विदेश नीति का मसला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. राष्ट्र का हित सर्वोपरि है. सत्ता पक्ष या विपक्ष इस मसले को अंदरूनी चुनावी पहल से दूर रखते हैं. लेकिन जब लोकतांत्रिक मूल्य का विघटन होता है तो विदेश नीति के विषय भी राजनीति के शिकार बन जाते हैं. जिस तरीके से विपक्षी पार्टी के नेता ने प्रधानमंत्री की मिमिक्री विदेश नीति के संदर्भ में की उससे देश क्षुब्ध हुआ और पीड़ा भी हुई.ब्रिटेन में तो विपक्ष को शैडो कैबिनेट के रूप में देखा जाता है. विपक्षी नेता की हैसियत एक भावी प्रधानमंत्री के रूप में होती है. इसलिए गरिमा भी उसी अनुरूप होनी चाहिए. इसलिए आज सच को परखना जरूरी है. विदेश नीति को लेकर कांग्रेस और बीजेपी में क्या बुनियादी अंतर रहा है? गलतियां किसके द्वारा हुई हैं?
नेहरू के दौर की विदेश नीति कैसी थी
जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारतीय विदेश नीति एक व्यक्ति पर टिकी हुई थी. आलोचकों के मुताबिक इस दौर में कई रणनीतिक खामियां थीं. जैसे 'पंचशील' और एशियाई एकजुटता के भरोसे भारत ने खुफिया रिपोर्टों और 1950 में तिब्बत पर चीनी क़ब्ज़े को नज़रअंदाज़ किया. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बुनियादी ढांचे का विकास रोक दिया गया और रक्षा तैयारियों को कम आंका गया. नतीजतन 1962 के भारत-चीन युद्ध में हार का सामना करना पड़ा.इस दौरान अक्साई चिन हमेशा के लिए हाथ से निकल गया. उस समय यह सोच थी कि सीमा पर सड़कें न बनाने से चीनी सेना का आगे बढ़ना मुश्किल होगा, जिसने चीन को एक बड़ा रणनीतिक फ़ायदा दे दिया. 1990 और 2000 के दशक में सीमा विवाद टालकर व्यापार बढ़ाया गया. इससे चीन ने भारी व्यापार घाटा बनाया और भारत के चारों तरफ 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' का जाल फैलाया.
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कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण
1947–1948 में पाकिस्तानी घुसपैठियों को पूरी तरह सैन्य कार्रवाई से खदेड़ने के बजाय नेहरू इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गए. इसे सीधे हमले (अध्याय VII) के बजाय शांतिपूर्ण समाधान (अध्याय VI) के तहत ले जाया गया. इसमें जनमत संग्रह का प्रस्ताव रखा गया. इसने एक द्विपक्षीय मुद्दे को स्थायी अंतरराष्ट्रीय विवाद बना दिया.
अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने कई मौकों पर भारत को एशिया में नेतृत्वकारी भूमिका की स्थायी सदस्यता के संकेत दिए. लेकिन नेहरू ने भारत के बजाय चीन को मान्यता दिलाने और शामिल कराने को प्राथमिकता दी.
सरदार पटेल की 'दो मोर्चों पर खतरे' की चेतावनी और डॉ. बीआर अंबेडकर द्वारा गुटनिरपेक्षता की आलोचना को दरकिनार कर दिया गया. नेहरू ने 1947 से 1964 तक खुद विदेश मंत्रालय संभाला और नीतियां अपने करीबी दायरे तक सीमित रखीं. पटेल ने 1950 में तिब्बत के बाद उत्तरी सीमाओं को मजबूत करने की चेतावनी दी थी. वहीं, अंबेडकर का मानना था कि यह नीति पश्चिमी लोकतंत्रों को दूर कर रही है और कम्युनिस्ट तानाशाही को बढ़ावा दे रही है.
पश्चिम एशिया पर भारत की हिचकिचाहट
भारत ने 1950 में इज़रायल को मान्यता तो दी, लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 तक नहीं बनाए. आलोचकों का मानना है कि घरेलू मुस्लिम मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने इज़रायल के साथ संबंधों को छुपाकर रखा और फिलिस्तीन के साथ खुले समर्थन को प्राथमिकता दी. साल 1992 में संबंध सामान्य होने के बाद भी रक्षा और खुफिया सहयोग को हमेशा पर्दे के पीछे रखा गया.
नरेंद्र मोदी की सरकार में विदेश नीति
प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति की प्रक्रिया का लोकतंत्रीकरण किया. उन्होंने सबसे योग्य नेतृत्व (जैसे विदेश मंत्री एस जयशंकर) को आगे बढ़ाया. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को सुरक्षा मामलों में खुली छूट दी गई. पिछले 13 साल में भारत का कद लगातार बढ़ा है. इस दौरान भारत एक मुखर शक्ति बनकर उभरा है.भारत निष्क्रिय गुटनिरपेक्षता से निकलकर सक्रिय और 'मुद्दों पर आधारित गठबंधन' की ओर बढ़ा है, जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है. भारत केवल संतुलन बनाने वाली शक्ति से हटकर वैश्विक नियम तय करने वाला एक प्रमुख देश बन गया है.विदेश मंत्री एस जयशंकर का प्रसिद्ध बयान, ''यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की नहीं हैं.'' उनके इस बयान ने विकासशील देशों के दृष्टिकोण को बदल दिया.
