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This Article is From May 10, 2016

प्राइम टाइम इंट्रो : क्या इतिहास के भगवाकरण की कोशिश हो रही है?

Ravish Kumar
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 10, 2016 21:32 pm IST
    • Published On मई 10, 2016 21:32 pm IST
    • Last Updated On मई 10, 2016 21:32 pm IST
इतिहास के लिए इससे अच्छा दौर कुछ नहीं हो सकता। दो साल के दौरान इतिहास से जुड़े कई विषयों पर सार्वजनिक रूप से राजनीतिक चर्चा हो चुकी है। रैलियों से लेकर अखबारों के स्तंभों और चैनलों के स्टूडियो में। हमने जितना कंप्यूटर साइंस पर डिबेट नहीं किया, उससे कहीं ज्यादा इतिहास को लेकर भिड़ रहे हैं। इतिहास की पढ़ाई से भागने वालों की भी अच्छी प्रैक्टिस हो गई होगी। अशोक पर बहस खत्म हुई नहीं कि भगत सिंह पर शुरू हो गई। कब प्राचीन भारत का टॉपिक आ जाता है और कब आधुनिक भारत का। अच्छी बात है कि इतिहास से जुड़े इन मुद्दों का कोई टाइम ज़ोन नहीं होता। हमेशा तो नहीं, मगर कई बार चुनाव ज़ोन होता है। अगर आप इतिहास के हिसाब से सार्वजनिक रिकार्ड की बहस देखेंगे, तो हमने काफी प्रगति की है। नया प्रस्ताव हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की तरफ से आया है। सोमवार को मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह से मांग की है कि दिल्ली में अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप के नाम पर रखने का प्रयास करें। मुख्यमंत्री मनोहर खट्टर के इस मांग का राज्य सभा सदस्य सुब्रमण्यिन स्वामी ने समर्थन कर दिया है। स्वामी ने कहा कि महाराणा प्रताप साहसिक योद्धा थे और कभी बाहरी शक्तियों के आगे समर्पण नहीं किया, इसलिए उनके सम्मान में सड़क का नाम बदल देना चाहिए।

क्या महाराणा प्रताप की प्रतिष्ठा अकबर रोड का नाम बदल कर ही कायम की जा सकती है? क्या वाकई महाराणा प्रताम का नाम इतना गुमनाम है कि एक राज्य के मुख्यमंत्री और एक सांसद इस कमी की भरपाई अकबर रोड का नाम बदलकर करना चाहते हैं? अकबर से ज़्यादा क्या ये महाराणा प्रताप का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं है? क्या ये इतना ज़रूरी मुद्दा है? हमने गूगल किया कि केवल दिल्ली में महाराणा प्रताप के नाम पर क्या है- महाराणा प्रताप अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा है, महाराणा प्रताप एन्कलेव, महाराणा प्रताप भवन, केशवपुरम, महाराणा प्रताप इंडस्ट्रीज़, महाराणा प्रताप रोड, बाल्मीकि कॉलोनी, करोल बाग, महाराणा प्रताप पब्लिक स्कूल, हर्ष विहार, महाराणा प्रताप पब्लिक स्कूल, करावल नगर...

देश में तमाम जगहों पर महाराणा प्रताप से जुड़ी कई चीज़ें होंगी ही। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने करनाल में महाराणा प्रताप के नाम पर एक हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी बनाने का एलान किया है। 24 अकबर रोड पर कांग्रेस मुख्यालय है। 10 जनपथ का एक रास्ता अकबर रोड से ही जाता है। 11 अकबर रोड पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी रहते हैं। महाराणा प्रताप को लेकर नाइंसाफी ही क्या हुई है। क्या आपने चेतक घोड़े की कहानी नहीं पढ़ी है। क्या देहरादून के घोड़े शक्तिमान की टांग नहीं तोड़ी गई। महाराणा प्रताप ने घास की रोटी खाई थी। बुंदेलखंड के लोग आज भी ग़रीबी के कारण घास की रोटी खाने के लिए मजबूर है। सड़क बदलने से ज्यादा उनकी स्थिति में बदलाव का प्रयास क्या बेहतर नहीं होता। स्वामी ने कहा कि लुटियन दिल्ली में मुगल शासकों के नाम पर ज़रूरत से ज़्यादा सड़कें हैं। लोधी रोड, तुगलक रोड, शेरशाह रोड, सिरी फोर्ट रोड, सफदरजंग रोड, शाहजहां रोड, हुमायूं रोड, अकबर रोड, बाबर रोड, फिरोज़शाह रोड, बहादुरशाह ज़फर मार्ग...ये सभी मुग़ल नहीं है। कुछ सल्तनत काल के हैं। कुछ अफगान शासक के रूप में जाने गए तो कुछ लोध शासक के रूप में। बाद में मुग़लों की भी राज कायम हुई। सब अलग अलग इलाकों से भारत आए। इन्हें मज़हब के हिसाब से ही गिनना ठीक नहीं होगा। लेकिन गिना जा रहा है। ये सभी बाहर से आए मगर ये सभी इतिहास के तथ्य है। बाहर से आने वाले ने लुटियन दिल्ली ही बसाई। हम शान से रायसीना हिल्स कहते हुए उनकी बनाई इमारतों में रहते हैं और हमारे राष्ट्रीय बोध को कुछ भी नहीं होता, बल्कि समृद्ध ही होता है।

