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This Article is From Dec 28, 2018

बिहार की 'आशा' और 'आंगनवाड़ी' वर्करों की आशा, मीडिया नहीं आता फिर भी

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    दिसंबर 28, 2018 13:39 pm IST
    • Published On दिसंबर 28, 2018 13:39 pm IST
    • Last Updated On दिसंबर 28, 2018 13:39 pm IST

"प्रणाम सर'',

मेरी माताजी बिहार में आंगनवाड़ी सेविका हैं. उन्हें पिछले 12 महीने से मानदेय नहीं मिला है. मानदेय की राशि मात्र 3,000 रुपये केंद्र सरकार की ओर से तथा मात्र 750 रुपये बिहार सरकार की ओर से है (कुल 3,750 रुपये). इसी तरह 2016 में भी आठ महीने मानदेय नहीं दिया गया था. मां की कमाई के वे 3,000 रुपये उनके लिए बड़ी बात हैं, आजीवन काम कर अपना गुज़ारा चलाने की अभ्यस्त रही हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में क़रीब 81,000 आंगनवाड़ी केंद्र हैं, और उनमें 1 सेविका और 1 सहायिका कार्यरत हैं. क्या सेविकाओं का 3,750 और सहायिकाओं का करीब 2,000 ही इतनी बड़ी रक़म है, जिसे हर महीने न देने से सरकारी खज़ाना भर जाएगा और उससे विज्ञापन होगा?

सरकार इतना कम मानदेय देना तय करने के बाद इन मजबूर महिलाओं से बेगारी क्यों करवा रही है? क्या इसलिए, क्योंकि ये महिलाएं वहां हो रहे भ्रष्टाचार पर कभी आवाज़ नहीं उठा सकेंगी? उसके बाद यह दावा कर सको कि मेरी सरकार में 1 रुपया चलता है तो पूरा 1 रुपया पहुंच जाता है? चुनाव आने से पहले ढपोरशंख की तरह मानदेय बढ़ा कर 4,500 भी कर दिया गया है, जबकि इसे 1 लाख किया जाना चाहिए था."

बिहार की एक आंगनवाड़ी सेविका की बेटी का पत्र आया है. मैं सोच रहा था कि इस पत्र को आपके सामने कैसे रखूं. इतने मामूली पैसे से कोई महिला अपने वजूद की रक्षा कर पाती है, तो यह पैसा कितना मायने रखता होगा. स्टेट की समीक्षा की ज़रूरत आ पड़ी है. हमारी राज्य व्यवस्थाएं सड़ गईं हैं. उनके भीतर संभावनाओं का विस्तार नहीं हो रहा है.

'Prime Time' में दो बार आशा वर्कर पर विस्तार से कार्यक्रम किया है. मालूम नहीं, सामान्य दर्शकों की जनता के अपने हिस्से से हो रही नाइंसाफ़ी को लेकर कितना दर्द होता होगा. फिर भी हमने इसलिए दिखाया कि कोई देखे न देखे, पर्दे पर अपना ही दर्द देखिए. ज़माना हमदर्द नहीं है, तो क्या हुआ. अब एक दूसरा पत्र पढ़िए. मैं क्यों कहता हूं कि भारत का मीडिया अर्जित लोकतंत्र को बर्बाद करने पर तुला हुआ है. यह पत्र आशा वर्करों से संबंधित है.

"रवीश सर''. बिहार की आशा करीब एक महीने से प्रदर्शन कर रही हैं. एक महीने से टीकाकरण और स्वास्थ्य विभाग की पूरी व्यवस्था बुरी तरह चौपट है. वहां की लोकल मीडिया बिल्कुल इस ख़बर को नहीं दिखा रहे. लोकल पत्रकार अख़बारों में ख़बर छापने के लिए 500 रुपये मांगते हैं. पटना में दो दिन तक 40,000 आशाओं का प्रदर्शन हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री या उनके किसी प्रतिनिधि ने इनकी ख़बर नहीं ली. जिला प्रशासन ने प्रदर्शन करने वाली आशाओं पर FIR करने का आदेश दिया है. मैंने इस पर कुछ रिपोर्ट की है, लेकिन हमारी ख़बर का कोई असर नहीं हो रहा. आप प्लीज़ Prime Time में एक बार इनके प्रदर्शन का ज़िक्र कर दें, बड़ी मेहरबानी होगी."

बिहार में आशा वर्कर 1 दिसंबर से हड़ताल पर हैं. पटना में अब धरना-प्रदर्शन गर्दनीबाग़ इलाक़े में होता है. 12 और 13 दिसंबर को राज्यभर की आशा वर्कर जमा हुई थीं. अब वहां से हटकर राज्य भर के सदर अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उनका प्रदर्शन चल रहा है. 27 दिसंबर को आशा वर्कर ने राज्यभर में रेल-चक्का जाम किया था. नेशनल न्यूज़ चैनलों का अब कोई कुछ नहीं कर सकता है. वहां हिन्दू मुस्लिम और सरकार का प्रोपेगैंडा ही चलेगा. जनता का मुद्दा नहीं चलेगा. चैनलों के ज़रिये मुद्दों के होने वाले खेल को समझने की योग्यता आम पत्रकारों में नहीं है, जनता से क्या उम्मीद करें. खुद हम लोगों को इनका गेम समझने में कई साल लग गए. क्या हम वह दिन देखने जा रहे हैं कि जनता मीडिया के सामने गिड़गिड़ा रही है कि हमारा दिखा दो, हमारा छाप दो, तुम्हीं माई-बाप हो. ईश्वर करे, यह दिन न आए.

बहरहाल, आशा वर्करों का काम बेहद महत्वपूर्ण है. हमें बताया गया है कि अस्पतालों में डॉक्टर उसे 'तू-तड़ाक' कर बातें करते हैं. शर्मनाक है. गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक ले जाने का काम भी आशा वर्कर करती हैं. एक डिलीवरी के 600 मिलते हैं. नसबंदी कराने के 150. मगर कभी भी इन्हें 1,500 रुपये से अधिक नहीं मिलता. वह भी समय से नहीं मिलता है. सोचिए, किसी का इतने कम पैसे में कैसे चलता होगा. बिहार में कई बार बढ़ाने के नाम पर आशा सुपरवाइज़रों की राशि बढ़ा दी जाती है, जिनके नीचे कई आशा वर्कर होती हैं. इन्हें भी कम मिलता है. 4,000-5,000 से अधिक नहीं मिलता है. अलग-अलग राज्यों में आशा वर्करों को अलग-अलग वेतन मिलता है.

इनकी मांग है कि सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए और सैलरी 18,000 की जाए. प्रधानमंत्री ने अक्टूबर में 2,000 रुपये प्रोत्साहन राशि का ऐलान किया था, जो बहुतों को मिला ही नहीं. इनकी एक मांग यह भी है कि प्रोत्साहन राशि की नौटंकी बंद की जाए. इसकी जगह सैलरी दी जाए. आप इन तस्वीरों में देख सकते हैं कि आशा वर्कर एकजुट होकर प्रदर्शन कर रही हैं. यहां मीडिया नहीं है. कहीं खबर छपी भी होगी, तो किसी किनारे में. मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, मगर आप देख सकते हैं कि मीडिया के बग़ैर लोकतंत्र धड़क रहा है. बल्कि मीडिया वहां है ही नहीं, जहां लोक अपने तंत्र से सवाल पूछ रहे होते हैं.

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