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This Article is From Oct 18, 2016

प्राइम टाइम इंट्रो : क्‍या सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं सामान्‍य बात?

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    नवंबर 11, 2016 16:05 pm IST
    • Published On अक्टूबर 18, 2016 21:40 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 11, 2016 16:05 pm IST
सांप्रदायिक हिंसा को हम एक तय फ्रेम में देखने लगे हैं. नतीजा यह होता है कि हम नई घटना को भी पहले हो चुकी घटना समझकर अनदेखा कर देते हैं, क्योंकि ऐसी हर घटना में बहस के जितने भी पहलू हैं, वो लगभग फिक्स हो चुके हैं. कौन सा सवाल होगा, कौन सा जवाब होगा, कौन सा पक्ष होगा, इसलिए भी आप या हम सांप्रदायिक हिंसा की ख़बरों को लेकर सामान्य होने लगे हैं. हमें पता भी नहीं चलता है कि धीरे-धीरे इन सामान्य सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या सैकड़ों से अब हज़ारों में होने लगी है. ज़रूर दंगे जैसी बड़ी घटनाएं नहीं हो रही हैं. हालांकि कई जगहों पर बड़ी संख्या में दुकानें जली हैं, लोग घायल हुए हैं.. मगर हज़ारों की संख्या में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं की प्रकृति मामूली झगड़े की होती है, जिनसे बवाल होता है. फिर स्थानीय इलाके में तरह-तरह की बहस होती है. हिन्दू ऐसे होते हैं, मुसलमान ऐसे होते हैं कि बातें चलने लगती हैं. हमें अब वाकई चिंता करनी चाहिए कि हम कब तक अपने सामाजिक ताने-बाने को इस तरह कमज़ोर करते रहेंगे. इस राजनीति से सत्ता मिल सकती है, लेकिन यह भी तो पूछिये कि उस सत्ता से आपको क्या मिल रहा है? क्या आपको पड़ोस में झगड़ा चाहिए?

अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स ने उत्तर प्रदेश में हो रही सांप्रदायिक घटनाओं के पुलिस रिकॉर्ड का अध्ययन किया है. एक महीना लगाकर अप्पू एस्थोस सुरेश ने तमाम रिकॉर्ड की छानबीन की है और इसे 17 और 18 अक्तूबर के दिन एक लंबी रपट प्रकाशित की है. तीसरा हिस्सा 19 अक्तूबर को भी प्रकाशित होगा. अप्पू ने बताया है कि 31 जुलाई 2014 के आसपास उत्तर प्रदेश के एक नहीं बल्कि नौ ज़िलों में एक साथ सांप्रदायिक हिंसा की घटना दर्ज की गई है. आज से दो साल पहले.

आज हम अप्पू से ही बात करेंगे, लेकिन उनकी रिपोर्ट की खास बातों को आपके सामने रखना चाहता हूं. 75 ज़िलों का रिकॉर्ड देखकर मैं भी चौंक गया. क्या हम इतने लाचार हो गए हैं कि इस तरह हज़ारों की संख्या में सांप्रदायिक घटनाएं होती रहेंगी और सब कुछ राजनीतिक दलों पर छोड़ दिया जाएगा, जिनकी दिलचस्पी इसका फायदा उठाने में ही अधिक होती है. समाज के भीतर से कब आवाज़ उठेगी. बहरहाल अप्पू की रिसर्च बताती है कि...
 
  • यूपी में जनवरी 2010 से 2016 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 12,000 घटनाएं हुई हैं.
  • साल के हिसाब से हर साल 2,000 सांप्रदायिक घटनाएं.
  • दिन के हिसाब से हर दिन पांच से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं.
  • सिर्फ एक दिन कोई सांप्रदायिक हिंसा दर्ज नहीं हुई है और वो है 25 दिसंबर 2014.
  • साल 2016 में जनवरी से अप्रैल के बीच 1,262 सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज हुई हैं.
  • 2015 में 3,708 मामले दर्ज हुए हैं और 2014 में 2,884.

