70 साल में संभवतः पहली बार है जब किसी प्रधानमंत्री के जीते-जी उसके नाम पर किसी सार्वजनिक स्थल का नामकरण हुआ हो. अहमदाबाद का मोटेरा स्टेडियम अब नरेंद्र मोदी स्टेडियम के नाम से जाना जाएगा. जीते-जी किसी नेता के नाम पर भी ऐसे नामकरण की बस एक ही नज़ीर मिलती है जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने पार्कों में अपनी और अपने परिजनों की मूर्तियां लगवाईं. इसका खमियाजा मायावती को 2012 का विधानसभा चुनाव हार कर भुगतना पड़ा. बेशक, मायावती की जितनी आलोचना हुई, शायद उतनी प्रधानमंत्री मोदी की नहीं होगी. इसकी एक वजह तो ये है कि मायावती ने मूर्तियां लगवा लीं, जबकि मोदी जी ने बस अपना नाम दिया है. लेकिन दूसरी वजह ज़्यादा अहम है. मायावती की दलित पहचान भी शायद उनका अभिशाप बनी. जो सवर्ण समाज कभी जिन लोगों की छाया तक से बचता था, उसे उनकी मूर्तियों को झेलना पड़ा. यह जातिगत घृणा भी मायावती के विरुद्ध गई.
निश्चय ही नरेंद्र मोदी को यह झेलना नहीं होगा. उनके समर्थकों में उनकी छवि किसी ईश्वर जैसी है. विरोधी भले किसी गुस्से में कहें, लेकिन मोदी समर्थकों के लिए भक्त की उपमा कई बार बिल्कुल सटीक लगती है. वे अपने ईश्वर के विरुद्ध कुछ भी सुन नहीं सकते. मोदी समर्थन कर देते हैं तो जीएसटी क्रांतिकारी कदम हो जाता है, वे नोटबंदी की घोषणा करते हैं तो सब मान लेते हैं कि अब नक्सलवाद और आतंकवाद पर भी ताला लग गया. मोदी तीन कृषि क़ानूनों को सही ठहराते हैं तो उनको सही ठहराने वालों की बाढ़ आ जाती है. इनका विरोध करने वाले देशद्रोही मान लिए जाते हैं. तो प्रधानमंत्री के नाम हुए नामकरण से यह स्टेडियम भी उनके लिए मंदिर जैसा हो जाएगा. यहां भारत को मिली हर जीत पर नरेंद्र मोदी की छाप मानी जाएगी.
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दूसरी बात यह भी है कि इस देश में नेताओं और महान लोगों के नाम पर सड़कों, पार्कों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों के नामकरण की ऐसी परंपरा है कि इसकी आलोचना नहीं की जा सकती. दुर्भाग्य से व्यक्ति पूजा की यह परंपरा कांग्रेस ने शुरू ही नहीं की, उसे लगभग अश्लील चापलूसी तक पहुंचा दिया. आज़ादी की लड़ाई के योद्धाओं को श्रद्धांजलि या सम्मान देने की बात फिर भी समझ में आती है और इस नाते, गांधी, नेहरू-पटेल, बोस या ऐसी दूसरी हस्तियों के नाम पर सार्वजनिक स्थलों के नाम देने का तर्क भी समझ में आता है. लेकिन धीरे-धीरे हर पार्क, अस्पताल, सड़क, मैदान और योजना का नाम रखने की ऐसी संस्कृति बन गई कि किसी को अजीब तक लगना बंद हो गया. लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, खिलाड़ियों के नाम जहां होने चाहिए थे, वहां भी नेताओं के नाम चमकने लगे. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर संस्थानों का ढेर लग गया.
लेकिन बीजेपी क्या कर रही है? वह 70 साल के सारे गुनाहों की बराबरी जैसे पांच साल में कर लेना चाहती है. सत्ता से बाहर रहते वह जिन नीतियों का विरोध करती थी, उन सब पर उसने कांग्रेस से कहीं ज़्यादा तेज़ी से अमल किया. अब नामकरण में एक क़दम और आगे बढ़ गई. प्रधानमंत्री के जीते-जी उनके नाम पर स्टेडियम बना डाला.
