मुंबई में लंबे समय से हर तरह की बोली, हर तरह के खाने और रोजगार की तलाश में आने वाले लोगों को अपने में समेट लेने की अद्भुत क्षमता रही है. यह ऐसा शहर है जिसकी पहचान लगातार आने-जाने वाले लोगों से बनी है. यहां कटिंग चाय से ऊर्जा मिलती है और ऑटो-रिक्शा व टैक्सी चालक ट्रैफिक जाम के बीच रास्ता निकालते हुए स्थानीय राजनीति पर अपनी टिप्पणी भी करते रहते हैं.
मुंबई में कितना पुराना है स्थानीय भाषा का विवाद
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने भाषा को लेकर एक नया नियम लागू करने की कोशिश की. सरकार ने कहा है कि मराठी नहीं बोलने वाले कैब और ऑटो चालकों को मराठी सीखने के लिए औपचारिक भाषा प्रशिक्षण लेना होगा. प्रशिक्षण की समय-सीमा आ गई, लेकिन बारिश के कारण कक्षाएं प्रभावित हो गईं. इसके बाद राजनीतिक दलों ने समय-सीमा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी. वजह अचानक नरमी नहीं, बल्कि मुंबई की भारी बारिश थी, जिसने भाषा की पढ़ाई शुरू होने से पहले ही पूरी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया.
यह विवाद एक पुराने शहरी सवाल को सामने लाता है, क्या स्थानीय भाषा सीखने की उम्मीद करना लोगों को समाज में बेहतर ढंग से जोड़ने की एक उचित कोशिश है या फिर यह बेवजह का क्षेत्रीय गर्व दिखाना है, जो मुंबई की प्रसिद्ध विविधता और खुलेपन को नुकसान पहुंचाता है?
इस नियम के पीछे की सोच को समझने के लिए स्थानीय संस्कृति को बचाने की चिंता को समझना जरूरी है. भारत में भाषा सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं है. यह विरासत है, पहचान है और कई बार राजनीतिक संघर्ष का मुद्दा भी बन जाती है.
ऑटो और टैक्सी चालकों को क्यों सीखना चाहिए मराठी
ऑटो और टैक्सी चालकों से मराठी सीखने की मांग के पीछे एक सीधा और व्यावहारिक तर्क है. अगर कोई व्यक्ति किसी राज्य में सार्वजनिक सेवा दे रहा है, तो उस राज्य की मुख्य भाषा की थोड़ी-बहुत जानकारी होना कोई बहुत बड़ी या गलत मांग नहीं है. यह उन लाखों स्थानीय लोगों के प्रति सम्मान भी है, जो रोज इन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं.
सोचकर देखिए कि कोई व्यक्ति दिनभर काम करने के बाद उपनगर से पीली-काली टैक्सी में बैठता है. उसे किराया तय करना है या किसी छोटे रास्ते के बारे में बताना है. ऐसे में बातचीत के लिए इशारों या किसी अनुवाद ऐप की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए. नए नियम के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि ड्राइवर से कुछ सामान्य शब्द सीखने, दिशा, नंबर और पता समझने-बताने और नम्रता से अभिवादन करने की उम्मीद करना कोई सांस्कृतिक दमन नहीं है. यह समाज में घुलने-मिलने की बुनियादी जरूरत है. इससे स्थानीय संस्कृति को सम्मान मिलता है और वह अपने ही घर में किसी असुविधाजनक चीज की तरह नजरअंदाज नहीं होती.

मुंबई में टैक्सी और ऑटो चालकों को मराठी भाषा सिखाने के लिए आयोजित एक कक्षा में शामिल लोग.
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लेकिन जैसे ही बात सामान्य शिष्टाचार से आगे बढ़कर इसे अनिवार्य करने और सजा देने की आती है, यह तर्क मुंबई की आर्थिक वास्तविकता के सामने कमजोर पड़ने लगता है. मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी इसलिए नहीं बनी कि उसने बाहर से आने वाले लोगों के लिए भाषा की सख्त शर्तें लगा रखी थीं. इसकी ताकत तो इस बात में रही है कि उत्तर प्रदेश का ड्राइवर, बंगाल का यात्री और बिहार का रेहड़ी वाला आपस में ऐसी भाषा में बातचीत कर लेते हैं, जिसे हम 'बंबइया हिंदी' कहते हैं.