मोदी सरकार का चीन पर स्पष्ट रुख
2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद, पीएम मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक सीमा पर शांति नहीं होगी, तब तक संबंध सामान्य नहीं हो सकते. चीन के व्यापार और सीमा विवाद को अलग रखने के प्रयास को सीधे खारिज कर दिया गया.
नेहरू जी की अपनी पसंद और आदर्शवादी सोच ने भारत को बहुत नुकसान पहुंचाया. दुनिया की महाशक्तियां चाहती थीं कि भारत एशिया से एक प्रमुख क्षेत्रीय खिलाड़ी बने. अमेरिकी और सोवियत दोनों गुटों ने अलग-अलग समय पर एशिया में ऐसे नेतृत्व की पेशकश या संकेत दिए थे जो भारत के पक्ष में हो सकते थे. विशेष रूप से, आलोचकों ने नेहरू की इस बात के लिए आलोचना की है कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सीट मिलने के सुझावों को टाल दिया या ठुकरा दिया. उन्होंने ऐतिहासिक रूप से चीन को एक प्रमुख एशियाई देश के रूप में मान्यता दिलाने की इच्छा के चलते चीन को शामिल किए जाने को प्राथमिकता दी.
इजरायल को मान्यता देने से हिचकिचाता रहा भारत
भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता तो दे दी, लेकिन 1992 तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए. आलोचकों का तर्क है कि कांग्रेस ने भारत के बड़े घरेलू मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग को नाराज होने से बचाने के लिए दशकों तक इजरायल के साथ सार्वजनिक संबंधों से परहेज किया. भारत 1974 में फिलस्तीन मुक्ति संगठन और 1988 में फिलस्तीन देश को मान्यता देने वाले पहले गैर-अरब देशों में शामिल था. विश्लेषक इस अटूट और मुखर एकजुटता को सीधे तौर पर घरेलू मुस्लिम भावनाओं को साधने के प्रयास के रूप में देखते हैं. यहां तक कि 1992 में पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में इजरायल के साथ संबंध सामान्य होने के बाद भी, बाद की कांग्रेस-यूपीए सरकारों ने रक्षा, खुफिया और कृषि संबंधों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के बजाय हमेशा गुप्त और सीमित रखा.
मोदी की विदेश नीति ने भारत के रुख को निष्क्रिय गुटनिरपेक्षता से सक्रिय, मुद्दा-आधारित 'मल्टी-अलाइनमेंट' की ओर बढ़ाया है यानी विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय हितों के आधार पर प्रतिस्पर्धी वैश्विक शक्तियों के साथ जुड़ना. उन्होंने भारत की छवि को केवल एक संतुलनकारी शक्ति से बदलकर एक ऐसी अग्रणी शक्ति के रूप में पुनर्परिभाषित किया है जो केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय वैश्विक नियमों और मानकों को सक्रिय रूप से आकार देती है.
भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' नीति
विश्व राजनीति में कई बाधाएं हैं. विश्व राजनीति को समझने के भारतीय दृष्टिकोण ने धीरे-धीरे यूरोप-केंद्रित विचारों को चुनौती दी है.'विश्व मैत्री' और 'ग्लोबल साउथ' की पहलों ने विश्व राजनीति के नए रुझानों को आगे बढ़ा रही हैं. भारत इस दौड़ में मजबूती से खड़ा है. लेकिन भू-अर्थशास्त्र एक बड़ी बाधा है. अमेरिका और चीन काफी बड़ी आर्थिक शक्तियां हैं. वे समझते हैं कि भारतीय दृष्टिकोण उनके हितों के प्रतिकूल है. भारत को रणनीतिक गठबंधनों के साथ आगे बढ़ने और 'मल्टी-अलाइनमेंट' को बढ़ावा देने की जरूरत है. वह दिन भी आएगा जब ग्लोबल साउथ और नॉर्थ आपस में जुड़ेंगे. घरेलू स्तर पर आपसी कलह और राजनीति से राष्ट्रीय हितों और गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए. निश्चित रूप से विश्व एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, भारत की सोच महाशक्तियों के लिए पीड़ा का सबब है, क्योंकि इससे दुनिया की बुनियादी राजनीति के साथ अंतरराष्ट्रीय संगठन का स्वरूप भी बदलेगा. एक बेहतर व्यवस्था की नीव रखी जाएगी. संभव है कि ऐसी व्यवस्था बनाने में समय लगेगा, लेकिन यह भी उतना ही तीखा सच है कि विश्व मैत्री का ढांचा जो एक सिद्धांत के रूप में प्रधानमंत्री ने प्रस्तुत किया है, वह व्यावहारिक रूप में भी दिखाई देगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक नई दिल्ली स्थिति इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)