सांप्रदायिक हिंसा की इन छिटपुट घटनाओं में लगातार वृद्धि क्यों हो रही है. 12,000 की संख्या सुनने के बाद भी क्या हमें इन घटनाओं को छिटपुट कहना चाहिए. अप्पू ने इन घटनाओं के लिए लो इंटेंसिटी कम्युनल शब्द इस्तेमाल किए हैं. स्थानीय स्तर पर ये तनाव होते हैं. दंगों में बदलने से पहले पुलिस काबू पा लेती है. ये आंकड़े बता रहे हैं कि सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है.. मगर शायद ये भी बता रहे हैं कि पुलिस काबू भी कर पा रही है. वर्ना इनमें से किसी के भी बड़े झगड़े में बदलने की संभावना से आप इंकार नहीं कर सकते. पर क्या पुलिस का काबू पाना ही काफी होगा. इन मामलों में जांच और मुकदमों के अंजाम की कहानी भी पुलिस की मुस्तैदी को सवालों के घेरे में ला सकती है. इसका ये भी मतलब है कि राजनीतिक एजेंसियां सांप्रदायिक तनाव की इन घटनाओं को एक रणनीति के तहत अंजाम दे रही हैं. लोग जब जानते हैं तो लोग बंट क्यों रहे हैं. अप्पू ने ग्राफिक्स के ज़रिये अपनी रिपोर्ट में बताया है कि...
 
  • बीफ या गोहत्या को लेकर होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या कैसे बढ़ रही है..
  • 2010 में इन कारणों से सिर्फ 130 मामले दर्ज होते हैं, जो 2014 में 458 हो जाते हैं.
  • 2015 में दर्ज 3,708 घटनाओं में से 696 घटनाएं बीफ या गोहत्या को लेकर होती हैं.
  • उसी तरह से क़ब्रिस्तान को लेकर झगड़ा, मंदिर-मस्जिद और धार्मिक आयोजनों की भी भूमिका रही है. अप्पू ने इस सबको धार्मिक असहिष्णुता के मद में जोड़ दिया है.
  • 2010 में धार्मिक असहिष्णुता के कारण 592 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में से 98 घटनाएं होती हैं.
  • 2014 में 2,884 में से 715 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.
  • 2015 में 3,708 घटनाओं में से 905 घटनाएं धार्मिक असहिष्णुता के कारण होती हैं.

अभी हमने बताया कि 2015 में यूपी में सांप्रदायिक हिंसा की 3,708 घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें से 1,600 घटनाएं बीफ या धार्मिक असहिष्णुता को लेकर हुई हैं. इनका मकसद साफ है कि तनाव हो मगर बड़े स्तर पर दंगा न भड़के. तनाव से होता यह है कि स्थानीय इलाके में गर्मागर्म बहस होने लगती है कि वो ऐसे हैं.. ये ऐसे हैं. बहस करते-करते आप लोगों की सांप्रदायिक खेमेबंदी होने लगती है. रोटी-कपड़ा और नौकरी के सवाल को छोड़ आप इन सवालों के आधार पर राजनीतिक पसंद बनाने लगते हैं. जबकि इन घटनाओं का कारण देखें तो सामान्य जनता से उम्मीद की जानी चाहिए कि वो ख़ूब हंसे और कहे कि पता है कि ऐसा ही होता है, मगर हम झगड़ा नहीं करेंगे.

अप्पू की तरह एक और पत्रकार हैं नासिरुद्दीन हैदर ख़ान. इन्होंने www.youthkiawaaz.com पर एक लेख लिखा है. अंग्रेज़ी और हिन्दी के 13 समाचार पत्रों और वेबसाइट पर छपी सांप्रदायिक हिंसा की ख़बरों का संकलन किया है, जिन्हें हम छिटपुट हिंसा कहते हैं. इसी 11 से 15 अक्तूबर के बीच उत्तर प्रदेश और बिहार में दुर्गा मूर्ति विसर्जन और ताज़िये के जुलूस के दौरान टकराव की इतनी घटनाएं हुई हैं कि आप शायद चौंके भी न, क्योंकि हम और आप सामान्य हो चुके हैं. नासिरूद्दीन ने लिखा है कि...
 
