महिलाओं की आजादी की बात करते समय सबसे पहले यह तय करना जरूरी है कि हम किस महिला की बात कर रहे हैं. दुनिया की हर महिला एक जैसी जिंदगी नहीं जीती. इलीट परिवार की महिलाओं के लिए आजादी के सवाल अलग हो सकते हैं. उसके लिए पिता, पति या बेटे के साथ बराबरी, व्यक्तिगत पहचान और सामाजिक सत्ता बड़े सवाल हो सकते हैं. वह राहुल गांधी के स्वर में स्वर मिलाकर स्मैश पेट्रिआर्की का नारा लगा सकती है और अगली छुट्टियों में यूरोप जा सकती है.
लेकिन भारत की ज्यादातर महिलाओं के लिए आजादी या नारीवाद का अर्थ सबसे पहले कुछ और है.
एक युवा महिला की कल्पना कीजिए. उसका नाम लालमुनिया रख लेते हैं. वह 19 साल की है और अभी-अभी पास के गांव के एक जवान और स्वस्थ युवक से उसकी शादी हुई है. शादी हो चुकी है. घर में खुशी का माहौल है. लालमुनिया अपने नए घर आ गई है और शादीशुदा जिंदगी की पहली रात शुरू हो चुकी है.
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रात में किसी समय उसे पेशाब लगती है. वह घर में टॉयलेट ढूंढती है. लेकिन घर में टॉयलेट है ही नहीं.
उसका पति झिझकते हुए बताता है कि घर में शौचालय नहीं है. उसे पास के खेत में जाना होगा. खेत किसी दूसरे परिवार का है. उसे चुपचाप वहां जाना होगा, अपनी जरूरत पूरी करनी होगी और किसी की नजर पड़ने से पहले वापस लौटना होगा. अगर खेत के मालिक परिवार का कोई व्यक्ति उसे देख ले तो वह उसे डांट सकता है, गाली दे सकता है या खेत से भगा सकता है.
और यह सिर्फ उस एक रात की बात नहीं है.
अब से लालमुनिया को हर दिन इस बात का हिसाब रखना होगा कि वह कब पेशाब करने जाए, कब शौच जाए, बाहर कितना अंधेरा है, कोई उसे देख तो नहीं रहा और अगर साथ जाने वाला कोई है तो कौन है. जब जरूरत हो, वह घर के बाथरूम में जाकर दरवाजा बंद नहीं कर सकती. बाथरूम है ही नहीं. उसके लिए दिन का उजाला सिर्फ दिन का उजाला नहीं रह गया है. खाली खेत सिर्फ खाली खेत नहीं है. टॉयलेट जाना अब उसके लिए सामान्य जरूरत पूरी करने की सीधी-सादी प्रक्रिया नहीं रह गई है.
लालमुनिया के लिए टॉयलेट सिर्फ टॉयलेट नहीं है. जो चीज किसी एक व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी का एक मामूली हिस्सा हो सकती है, वही किसी दूसरी महिला के लिए निजता, सुरक्षा और सम्मान का सवाल बन सकती है.
लालमुनिया कोई एक लड़की नहीं थी. 2014 में भारत में करीब 11 करोड़ ग्रामीण परिवार ऐसे थे, जिनके पास शौचालय नहीं था. उस एक आंकड़े के पीछे लालमुनिया जैसी करोड़ों महिलाएं थीं. उनके लिए टॉयलेट जाना कोई निजी और सामान्य काम नहीं था. उन्हें इसके लिए अंधेरे का इंतजार करना पड़ता था, अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना पड़ता था, किसी दूसरे की जमीन पर जाना पड़ता था और इस डर के साथ रहना पड़ता था कि कोई उन्हें देख न ले.
फिर किसी ने तय किया कि लालमुनिया की स्थिति को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह लंबे समय से ऐसी ही चली आ रही है या पहले किसी प्रधानमंत्री ने इस बारे में नहीं सोचा.
2014 में नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया. स्वच्छ भारत मिशन और हर घर टॉयलेट अभियान के जरिए लक्ष्य रखा गया कि हर ग्रामीण परिवार के पास शौचालय हो और खुले में शौच की प्रथा खत्म हो. इसके बाद के वर्षों में ग्रामीण मिशन के तहत 10 करोड़ से ज्यादा घरेलू शौचालय बनाए गए.
महिला सशक्तीकरण का यह भी एक तरीका है. न कोई बड़ा नारा, न कोई विचारधारा, न कोई रिसर्च पेपर. बस उस काम को करना जिसकी वास्तव में जरूरत थी.
अब एक दूसरी कहानी पढ़िए. इस बार महिला लालमुनिया नहीं, लालमुनिया की मां है. कहानी 2013 की है.
लालमुनिया की मां पास के कस्बे में सब्जियां बेचती है. वह थोड़ी-सी नकदी लेकर मंडी जाती है, वहां से सब्जियां खरीदती है और उन्हें खुदरा बाजार में बेचती है. उसका अपना बैंक खाता नहीं है और बैंक कर्ज तक उसकी पहुंच बहुत कम है. जब पैसों की जरूरत पड़ती है तो उसे ऊंची ब्याज दर पर साहूकार से उधार लेना पड़ता है. उसका कारोबार छोटा ही रहता है, क्योंकि सस्ती पूंजी तक पहुंच नहीं है.
