राहुल गांधी की दृश्यता लगातार बढ़त पर है. चर्चा में तो वे पिछले दो दशकों से हैं. पिछले एक दशक से हो रहे इच्छापूर्ण विश्लेषणों ने उनकी सार्वजनिक छवि को दबाव में बनाए रखा था. लेकिन उनकी राजनीतिक उद्यमिता बेफर्क रही. आमतौर पर आज स्थिति यह है कि उन्हें गंभीरता और उत्सुकता से सुना जाने लगा है. 12 अक्तूबर को दिल्ली में विलक्षण और विशाल प्रदर्शन ने देश और दुनिया को चौंका दिया. अब उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को पीछे पलट कर देखा जा रहा है. उनकी भारत जोड़ो यात्राओं का नए सिरे विश्लेषण होने लगा है. कुछ महीनों से छात्रों की गूंज के जरिए वे नई पीढ़ी की नज़रों में हैं. एक राजनीतिक तत्त्व के रूप में ऐसे व्यक्तित्व की जांच या विश्लेषण का चलन है. इस चलन में ऐसे सार्वजनिक व्यक्तित्वों की खूबियों और कमियों पर गौर कराया जाता है. उन्हें उपलब्ध अवसरों का आकलन किया जाता है. यह भी जांचा और तोला जाता है कि ऐसे व्यक्ति को भविष्य में किन जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है. आधुनिक प्रबंधन प्रौद्योगिकी में इस पद्धति को स्वॉट एनालिसिस कहते हैं.
यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि आज से कोई नौ साल पहले भी एनडीटीवी ने राहुल गांधी की SWOT एनालिसिस की थी. दिसंबर 2017 में वह मौका था जब वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए थे. उस विश्लेषण को आज पढ़ने से यह पता चलेगा कि पिछले एक दशक में राहुल गांधी के राजनीतिक व्यक्तित्व और राजनीतिक परिवेश में क्या फर्क आया.
राहुल गांधी की STRENGTH क्या है
नौ साल पहले वाली एनालिसिस में राहुल गांधी की सबसे बड़ी खूबी या ताक़त उनकी उच्च शिक्षा को माना गया था. नौ साल बाद की स्थिति में नई बात यह जुड़ गई है कि इस बीच उन्होंने अपने किताबी ज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया. गुज़रे दौर में वे कई विश्वविख्यात समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों से सार्वजनिक वाद संवाद कर चुके हैं. इस दौरान उन्होंने दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में विशेषज्ञ व्याख्यान दिए हैं. भले ही अब तक वैश्विक राजनीति में अकादमिक ज्ञान को अहमियत न मिलती रही हो लेकिन दुनियाभर में नई पीढ़ी आश्चर्यजनक रूप से ज्ञान और नैतिकता के प्रति आकर्षित होती दिख रही है. इस लिहाज़ से नए दौर की राजनीतिक उद्यमिता में अकादमिक ज्ञान को एक बहुत बड़ी ताकत माना जाने लगा है.
नौ साल पहले वाले विश्लेषण में ताकत के ही रूप में उनमें एक अच्छे श्रोता होने का गुण पहचाना गया था. इस समय वे एक धैर्यवान श्रोता सिद्ध हो रहे हैं. हर तबके के नागरिकों को लंबी बातचीत के लिए अपनी तरफ से प्रोत्साहित करने के दृश्य राजनीतिक मनोवैज्ञानिकों को हैरत में डाल रहे हैं. व्यावहारिक और रणनीतिक राजनीति के उलट नैतिकता और आदर्शवाद पर उनके विश्वास को उनकी एक बड़ी ताकत माने जाने लगा है. उन्हें अप्रत्यक्ष और अनिमंत्रित सुझाव दिए जाते रहे हैं कि बौद्धिक और सैद्धांतिक बातों से व्यावहारिक राजनीति नहीं सधती. लेकिन राहुल गांधी के भाषणों के विषयगत मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यानी CONTENT एनालिसिस का निष्कर्ष यह है कि राजनीतिक उद्यमिता में वे अहिंसक और शांत आचरण के प्रवक्ता रहे हैं. इसका एक उदाहरण वह वाक्य है जिसमें उन्होंने 'नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान' खोलने की बात कही थी. उनकी यह बात किसी ध्येय वाक्य की तरह लोकप्रिय हुई. उनके भाषणों के आधार पर कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि उनका विश्वास इस सूक्ति में है कि भारतीय मानस में अतिवाद के लिए कोई स्थान नहीं होता.
एक दिलचस्प पर्यवेक्षण है कि उनका आचार व्यवहार और विचार प्रणाली आज की पीढ़ी की विचार शैली के अनुरूप है. बहुत संभव है इसीलिए उनकी लोकप्रियता अचानक MILENIALS और GEN Z में बढ़ी. जेन ज़ी में उनकी लोकप्रियता का एक और बड़ा कारण छात्रों की गूंज जैसा आयोजन भी हो सकता है. बहुत संभव है कि जेनज़ी को राहुल गांधी में यह पसंद आया हो कि वे विलापप्रिय नहीं है. यहां याद दिलाया जा सकता है कि जेन जी पीढ़ी को नकार और हिंसा से अरुचि है. नई पीढ़ी रौद्र, वीभत्स या जुगुप्सा रस से बिल्कुल भी रोमांचित नहीं होती.
राहुल गांधी की WEAKNESS क्या हैं
सन 2017 में हुई राहुल गांधी की स्वॉट एनालिसिस में उनकी कमजोरियों की लिस्ट में कांग्रेस की कमजोरी को रखा गया था. गौरतलब है कि 2011 से 2014 के बीच कांगेस को अपने खिलाफ बड़े-बड़े आंदोलनों का सामना करना पड़ा था. सत्ता से बेदखल करने वाले आंदोलनों के अंधड़ ने कांग्रेस को सत्ता से उखाड़कर पटक दिया था. वह नारा भी याद किया जाना चाहिए जिसमें भारतीय राजनीति को कांग्रेस मुक्त कर देने की कवायद चालू हुई थी. ऐसे समय में उन्हें औपचारिक तौर पर कांग्रेस के प्रमुख पदों पर लाया गया था. पहले उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष और फिर दिसंबर 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था. उस समय वे क्या कर पाए और क्या नहीं कर पाए, इसका वस्तुनिष्ठ और सम्यक आकलन अभी तक हुआ नहीं है. बहरहाल बाद में उन्होंने संगठन का पद छोड़कर एक प्रशिक्षित राजनेता के तौर पर राजनीतिक उद्यम जारी रखा. इस बात को लेखे में लिया जाना चाहिए कि इस बीच उन्हें अनिमंत्रित और अप्रत्यक्ष सुझाव दिए जाते रहे कि नए दौर की राजनीति में धुंआधर आक्रामकता की मांग है. लेकिन चुनावी राजनीति में बार-बार परास्त होने के बावजूद उन्होंने प्रतिघृणा और प्रतिहिंसा के सुझावों की अनदेखी की. इसे उनकी कमजोरी माना गया. लिहाजा आगे होने वाले विश्लेषणों में इस बात को भी आंका जाना चाहिए कि उस अव्यावहारिक दिखने वाली सैद्धांतिक और आदर्शवादी राजनीति का आज तक का नफा नुकसान क्या रहा.
राहुल गांधी की दूसरी बड़ी कमजोरी भी कांग्रेस की उस कमजोरी से जुड़ी है जिसे संसाधनों का प्रबंध करने की अक्षमता के रूप में बताया जाता है. कुछ विशेषज्ञ विश्लेषणों के हिसाब से भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में यह अपूर्व स्थिति है कि सिर्फ कांग्रेस ही नहीं प्रतिपक्ष के दूसरे दल भी आर्थिक विकलांगता के शिकार हैं.
राहुल गांधी के पास OPPORTUNITY कितनी है
यह धारणा टूटती दिख रही है कि कांग्रेस का कार्यकर्ता हतोत्साहित है. राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में 12 अक्तूबर के आयोजन को देख खुद कांग्रेस के भीतर ही कई नेता चमत्कृत हैं. मुख्यधारा का मीडिया भी राहुल गांधी के प्रति अब उतना अनुदार नहीं दिख रहा है. मुख्यधारा के मीडिया के तेवर आश्चर्यजनक रूप से बदले नजर आ रहे हैं. यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में राहुल गांधी के लिए जगह अचानक बढ़ गई है. अपनी वैश्विक भाषा शैली के कारण अंतरराष्ट्ररीय राजनीति में उनके लिए बढ़ते मौकों के संकेत दिए जा सकते हैं. गौर किया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई-झगड़ों के बीच ऐसे नेताओं की जरूरत महसूस की जाने लगी है जो सामंजस्यवादी हों और उन्हें जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ हो.
राहुल गांधी के लिए THREAT क्या है
कथा साहित्य का स्थायी गुण है कि हर नायक हमेशा प्रतिनायकों के निशाने पर रहता है.राजनीति में भी यह प्रवृति सार्वभौमिक और सार्वकालिक है यानी राहुल गांधी इससे नहीं बच सकते. उन्हें आगे भी कदम कदम पर अपनी छवि पर मारक हमलों से जूझना पड़ेगा. इस जोखिम को कम इस तरह किया जा सकता है कि हमलों से घायल छवि की मरम्मत के उपाय ढूंढ लिए गए हैं. हालांकि उन पर इस तरह के जोखिम का मात्रात्मक अनुमान भी ज़रूर लगाया जाना चाहिए. क्योंकि यह एक समय सिद्ध तथ्य है कि लंबे वक़्त तक हमलों से उनकी धार ख़त्म होती जाती है.
विगत में उनपर प्रत्यक्ष विरोध से ज्यादा अप्रत्यक्ष विरोध का ज्यादा खतरा रहा है. पिछले एक दशक के अनुभव पर गौर किया जाए तो राहुल गांधी अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी से ज्यादा अपने सहयोगियों के असहयोग से जूझते रहे हैं. शायद ही कोई विधानसभा चुनाव रहा हो जिसमें वे अपने गठबंधन के घटक दलों की मांगों से परेशान न हुए हों. ग़ौरतलब यह भी है कि इन परिस्थितियों का ख़मियाज़ा सहयोगियों को ज़्यादा हुआ है. इस लिहाज से देखा जाए तो उनके लिए अब आगे से इस जोखिम की मात्रा कम हो सकती है.
(डिस्क्लेमर:लेखक ने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक काम किया है. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)