  • गोंडा में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के दौरान पथराव का आरोप लगा. तनाव बढ़ा तो ताज़िया कमेटी ने ताज़िया नहीं निकाला.
  • मऊ में भी प्रतिमा विसर्जन और ताज़िया तोड़े जाने को लेकर तनाव हुआ.
  • अलीगढ़ में कब्रिस्तान की ज़मीन पर रावण जलाने को लेकर तनाव फैला.
  • मुरादाबाद में बिलारी इलाके में मुहर्रम के दौरान एक जुलूस निकालने को लेकर तनाव हो गया.
  • 13, 14 और 15 अक्तूबर को गोंडा के मोतीगंज, बहराइच के फख़रपुर में तनाव हुआ. बहराइच में कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हुई हैं. नासिर ने लिखा है कि महाराजगंज, कुशीनगर, बलिया, बलरामपुर, बरेली, सीतापुर और रायबरेली में भी जुलूस के रास्ते को लेकर तनाव हुआ है. बिहार में तो चुनाव भी नहीं होने वाले हैं, लेकिन वहां ये तनाव क्यों हो रहे हैं.
  • बिहार के पूर्वी चंपारण के तुरकौलिया में भी सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया.
  • यहीं के सुगौली में भी इसी तरह का मामला हुआ.
  • पश्चिम चंपारण के बेतिया के एक मोहल्ले में भी तनाव हो गया.
  • गया, मधेपुरा, भोजपुर, पीरो, गोपालगंज, सीतामढ़ी से भी ऐसी ख़बरें आईं हैं.

साल और जगह बदल जाने के बाद भी तनाव के कारणों में गज़ब की समानता है. क्या वाकई हम इन कारणों को नहीं समझते हैं या जो लोग संगठित तरीके से दोनों तरफ से इन मामलों को अंजाम देते हैं, उन्हें लोगों पर पूरा भरोसा है कि लोग भड़केंगे ही. इन्हीं कारणों से लोग 1940 में भी भड़के थे, 1960 में भी भड़के और 2016 में भी भड़केंगे. क्या सबकुछ इतना फिक्स हो सकता है. हमारे आज के मेहमान पत्रकार साथी ने पिछले साल बिहार से एक ऐसी ही रिपोर्ट प्रकाशित की थी. दो महीने लगाकर अप्पू ने 38 ज़िलों का पुलिस रिकॉर्ड देखा था. तब वे इंडियन एक्सप्रेस में थे और अब हिन्दुस्तान टाइम्स में हैं. अप्पू ने बताया था कि...
 
  • जून 2013 के चुनाव से पहले के महीनों तक बिहार में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की संख्या बढ़कर 667 हो गई है.
  • जून 2013 से 2010 के बीच ऐसी घटनाओं की संख्या 226 ही थी.

इन घटनाओं में एक पैटर्न यह भी दिख रहा है कि कई जगहों पर स्थानीय मीडिया इन्हें कवरेज नहीं देता. राष्ट्रीय मीडिया भी अनदेखा करता है. जैसा कि बंगाल में इसे लेकर बहस हो रही है कि इसका लाभ उठाकर सांप्रदायिक गिरोह अफवाह फैलाने लगते हैं कि मीडिया किसी एक समुदाय का पक्ष ले रहा है. अब देखना होगा कि मीडिया का यह फैसला स्वविवेक के आधार पर है या कवरेज न करने का फैसला सांप्रदायिक रणनीति से मेल खाता है ताकि इसका लाभ उठाकर अफवाह फैलाने का मौका मिले. कई जगहों पर अफवाह फैलाने में मीडिया की सीधी भूमिका सामने आई है. आपको इंटरनेट पर इससे संबंधित कई शोधपरक लेख मिलेंगे.

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