वह कमाती है, लेकिन अपनी कमाई पर उसका नियंत्रण नहीं है. वह जो कुछ कमाती है, पति को दे देती है. अपनी जरूरत के लिए भी उसे पति से पैसे मांगने पड़ते हैं. सरकारी मदद की कोई योजना हो भी तो उसका पैसा सीधे उसके हाथ तक पहुंचना आसान नहीं था. और हम जानते हैं कि सरकारी पैसा रास्ते में क्या होता था. 85 प्रतिशत तो गायब ही हो जाता था!
फिर 2014 में प्रधानमंत्री जनधन योजना आई.
लालमुनिया की मां जैसी महिलाओं के लिए, जो कमाती थीं लेकिन अपनी कमाई पर उनका नियंत्रण बहुत सीमित था, अपने नाम से बैंक खाता खुलना एक बड़ा बदलाव था. बैंकिंग अब केवल उन लोगों की चीज नहीं रही जिनके पास पक्की नौकरी, बड़ी बचत या व्यवस्था में पहुंच थी.
इसके बाद डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर ने इस बदलाव को और आगे बढ़ाया. आधार और मोबाइल से जुड़ी बैंकिंग व्यवस्था ने इसमें मदद की. सरकारी योजनाओं का पैसा अब बीच में कई स्तरों और बिचौलियों से गुजरने के बजाय सीधे महिला के बैंक खाते में पहुंच सकता था. इसमें किसी के एहसान की जरूरत नहीं रही.
उज्ज्वला जैसी योजनाओं ने घर की एक बुनियादी जरूरत, एलपीजी कनेक्शन, को भी सीधे महिलाओं के जीवन से जोड़ा. गरीब परिवारों को 10 करोड़ से ज्यादा गैस कनेक्शन दिए गए.
प्रधानमंत्री आवास योजना ने महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को एक और आधार दिया. घरों का महिलाओं के नाम पर या उनके साथ संयुक्त नाम पर रजिस्टर कराने को प्रोत्साहित या अनिवार्य करने से लाखों महिलाओं के पास पहली बार अपनी जायदाद आई. इससे उन्हें अधिक सुरक्षा मिली और परिवार के भीतर उनकी बात का वजन भी बढ़ा.
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने एक कदम और आगे बढ़ाया. छोटे कारोबार करने वालों को बिना संपत्ति गिरवी रखे बैंक से कर्ज मिलने का रास्ता खुला. 2025 तक 50 करोड़ से ज्यादा मुद्रा लोन स्वीकृत किए जा चुके थे और इनमें करीब 70 प्रतिशत लोन खाते महिलाओं के नाम थे.
लखपति दीदी पहल का उद्देश्य भी यही है कि स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं अपने परिवार की सालाना आय को कम से कम एक लाख रुपये तक पहुंचा सकें. इसके लिए उन्हें स्किल, कारोबार और फाइनैंस तक पहुंच उपलब्ध कराने पर जोर है. 3 करोड़ से ज्यादा महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी थीं.
यही असली सशक्तीकरण है. केवल महिलाओं से यह कहना नहीं कि वे स्वतंत्र हैं, बल्कि उन्हें प्राइवेसी, अपना बैंक खाता, पैसे तक सीधी पहुंच और रोजमर्रा के फैसलों पर अधिक नियंत्रण देना.
यहीं राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को तोड़ने' वाले विमर्श से बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है. पुणे में उनके हाल के बयानों में यह धारणा दिखाई देती है कि महिलाएं मूलतः पिता, पति और बेटे के कंट्रोल में फंसी हुई हैं और उनकी मुक्ति का रास्ता परिवार के ढांचे को तोड़ने से होकर जाता है.
लेकिन लालमुनिया और लालमुनिया की मां जैसी करोड़ों महिलाओं के सामने बाधाएं कई बार इससे कहीं ज्यादा ठोस और सीधी होती हैं. घर में टॉयलेट नहीं है. अपना बैंक खाता नहीं है. अपनी कमाई पर स्वतंत्र नियंत्रण नहीं है. घर अपने नाम नहीं है. सस्ता कर्ज नहीं है. कारोबार बढ़ाने का अवसर नहीं है.
उनके लिए सशक्तीकरण की शुरुआत इन ठोस बाधाओं को हटाने से होती है.
यह नारीवाद की एक अलग और ज्यादा जमीन से जुड़ी हुई समझ है. इसमें महिला से यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती कि वह स्वतंत्र है. उसे वे साधन दिए जाते हैं, जिनके जरिए वह खुद अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर सके.
अब लालमुनिया की कहानी पर लौटते हैं.
लालमुनिया का पति उससे प्यार करता है. आजकल कभी-कभी उसे खुद पैसों की जरूरत पड़ती है तो वह लालमुनिया से पूछ लेता है, “कुछ पैसे दे सकती हो?”
और लालमुनिया अगर अच्छे मूड में हो तो बस मुस्कुरा देती है और अपने फोन से उसके फोन पर UPI के जरिए पैसे भेज देती है.
यह भी सशक्तिकरण है.
किसी को पैसे देने या न देने का अधिकार. अपने पैसे पर अपना निर्णय. और अपने पास कुछ ऐसा पैसा होना, जिस पर पहला अधिकार खुद उसका हो.