जिस बंगाल के विभाजन से स्वदेशी आंदोलन का जन्म हुआ और भारत माता का अस्तित्व सामने आया, उस विभाजन को अंजाम देने वाले लॉर्ड कर्जन के नाम पर भी सड़क तो है ही। कैनिंग लेन भी है। दिल्ली के इतिहासकार सुहेल हाशमी ने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत ने इतिहासकार पर्सिवल स्पीयर से सड़कों के नाम के बारे में पूछा तो ज्यादातर नाम उन्हीं के दिये हुए हैं। प्राचीन और मध्यकालीन बादशाहों के नाम पर मार्गों का नामकरण हुआ है। अकबर के नाम पर सड़क है तो उसके आसपास की कई सड़कें अकबर के कुछ नवरत्नों के नाम पर भी हैं। तानसेन मार्ग, बीरबल मार्ग, मानसिंह रोड, टोडरमल रोड।

हुकमा बाई मार्ग, जय सिंह रोड, पृथ्वीराज रोड। कौटिल्य मार्ग, अशोक रोड, नेताजी रोड, रानी झांसी रोड, पंचशील मार्ग। सरदार पटेल मार्ग, अमृता शेरगिल मार्ग, सुब्रमण्मियम भारती मार्ग, राजा जी मार्ग। तिलक मार्ग, बाबा खड़ग सिंह मार्ग, नेल्सन मंडेला मार्ग सहित कई विदेशी हस्तियों के नाम पर सड़कें हैं दिल्ली में। ये भारत के अपने इतिहास और दुनिया के इतिहास के प्रति भारत के नज़रिये को पेश करती हैं। हो चिन्ह मार्ग है। डेसमंड टुटू मार्ग है। इन नामों का अपना महत्व है। पहले भी बदले गए हैं। आज भी बदले जाते हैं। इनमें से किसी नाम का चयन इसलिए करना कि वो मुगल है उसका नाम बदल दिया जाना चाहिए, इस तर्क का कोई अंत नहीं है। दिल्ली में पाकिस्तान से आए लोगों ने डेरावल नगर बसाया। गुजरांवाला बसाया। क्या उन्हें भी बदला जा सकता है। लाहौर में आज भी दयाल सिंह कॉलेज है। दिल्ली में भी दयाल सिंह कॉलेज है। लाहौर में लाल चौक का नाम भगत सिंह पर रखने का प्रयास हुआ, मगर कामयाबी नहीं मिली।

इसी तरह से इतिहास से जुड़े नायकों का मसला सार्वजनिक जीवन में लाया जाता है। पहले कहा जाता है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई है, फिर जयंती की बात होती है, फिर मूर्ति बनाने का एलान होता है आर फिर भूल जाया जाता है। बंगाल में चुनाव आने थे इसलिए दिसबंर-जनवरी के महीने में नेताजी की फाइल को लेकर काफी चर्चा होने लगी। नेताजी के परिवार को दिल्ली बुलाया जाने लगा। एक किस्म की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। कभी प्रधानमंत्री मोदी फाइलों को सार्वजनिक करने की बात करने लगे। प्रधानमंत्री ने 100 फाइलों को सार्वजनिक कर दिया तो ममता बनर्जी ने 64 फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। टीवी चैनलों पर नेताजी की मौत के रहस्यों को लेकर लंबे-लंबे कार्यक्रम बनने लगे। बहस होने लगी। अब चुनाव बीत गया है। नेताजी को सब भूल गए हैं। हज़ारों पन्ने की फाइल जनता के लिए खोल दी गई है। पहले जनता सरकार से आशा करती थी कि उसकी तरफ से इन फाइलों को पढ़कर बताया जाएगा। अब जनता से कह दिया गया है कि वो इन फाइलों को पढ़ ले। 12 हज़ार से अधिक पन्नों को क्या जनता पढ़ सकती है। क्या इन फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद हम नेताजी की मौत के बारे कुछ भी अंतिम या अधिकृत रूप से जानते हैं।