यह भाषा साझा जरूरतों, व्याकरण की ज्यादा परवाह न करने और हाथों के इशारों से मिलकर बनी है. ऐसे में औपचारिक रूप से मराठी सीखने की अनिवार्यता एक आसान और कामचलाऊ व्यवस्था को सरकारी प्रक्रिया की मुश्किल में बदल देती है.
कॉरपोरेट में काम करने वालों से मराठी सीखने को क्यों नहीं कहा जाता
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने यह नियम मानसून के चरम समय में लागू किया और भारी बारिश ने उसकी व्यवस्था ही बिगाड़ दी. इसके बाद नेताओं को 100 दिन की अतिरिक्त समय-सीमा मांगनी पड़ी, ताकि ड्राइवर ठीक से मराठी में 'सीधे आगे जाइए' कहना सीख सकें.
यह पूरा मामला भारतीय प्रशासन की एक खास तस्वीर पेश करता है. बड़े-बड़े सांस्कृतिक अभियान अक्सर जमीन पर बाढ़ से भरे स्कूलों, बारिश और शिक्षकों की कमी जैसी सामान्य समस्याओं से टकरा जाते हैं. आलोचकों का यह कहना भी गलत नहीं है कि टैक्सी और ऑटो चालकों को ही निशाना बनाने से वर्गभेद की गंध आती है. बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स के कॉरपोरेट दफ्तरों और वर्ली की आलीशान इमारतों में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारी, बैंकर्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े लोग रहते हैं, जिनमें से कई लोग मराठी का एक वाक्य भी ठीक से नहीं बोल पाते. हो सकता है वे हिंदी में 'वड़ा पाव' भी मांगें. लेकिन किसी से उनका परमिट रद्द करने या दोपहर में मराठी की कक्षा में बैठने को नहीं कहा जाता.
क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी का बोझ आखिरकार आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर ही क्यों डाला जाए? ये लोग पहले ही गर्मी और उमस में 14-14 घंटे काम करते हैं. मुंबई के कुछ टैक्सी चालकों को शायद ड्राइविंग की अतिरिक्त ट्रेनिंग की जरूरत हो सकती है, लेकिन उन्हें भाषा की कक्षा में बैठाना वास्तविक सांस्कृतिक विकास से ज्यादा राजनीतिक दिखावा लगता है. खासकर चुनाव के समय स्थानीय वोटरों को खुश करने के लिए.
रोजी रोटी की तलाश
जब क्षेत्रीय गर्व किसी व्यक्ति की रोजी-रोटी कमाने के रास्ते में बाधा बनने लगे, तो मुंबई का प्रसिद्ध महानगरीय चरित्र कमजोर पड़ने लगता है. इससे देश के बाकी हिस्सों को यह संदेश जाता है कि मुंबई का खुलापन कुछ शर्तों के साथ है. वे शर्तें स्थानीय भाषा में लिखी हुई हैं.
इसके बाद भी इस बहस को केवल दो हिस्सों में बांटना ठीक नहीं होगा, एक तरफ पूरी तरह खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था और दूसरी तरफ संकीर्ण क्षेत्रीय सोच. मुंबई की असली जिंदगी इन दोनों के बीच है.
