बड़ी कृतियां बिना कुछ कहे बहुत कुछ बता या जता जाती हैं. इम्तियाज़ अली की फ़िल्म 'मैं वापस आऊंगा' ऐसी ही एक बड़ी कृति है. एक प्रेम कहानी है, जो भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के बीच घटित हो रही है. एक वादा है जो अधूरा रह गया है. यह वादा एक शख़्स को अगले 78 साल तक याद रहता है. सिरहाने पर मौत खड़ी है लेकिन मन सरगोधा में अटका है.
95 साल के दादा और स्मृतियों का जंगल
यह कहानी नसीरुद्दीन शाह की है, जो 95 साल के हैं और एक शाम अपनी स्मृति के जंगल में खो जाते हैं.इस जंगल में आज़ादी की लड़ाई चल रही है, वतनपरस्ती के नग़मे गाए जा रहे हैं, क्रिकेट खेली जा रही है और प्रेम की पहली छुअन को कुछ संकोच और सिहरन के साथ अनुभव किया जा रहा है. लेकिन इंसानी रिश्तों और मोहब्बत से बनी इस दुनिया में आग लगाने एक राजनीति चली आई है. अंग्रेज़ भारत छोड़ रहे हैं लेकिन उसके पहले इसे दो हिस्सों में बांटा जाना है. किसी को समझ में नहीं आ रहा कि ये हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटेंगे कैसे. कहां पाकिस्तान शुरू होगा और कहां हिंदुस्तान ख़त्म होगा. पंजाब के दो टुकड़े कैसे होंगे? लाहौर में यह बहस चल रही है. ये ख़बरें भी आ रही हैं कि रावलपिंडी में बसे लोगों के सााथ कैसा वहशी सलूक हुआ है. हिंदू और सिख सरगोधा और लाहौर छोड़ कर हिंदुस्तान के किसी हिस्से में बसने के लिए वहां घर-मकान ख़रीद रहे हैं. लेकिन एक लड़का अपनी माशूका से वादा करता है, वह कहीं नहीं जाएगा. किसी भी सूरत में नहीं जाएगा.
इसके समानांतर एक कहानी और चल रही है. एक लड़का लंदन में है. स्टैंड अप कॉमेडियन बनना चाहता है. लेकिन उसकी कॉमेडी पर कोई हंसने वाला नहीं है. वह नौकरी छोड़ देता है. इसके बाद अपनी दोस्त से मिलता है. लेकिन इस दोस्त से उसका रिश्ता क्या है? क्या वह उसकी गर्ल फ्रेंड है? क्या वह उससे प्रेम करता है? क्या वह उससे शादी करना चाहता है? यह कशमकश उसका पीछा कर रही है. उसकी दोस्त उससे नाराज़ हो उठती है. यह लड़का दिलजीत दोसांझ है, नसीर का पोता. उसे दादा की बीमारी की ख़बर मिलती है तो वह लंदन से लौट कर भारत आता है.
भारत-पाक विभाजन की जटिलता
विस्मृति के बियाबान में खोए दादा को समझते-समझते उसके सामने एक बड़ी त्रासदी खुलती जाती है, एक असंभव सी लगती प्रेम कहानी भी. दादा के अटपटे उलझे वाक्यों में वह अर्थ और संगति खोजने की कोशिश करता है. फिर विभाजन की दास्तान उसके सामने आती है. वह किताबों की दुनिया में जा पहुंचता है.पुरानी तस्वीरें देखता है. पाकिस्तान में लोगों से बात करता है. उसे यह सच समझ में आता है कि असली कॉमेडी तो अंग्रेज़ों ने की.भारत-पाक की जटिलता से अनजान रैडक्लिफ़ साहब ने एक लकीर खींच दी और मुल्कों को, लोगों को, उनके घरों को, उनके रिश्तों को दो हिस्सों में बांट और काट दिया. वह रैडक्लिफ और अंग्रेज़ों की इस हरकत को स्टैंड अप कॉमेडी का विषय बनाता है. लंदन में रह रही अपनी दोस्त से उसकी बात होती रहती है. वह पूछता है, क्या इस दौर में ऐसा प्रेम मुमकिन है- ऐसा प्रेम जो न ठीक से जीने दे, न ठीक से मरने दे?
यह सच है कि यह कोई अनजानी कहानी नहीं है. फ़िल्मों में, कहानियों में, उपन्यासों में यह मर्मभेदी कथा बार-बार सामने आती रही है. उन लोगों की ज़ुबानी भी जिन्होंने वह दौर देखा था, जब इंसान इंसान नहीं रह गए थे, सरहद के दोनों तरफ़ हैवानों में बदल गए थे. हालांकि अब वे लोग कम बचे होंगे जिन्होंने वह हौलनाक़ मंज़र देखा होगा. तो लग सकता है कि इम्तियाज़ अली ने नया कुछ नहीं किया है. लेकिन इस पुराने को भी याद करना, नए सिरे से रचना एक बड़ा काम है जिसे इम्तियाज ने बहुत विश्वसनीयता के साथ किया है.