इसी तरह से कभी नेहरू की बात आ जाती है तो कभी गांधी की। कभी सावरकर की बात उठने लगती है तो कभी पटेल की। सब अपने अपने हिसाब से व्यक्तियों नायकों को चुनते हैं और इतिहास की ऐसी व्याख्या करते हैं जैसे वही व्यक्ति एकमात्र निर्णायक था। फिर दो नायकों के बीच प्रतिस्पर्धा होने लगती है। इस बीच इतिहास को लेकर इतनी भ्रांतियां और दावे फैल जाते हैं कि इतिहासकार अखबारों में लेख लिखने लगते हैं। दो साल में छपे इतिहास से जुड़े लेखों का संकलन कर लेंगे तो चलता फिरता इतिहासकार हो जायेंगे।

लोकसभा चुनाव से पहले सरदार पटेल को लेकर खूब चर्चा हुई। सम्राट अशोक की जाति के बहाने उन पर भी चर्चा हुई। टीपू सुल्तान की जयंती के नाम पर टीवी स्टूडियो में मैच होने लगा। अंबेडकर बनाम नेहरू की फाइल खुली तो भगत सिंह पर भी बहस हो गई। इस बीच भारत माता का विवाद भी इतिहास से ही जुड़ा है। इस बहस में भी इतिहास के कई पन्ने खुले। सरस्वती नदी से लेकर वंदे मातरम तक खूब झगड़ा हुआ। महिषासुर से लेकर गुरुग्राम तक। मिथक, इतिहास, संस्कृति। न जाने कितने विषय आये और कितने चले गए। भगत सिंह का मुद्दा खत्म होते ही महाराणा प्रताप का आ जाता है। एक किस्म की रिले रेस लगी हुई है। इन बहसों से हमारा इतिहास बोध कितना समृद्ध हुआ, ये आप ही बेहतर बता सकते हैं। पर इतना ज़रूर है कि हम भले ही इतिहास पढ़ने से बचते हैं, इतिहास की पढ़ाई को हिकारत से देखते हैं, लेकिन जिस तरह से चर्चा हुई है उससे लगता है कि इतिहास ही हमारा भविष्य है। हम जब 90 के दशक में इतिहास पढ़ने आए थे तो पहली ही कक्षा में बताया गया था कि इतिहास राजा रानी और नायकों के गुणगान और बायोग्राफी से आगे निकल चुका है। इतिहास का मार्क्सवादी दौर भी अंतिम अवस्था में है। सबाल्टर्न इतिहास के ज़रिये आम लोगों का इतिहास और उनके बीच इतिहास की समझ सामने आने लगी। इतिहास लेखन की इतनी धाराएं देखी जिसमें हर धारा अपने से पहले की व्याख्या को चुनौती दे रही थी। राजनीति जिस इतिहास लेखन के बारे में बताती है क्लास रूम में वैसा इतिहास नहीं है। कई बार लगता है कि इतिहास फिर से राजा रानी और नायकों के चरित्र के किस्सों में समेटने लगा है। उसका आकाश इतना फैला हुआ है, मगर कोई है जो समेट रहा है। यह भी सही है कि दक्षिणपंथी इतिहासलेखन और वामपंथी इतिहासलेखन में ज़बरदस्त संघर्ष रहा है। मगर यह संघर्ष नई सरकार के आने से क्यों चर्चा में आता है, नए शोध या नई किताब से क्यों चर्चित नहीं होता। सवाल है कि आप इन नाइंसाफियों को कैसे देखेंगे। अपनी सरकार के हिसाब से या नए तथ्यों के हिसाब से।

क्या किसी ने अशोक, भगत सिंह, सरदार पटेल या महाराणा प्रताप पर कुछ नया लिखा है, जिसके आधार पर पुराने किसी राजनीतिक लेखन को चुनौती दी जा रही है। सड़क का नाम बदलकर, एक चैप्टर जोड़कर या चैप्टर से एक पैरा हटाकर हम किसी नायक को न तो जगह दे सकते हैं, न ही उसके साथ इंसाफ कर सकते हैं। सारा हल्ला किसी की जयंती तक ही सीमित रहता है। जयंती की तारीख गुज़रते ही दूसरे नायक की बात होने लगती है। क्या आप दर्शक भी हर विवाद के साथ इन नायकों से जुड़ी किताबें ख़रीद लाते हैं या टीवी की बहसों में जो कहा जाता है उसे ही तथ्य मान लेते हैं। क्या इनसे इतिहास को लेकर सुचिन्तित तरीके से बहस हो रही है या अपनी दावेदारी को सही ठहराया जा रहा है।

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