अपने ग्राफिक्स उपन्यास 'पर्सेपोलिस' से दुनिया भर के साहित्य प्रेमियों के बीच अपनी पहचान बनाने वाली मार्जान सतरापी ने गुरुवार चार जून को आखिरी सांस ली. परिवार के लोगों ने उनकी मौत की वजह उनकी उदासी को भी बताया. हालांकि लेखक और कवि एक तरह से उदासी के घर में भी रहते हैं, इसलिए यह बात कुछ अचरज में डालती है कि इस उदासी के घर में सतरापी सांस लेने लायक नहीं बची होंगी.
मार्जान सतरापी कई मामलों में अनूठी रहीं. उन्होंने अपने लेखन के लिए एक बहुत अप्रचलित या कम स्वीकृत माध्यम चुना था. बल्कि यह ऐसा माध्यम था जो अमूमन बच्चों के साहित्य के लिए इस्तेमाल किया जाता था. ख़ुद सतरापी इसे कॉमिक उपन्यास कहती रहीं. इससे यह भ्रम होता था कि यह कोई हल्का काम होगा. लेकिन सच यह है कि यह बहुत गंभीर कृति है. यह उनकी ऐसी आत्मकथात्मक कृति है जिसमें एक पूरा जमाना अपने अंतर्विरोधों के साथ बोलता है.
सतरापी का बचपन
दरअसल, शोहरत की चमकीली दुनिया के पार सतरापी ने बहुत अंधेरा भी देखा था, बल्कि बहुत तरह के अंधेरे देखे थे. उपन्यास 1980 के आसपास से शुरू होता है. जब मार्जी 10 साल की है. उसका बचपन शाह रजा पहलवी के शासन के खिलाफ चल रहे विद्रोहों को देखते गुजरा है. उसके मां-पिता आधुनिक और उदार विचारों वाले लोग हैं. उसे पढ़ने के लिए दुनिया भर का साहित्य देते हैं. मार्जी मार्क्स, लेनिन, बाकुनिन- सबके नाम जानती है, उसने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद भी पढ़ डाला है और भारत के स्वाधीनता संग्राम में गांधी की भूमिका से भी परिचित है. उसे मालूम है कि भारत में महात्मा गांधी ने हिंदू-मुसलमान एकता के हथियार से अंग्रेजों से लोहा लिया था.
वह मनुष्यता की बात करने वाले गांधी के अलावा धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले कमाल अता तुर्क को भी जानती है. एक तरफ ये किताबें हैं और दूसरी तरफ वह अनुभव है जो उसे ईरान में चल रही बगावत की रोशनी में मिल रहा है. शाह अमेरिका का पिट्ठू है और उसके खिलाफ कम्युनिस्टों, साम्राज्यवाद विरोधी और इस्लामी क्रांति चाहने वालों सबने सड़क पर आंदोलन छेड़ रखा है. लोग जेलों में हैं, गोलियां खा रहे हैं, लड़ रहे हैं. मार्जी इन संघर्ष करने वालों को देखकर अभिभूत है. वह अपने बागीचे में दोस्तों के साथ ही ऐसी बगावत का खेल खेलती है. बाद में सड़क पर भी उतरती है. इस छोटी सी बच्ची को हालांकि यह अफसोस है कि क्रांति के लिए उसके मां-पिता ने वैसी कुरबानियां नहीं दी हैं जैसी उसके कुछ दोस्तों के परिजनों ने दी हैं. उसे अपने एक चाचा अनूश का पता चलता है जो शाह की जेल में बरसों रहे और किसी तरह वहां से निकल पाए हैं. उसे अपना हीरो मिल जाता है.