दूसरी बात यह कि यह फ़िल्म फिर से याद दिलाती है कि राजनीति और इतिहास के बड़े फ़ैसलों के बीच जो चीज़ सबसे ज़्यादा कुचली जाती है, वह इंसानी क़द्र है. जिन्होंने भारत-पाकिस्तान को बांटने का फ़ैसला किया, जिन्हें यह इस उपमहाद्वीप का इकलौता न्याय लगा, उन्हें शायद एहसास तक न हुआ हो कि उन्होंने इतिहास की सबसे भीषण त्रासदी को बेलगाम छोड़ दिया है.
विभाजन की विभीषिकाऔर हिटलर की याद
लेकिन जब यह फ़िल्म इतना कुछ बता रही है तो मैं क्यों लिख रहा हूं कि यह बिना कुछ कहे बहुत कुछ बता जाती है? क्योंकि असली चीज़ उस अनकहे में है जो किसी साये की तरह हमारे वर्तमान पर छाया हुआ है. नसीरुद्दीन शाह अपनी बेहोश बड़बड़ाहट में हिटलर को याद करते हैं, कहते हैं कि जिन लोगों ने यह आगज़नी और मारकाट की, वे चांद से आए थे- यानी इस ग्रह के, इस धरती के, नहीं हो सकते. फ़िल्म में प्रगतिशील लेखक संघ का जलसा है, देश के लिए जान देने का जज़्बा है, प्रेमचंद और उनकी कहानी 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन' के नायक-नायिका दिलफ़रेब और दिलफ़िगार की स्मृति है, जिसके मुताबिक वतन की हिफ़ाज़त के लिए बहाया गया ख़ून का आख़िरी क़तरा दुनिया का सबसे अनमोल रत्न है.
और इन सबके साथ एक वादा है जो जान की तरह अटका हुआ है- मैं वापस आऊंगा. क्या ये वह 'ट्राइस्ट विद डेस्टिनी' है- नियति से वह पूर्वनिर्धारित मुलाकात, जिसकी बात नेहरू ने 14-15 अगस्त की दर्मियानी रात भारत की संविधान सभा में की थी? यह रूपक अतिरेकी लग सकता है, लेकिन बिस्तर पर पड़े, अपनी स्मृतियों के अंधेरे में डूबे, अपनी आख़िरी सांसें ले रहे एक बूढ़े की बची-खुची उम्मीद, उसकी बुझ रही आंखों की रोशनी उसका पोता है, जो विभाजन की विभीषिका के पार जाकर प्रेम के मायने समझता है और फिर अपने दादा का छूटा हुआ वादा पूरा करने सरगोधा जा पहुंचता है.
वर्तमान को इतिहास की चेतावनी
क्या हमारी नई पीढ़ी ऐसे छूटे हुए वादे पूरे करने की सोचेगी? इम्तियाज़ अली की फ़िल्म यह सवाल नहीं पूछती- बस वह एक प्रेम कहानी कहती है- इस एहतियात के साथ कि पुराने दौर की नफ़रत नई रगों में दाख़िल न हो, अगर कुछ दाख़िल हो तो वह बस प्रेम हो. फ़िल्म के अंत में तरह-तरह के युद्धों और आतंक के मारे विस्थापित समाजों की ढेर सारी तस्वीरें याद दिलाती हैं कि हम किस तरह अपनी सभ्यता को उजाड़ के बियावान में बदल रहे हैं.
यह वह अनकहा है जो हमारे टीसते हुए, खौलते हुए, लगातार ज़हरीले बनाए जाते समय में चुपचाप कह दिया गया है. इस फ़िल्म को देखना एक बड़ी कविता को पढ़ने जैसा है. इसकी बाक़ी बनावट-बुनावट पर बातचीत इस बात के आगे कुछ फ़ीकी पड़ जाती है. इसके पात्र बहुत नफ़ीस ज़ुबान बोलते मिलते हैं. इसका संगीत एआर रहमान की शैली का है, लेकिन कहीं-कहीं कुछ 'लाउड' सा लगने लगता है. मगर इन सब बातों का ज़्यादा मतलब नहीं है. असली बात वह जज़्बा है जो इस फ़िल्म से उभरता है, वह टीस है जो हमारे भीतर पैदा होती है और वह एहसास है जो पुराने-नए वक़्तों की मोहब्बत और नफ़रत को समझने की कोशिश से पैदा होता है. यह उस वर्तमान को इतिहास की ओर से एक चेतावनी देने की कोशिश है जो ख़ुद वैसा ही इतिहास होने की ज़िद लिए चल रहा है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एनडीटीवी के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)