मुंबई में सफर करने वाले किसी आम व्यक्ति को यह उम्मीद नहीं होती कि ड्राइवर 17वीं सदी की मराठी कविता सुनाए. उसे तो बस इतना चाहिए कि ड्राइवर से ठीक से बात हो जाए और वह बिना किसी परेशानी के स्टेशन पहुंच जाए. इसी तरह रोजी-रोटी कमाने वाले ड्राइवर को क्षेत्रीय पहचान की राजनीतिक बहस में कोई खास दिलचस्पी नहीं होती. वह बस इतना चाहता है कि उसे रोज का पैसा कमाने दिया जाए और उसे किसी अधिकारी या स्थानीय समूह के डर में न रहना पड़े. इसलिए सही रास्ता न तो सख्त नियम बनाकर तुरंत सजा देने में है और न ही स्थानीय भाषाओं को बेकार या पुराना समझने में. बेहतर रास्ता यह है कि लोगों को आसानी से और कम दबाव में रोजमर्रा की जरूरत वाली भाषा सिखाई जाए, ताकि बातचीत आसान हो और किसी की रोजी-रोटी खतरे में न पड़े.
मुंबई की ताकत कभी एक जैसी भाषा या संस्कृति में नहीं रही है. उसकी असली ताकत अलग-अलग लोगों को अपने भीतर समेटने और इस विविधता के बीच आपसी समझ पैदा करने में रही है. लोग जरूरत पड़ने पर किसी भी भाषा के जरूरी शब्द अपने आप सीख लेते हैं. लेकिन आमतौर पर वे उस भाषा में प्रमाणित स्तर की धाराप्रवाह योग्यता हासिल नहीं करते. उन्हें बस इतना सीखना होता है कि उनका काम चल जाए.मेरा मानना है कि ज्यादातर टैक्सी चालक पहले से ही इतनी मराठी जानते होंगे कि सड़क के किनारे खड़े कुछ स्थानीय लोगों से रास्ता पूछ सकें. उनके लिए भाषा जानने से ज्यादा जरूरी यह है कि उन्हें मुंबई की सड़कें और रास्ते अच्छी तरह पता हों.
क्या भाषा सीखने को अनिवार्य बनाने से बचेगी संस्कृति
मुंबई की पहचान इतनी मजबूत है कि बाहर से आए ड्राइवरों के कारण उसे कोई खतरा नहीं है. उसी तरह महाराष्ट्र की क्षेत्रीय संस्कृति भी इतनी मजबूत है कि उसे बचाए रखने के लिए अनिवार्य भाषा नियमों की जरूरत नहीं होनी चाहिए. अगर राज्य सरकार वास्तव में मराठी को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे लोगों को प्यार और प्रोत्साहन के साथ मराठी सीखने के लिए प्रेरित करना चाहिए. आसान भाषा सीखने की सामग्री उपलब्ध करानी चाहिए और लोगों के बीच आपसी सम्मान बढ़ाना चाहिए. इसके बजाय ऐसी सख्त समय-सीमा तय करना उचित नहीं है, जो मानसून की पहली तेज बारिश में ही बह जाए.
टैक्सी चालकों की मदद के लिए एक आसान तरीका यह हो सकता है कि ड्राइविंग लाइसेंस के साथ मराठी के जरूरी शब्दों और वाक्यों की एक सूची दी जाए या फिर उनके मोबाइल पर चलने वाला कोई आसान ऐप बनाया जाए, जिसे वे ग्राहक की तलाश में गाड़ी चलाते समय सुनकर धीरे-धीरे सीख सकें.
ऐसा जब तक नहीं होता है तब जब ड्राइवर मराठी के शब्द और वाक्य सीखने की कोशिश कर रहे होंगे और नेता समय-सीमा बढ़ाने को लेकर बहस कर रहे होंगे, मुंबई के यात्री वही करते रहेंगे जो वे हमेशा से करते आए हैं, सबसे पास वाले ऑटो में बैठेंगे, हिंदी, मराठी और अंग्रेजी को मिलाकर अपनी बात समझाएंगे और उम्मीद करेंगे कि ड्राइवर ट्रैफिक से बचने के लिए कोई छोटा रास्ता जानता हो. मैं तो बस उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब महाराष्ट्र सरकार यात्रियों के लिए भी मराठी बोलना अनिवार्य कर देगी!
(डिस्क्लेमर: लेखक केरल के तिरुवंतपुरम सीट से चार बार के कांग्रेस सांसद और भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)