दिलचस्प यह है कि यह काम भी बिल्कुल चुपके-चुपके किया गया. इस मौक़े पर अहमदाबाद के स्टेडियम में तब मौजूद एनडीटीवी के खेल पत्रकार विमल मोहन कहते हैं कि यह एलान भी उसी तरह हैरान करने वाला था जैसे नोटबंदी का फ़ैसला था या फिर लॉकडाउन की घोषणा थी. नोटबंदी या लॉकडाउन के औचक एलान के अपने तर्क थे, लेकिन स्टेडियम का नाम प्रधानमंत्री के नाम पर करने का फ़ैसला छुपाने का तर्क क्या था? कहीं इसके पीछे आलोचना का डर तो नहीं था?
इसके बावजूद पूछा जा सकता है कि आख़िर प्रधानमंत्री के नाम पर इस नामकरण में हर्ज क्या है. पहला हर्ज तो यही है कि आप एक जीवित व्यक्ति को प्रतीक में, एक मूर्ति में बदल रहे हैं. मूर्तियां पूजने के लिए होती हैं, वे आस्था तो देती हैं, रास्ता नहीं बतातीं. प्रधानमंत्री को आप जीते-जी एक किंवदंती बना देंगे तो उनकी बातें अमल के लिए नहीं, कमल के लिए रह जाएंगी- यानी उन पर राजनीति तो होगी, काम नहीं होगा.
दूसरी और ज़्यादा बड़ी बात- लोग नामकरणों और मूर्तियों के निर्माण से नहीं बनते या बचते. गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर, लोहिया, जेपी-इंदिरा-राजीव आदि इसलिए नहीं बचे हैं कि उनके नाम पर सड़कें, अस्पताल, हवाई अड्डे या खेल के मैदान हैं, या फिर उनकी मूर्तियां हैं. मूर्तियों पर चिड़ियों की बीट पड़ी रहती है, सड़कें धूल से पटी रहती हैं, हवाई अड्डे और अस्पताल मुसाफ़िरों और बीमारों की आवाजाही से इस कदर भरे रहते हैं कि किसी को यह ध्यान भी नहीं रहता कि ये जगहें किनके नामों पर हैं. अक्सर ये जगहें उन व्यक्तित्वों की याद नहीं दिलातीं. एलएनजेपी अस्पताल से लोकनायक जयप्रकाश जैसे कद्दावर नेता की याद नहीं आती और न ही आरएमएल अस्पताल से राम मनोहर लोहिया जैसे जीवंत व्यक्तित्व की. इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी उस तेज़-तर्रार नेता की याद नहीं दिलाती जो इंदिरा गांधी थीं. गांधी के नाम पर बनी संस्थाएं तो बिल्कुल महात्मा गांधी का अपमान होती चली गई हैं. इतिहास बहुत निर्मम होता है. वर्तमान के चमकते सितारों को वह जिन अंधेरों में धकेलता है, वहां से उनका सुराग तक नहीं मिलता.
नरेंद्र मोदी भी बचेंगे तो अपने काम से बचेंगे. यह अलग बात है कि किस तरह बचेंगे. वे इस देश के पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जिन्हें अब तक दो कार्यकाल मिल चुके हैं और जिनकी लोकप्रियता असंदिग्ध तौर पर आज भी दूसरों से ज़्यादा है. बेशक, इस लोकप्रियता की वजह वह अंधबहुसंख्यकवाद और सांप्रदायिक राजनीति है जिसका ज़हर समाज के हर हिस्से में महसूस किया जा रहा है. लेकिन उनके प्रशंसकों को भी शायद यह फ़ैसला मायूस करे. क्योंकि यह स्टेडियम उनकी ख्याति में कुछ जोड़ता नहीं, बल्कि उसे कुछ कम ही करता है. इससे यह संदेश भी जाता है कि नरेंद्र मोदी को जिन चीज़ों का विरोध करना चाहिए, उनको वे बढ़ावा दे रहे हैं. व्यक्ति पूजा वैसे भी अच्छी चीज़ नहीं होती- सबसे पहले वह व्यक्तियों को उनकी रचनात्मकता और प्रयोगशीलता से काट कर जड़ मूर्तियों में बदलती है और फिर उन्हें अपने ही समय में अप्रासंगिक बना डालती है. क्या नरेंद्र मोदी के साथ भी यह हादसा हो रहा है? या इसके बीज भी कहीं विचारधारा की आड़ में चल रही उनकी व्यक्तिवादी राजनीति में ही छुपे हैं?
प्रियदर्शन NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...
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