 1943 के अंत तक 91, 836 लोग गिरफ्तार हुए, जिनमें सबसे अधिक बंबई प्रेसिडेंसी के 24, 416, संयुक्त प्रांत यानी आज के यूपी के 16,796 और बिहार के 16,202 लोग गिरफ्तार हुए थे. अखिल भारतीय आंदोलन था, बिहार, पूवच् संयुक्त प्रांत, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा और बंगाल में सबसे अधिक सक्रिय था. बिहार में जनता ने 72 थानों पर कब्ज़ा कर लिया. पटना के आसपास जहाज़ से गोलियां बरसाई गई थीं. यूपी के आज़मगढ़ में भी अंग्रेज़ी हुकूमत ने भयानक कहर बरपाया था. मीलों तक गांवों को जला देने का आदेश दिया गया. आज हम उस आज़मगढ़ के बारे में क्या क्या प्रचार करते हैं. तमलुक, सतारा, बलिया सहित कई जगहों पर जनता ने अपनी सरकार बना ली. यह सारी जानकारी सुमित सरकार की किताब आधुनिक भारत से है.
VIDEO : आंदोलनों से हमने कितना सीखा?
कई जगहों पर लोगों ने अपनी तरफ से कांग्रेस वर्किंग कमेटी बनाकर गांधी बाबा के नाम से आदेश जारी करने शुरू कर दिये. इस आंदोलन में हिंसा भी हुई, अहिंसा का भी पालन हुआ, बड़ी संख्या में बमबारी हुई, छापामार तरीके से हमला हुआ, कर्नाटक में किसान दिन में खेती करते और रात में तारघरों पर हमला करते थे. नेताओं के नाम को लेकर होने वाली सियासी बहस में आप बंगाल की तमलुक की 73 साल की मातंगिनी हाजरा को कहां रखेंगे जिन्होंने गोली लग जाने के बाद भी तिरंगे को झुकने नहीं दिया. भारत छोड़ो आंदोलन का एक और शानदार पहलू है हिन्दू मुस्लिम एकता. एक अच्छे इतिहासकार में यह साहस होना चाहिए कि वह सिर्फ भारत छोड़ो आंदोलन का महिमामंडन ही न करे बल्कि उसके अंतर्विरोधों, चुनौतियों कमियों की भी बात करे. क्या यह आंदोलन गांधी के सिद्धांतों की जीत था. जो गांधी चौरी चौरा की हिंसा पर असहयोग आंदोलन वापस ले लेते हैं वो गांधी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगहों पर बम फेंके जाने, हिंसा होने की घटना पर भी करो मरो पर कायम रहते हैं.
This Article is From Aug 09, 2017
भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल, क्या सीखा हमने आंदोलनों से. रवीश कुमार के साथ प्राइम टाइम
Ravish Kumar
- ब्लॉग,
-
Updated:अगस्त 10, 2017 17:03 pm IST
-
Published On अगस्त 09, 2017 20:52 pm IST
-
Last Updated On अगस्त 10, 2017 17:03 pm IST
-
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं