प्राकृतिक विज्ञान के तर्ज पर पद्धति शास्त्र का निर्माण एवं औपनिवेशिक मानसिकता के इर्द गिर्द भारतीय समाजशास्त्र अपने विषय वस्तु के निर्धारण हेतु गहरे संक्रमणकाल के दौर से 1950-1960 के दशक में गुजर रहा था. उस समय का समाजशास्त्रीय पाठ, शोध अन्वेषण, प्रघटना की समझ मुख्यतः पश्चिमी शास्त्रीय समाजशास्त्रीय लेखन,औपनिवेशिक सामाजिक मानवशास्त्र एवं परंपरा के दार्शनिक पाठों पर निर्भर था. ये सब भारतीय सामाजिक व्यवस्था की स्थिरता , अमूर्तता , आत्म्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को एक सांस्कृतिक प्रत्यय के रूप में समझने पर जोर देती थी. उन स्थापित मान्यताओ से अलग प्रोफेसर आंद्रे बेतेई समाजशास्त्र की अलग परम्परा के निर्वाहक बने . प्रोफेसर बेतेई भारतीय समाज को समझने के लिए सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक यथार्थ पर जोर देते हैं, जिससे वर्तमान भारत की वर्गीय विषमता , सत्ता संबंध और ऐतिहासिक परिवर्तन को समझा जा सके.
राजनीतिक एजेंडा-मुक्त अध्ययन
वो किसी वृहत महान सिद्धांत की खोज में नहीं थे न की किसी कार्य कारण पर आधारित सामाजिक प्रघटना के नियम की खोज या स्थापित धारणाओं की रक्षा करना चाहते थे, उनका दृष्टिकोण तुलनात्मक, अनुभवजन्य और वेबेरियन दृष्टि से युक्त था जिससे वह ये समझना चाहते है कि लोग वास्तव में कैसे रहते है , किस प्रकार संघर्ष करते है , संस्थाए कैसे उनके जीवन अवसरों को प्रभावित करती हैं. मूलतः वे समाजशास्त्र में एकल मार्क्सवादी या कार्यात्मक व्याख्याओं की जगह वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और राजनीतिक एजेंडा-मुक्त अध्ययन पर ज़ोर देते हैं.इससे समाजशास्त्र की विषय वस्तु एक अमूर्त सांस्कृतिक संरचना नहीं, बल्कि जीवंत संबंधों, असमानताओं और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का क्षेत्र रहे.
अगर बात उनकी कृतियों की करे तो ग्रामीण भारत का विश्लेषण करती उनकी प्रसिद्ध कृति 'Caste, Class and Power' भारतीय समाजशास्त्र में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मानी जाती है. इस कृति पर मैक्स वेबर का प्रभाव भी देखा जा सकता हैं. तमिलनाडु के एक गांव पर आधारित इस अध्ययन में बेतेई बताते है कि जाति, वर्ग और सत्ता एक-दूसरे से स्वतंत्र भले ही हो मगर आपस में ये परस्पर जुड़े हुए सामाजिक आयाम हैं. इसके जरिए उन्होंने यह स्थापित किया कि केवल जाति ही भारतीय समाज की एकमात्र निर्धारक कारक नहीं है, वरन जाति और वर्ग के प्रश्न एक जटिल सामाजिक यथार्थ से जुड़े हुए है. उनकी अन्य रचना 'Studies in Agrarian Social Structure' में प्रोफेसर बेतेई ग्रामीण समाज के सामाजिक सरंचना को विश्लेषित करते हैं. वे बताते हैं कि भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता का साधन और स्रोत्र है. इस अध्ययन में वो उन लोगों की बात करते हैं, जिनके पास जमीनें हैं और जिनके पास नहीं हैं, कृषि श्रम और गांवों की संरचना के बदलते स्वरूप की विवेचना करते हैं.
भारतीय समाज की समझ
प्रोफेसर बेतेई का एक महत्पूर्ण दखल सांस्कृतिक तत्ववाद की आलोचना भी है. इसमें वो लुई ड्यूमा के शुद्धता और अशुद्धता पर आधारित भारतीय समाज की समझ को भी ख़ारिज करते हैं. वो तर्क देते हैं कि भारतीय समाज विविध सामाजिक सिद्धांतों से संचालित होता है. उनके अनुसार भारतीय समाज की समझ केवल सांस्कृतिक श्रेणियों से नहीं, बल्कि भौतिक असमानताएं, राजनीतिक संघर्ष और ऐतिहासिक परिवर्तन पर आधारित अन्य श्रेणियों पर होनी चाहिए.
प्रोफेसर बेतेई असमानता के सार्वभौमिक प्रश्न को भी अपने अध्ययन का केंद्र बनाते हैं.अपनी पुस्तक 'Inequality Among Men' में बेतेई असमानता को मानव समाज की एक स्थायी विशेषता के रूप में देखते हैं. वे विभिन्न सभ्यताओं की तुलना करते हुए यह प्रश्न उठाते हैं कि समाज असमानता को कैसे वैध ठहराता है. उनके अनुसार आधुनिक लोकतंत्र समानता का दावा तो करता हैं, लेकिन वो नई विषमताएं भी पैदा करता है. इसी क्रम में उनकी अन्य पुस्तक 'The Backward Classes in Contemporary India' में उन्होंने आरक्षण, पिछड़े वर्ग और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का विश्लेषण किया. इसके साथ ही इस तथ्य को स्थापित भी किया कि नीतियां केवल अवसर दे सकती हैं, पर सामाजिक सम्मान और वास्तविक समानता केवल प्रशासनिक उपायों से संभव नहीं है.
भारतीय समाजशास्त्र की परंपरा
प्रोफेसर आंद्रे बेतेई अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनकी विवेकशील विरासत, अनुभवजन्य अनुसंधान, पद्धतिगत अनुशासन और नैतिक स्पष्टता हमें हमेशा सिखाएगी कि किसी भी समाज को समझने के लिए ये कितनी जरूरी हैं. उन्होंने हमें सिखाया कि समाज को समझने के लिए न पद्धति शास्त्रीय कट्टरता और भावनात्मक आवेग की बल्कि धैर्यपूर्ण विश्लेषण और प्रमाण के प्रति निष्ठा आवश्यक है. उन्होंने भारतीय समाजशास्त्र को परंपरा के संग्रहालय से निकालकर जटिल सामाजिक यथार्थ की ओर मोड़ा. उन्होंने यह स्थापित किया कि समाजशास्त्र का कार्य समाज का महिमामंडन या निंदा नहीं, बल्कि समाज की संस्थागत असमानता और जटिलताओं को स्पष्ट करना है. उनका लेखन और चिंतन हमें हमेशा यह बताएगा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा केवल संस्थाओं से नहीं होती, बल्कि संवाद, तर्कशीलता और नैतिक प्रतिबद्धता से होती है जो आज के ध्रुवीकृत बौद्धिक और जटिल वातावरण में विशेष रूप से प्रासंगिक हैं. आज जब वो हमारे बीच में नहीं है, वैश्विक और भारतीय समाजशास्त्र उन्हें एक ऐसे विद्वान के रूप में याद करेगा,जिसने हमेशा यह सिखाया कि असमानताओं से भरे समाज में भी विवेक, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्य जीवित रखे जा सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: धीरज कुमार वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एमएमवी कॉलेज में समाजशास्त्र पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)