क्रांति का पड़ा असर
अंततः यह आंदोलन कामयाब होता है, शाह रजा पहलवी को ईरान छोड़ कर भागना पड़ता है, लेकिन जो क्रांति कामयाब हुई है, वह सबसे पहले अपने लक्ष्य को ही खाने पर तुली है. ईरान का रेडियो बता रहा है कि देश के 99 फीसदी से ज्यादा लोगों ने इस्लामी हुकूमत के हक में वोट दिया है. यहां से एक नई शुरुआत होती है- एक नए संघर्ष की शुरुआत, जिसमें पिछले संघर्ष के नतीजों से पैदा मायूसी और थकान भी शामिल है. मार्जी पाती है कि इस नई क्रांति की सबसे ज्यादा मार औरतों पर पड़ रही है. वे अब चेहरा दिखाते हुए घूम नहीं सकतीं, उनकी आजादियों में लगातार कटौती हो रही है. उनके आत्मसम्मान को खत्म किया जा रहा है. मार्जी की मां बिना चेहरा ढंके कार लेकर निकलती है तो उसे सड़क पर पुलिस अपमानित करती है, उसे रेप की धमकी दी जाती है- वह भन्नाई हुई है. लेकिन इस कठमुल्ला हुकूमत का चाबुक सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं झेलना पड़ रहा है, तमाम प्रगतिशील मूल्यों और संस्थान भी इसकी चपेट में हैं. ईरान में विश्वविद्यालयों को बंद किए जाने का एलान होता है क्योंकि वहां छात्र ‘पश्चिमी और साम्राज्यवादी तालीम' हासिल कर रहे हैं.

मार्जी ने छोड़ दिया देश
आखिरकार मार्जी देश छोड़ देती है और पढ़ाई के लिए वियना चली जाती है. इसी मोड़ पर उपन्यास का यह हिस्सा खत्म होता है. दरअसल यह ग्राफिक्स उपन्यास दो हिस्सों में बंटा हुआ है.
वियना के अनुभव
दूसरा उपन्यास वियना में मार्जी के अनुभवों से बनता है. यहां भी एक सांस्कृतिक टकराव और सामाजिक अकेलापन है जिसे मार्जी को झेलना पड़ता है. यहां समाज का खुलापन देखकर पहले वह चकित होती है, फिर इससे जुडती है, यहां प्रेम भी करती है और धोखा भी खाती है और अंततः इस प्रेम से बाहर आती है. एक समय ऐसा आता है जब उसके पास सारे पैसे खत्म हो चुके हैं और वह ऐसी सार्वजनिक जगहों की तलाश में है, जहां वह रात को सो सके. इस दौरान उसे ड्रग पेडलिंग तक करनी पड़ती है. फिर उसके मां-पिता आते हैं, फिर वह लौटती है, शादी करती है और एक दिन मौत के हाथों अपनी मां को खो देती है.
मार्जान सतरापी ने एक साक्षात्कार में कहीं कहा था कि उनको कल्पना नहीं थी कि यह उपन्यास इतना कामयाब होगा. उन्होंने तो यहां तक सोचा था कि वे इसकी पचास छायाप्रतियां करा कर अपने दोस्तों के बीच बांट देंगी. फिर यह उपन्यास इस कदर चर्चित क्यों हुआ? क्योंकि यह बहुत विश्वसनीय और प्रामाणिक ढंग से लिखा गया है. इसमें वह दर्द है जिसे ईरान के लोगों ने भुगता है. उपन्यास में शाह के समय दी जाने वाली यातनाओं के जो ब्योरे हैं, वे डराते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस यथार्थ का वहन करते हुए उपन्यास कहीं भी बोझिल नहीं होता. उल्टे वह जितने संक्षिप्त ढंग से सारी बात कहता चलता है उससे समझ में आता है कि सतरापी ने ग्राफिक्स उपन्यास का माध्यम क्यों चुना था. यह उपन्यास जैसे संक्षेपण का जादू है और जो कॉमिक स्ट्रिप इसमें इस्तेमाल किए गए हैं- वे कहीं से कॉमिकल नहीं हैं. वे बस उस यथार्थ को कुछ और भीषणता से रख देते हैं जिसकी ओर उपन्यास के शब्द इशारा करते हैं. यथार्थ का खरापन उपन्यास में है.

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मार्जान ने बाद में और भी ग्राफिक्स नॉवेल लिखे, लेकिन जो शोहरत उनके इस पहले प्रयत्न को मिली, वह बाद की कृतियों को शायद नहीं मिल पाई. लेकिन एक बड़ा उपन्यास ही एक जीवन में पर्याप्त होता है- ये बात बार-बार साबित होती रही है. सतरापी के लिए यह उपन्यास वैसा ही साबित हुआ.
यह ग्राफिक्स उपन्यास मूलतः फ्रेंच मे छपा था और चार खंडों में था. लेकिन बाद में इसका जो अंग्रेजी अनुवाद आया, वह दो खंडों में आया. हिंदी में इसका अनुवाद निधीश त्यागी ने किया है जिसे वाणी प्रकाशन ने छापा है. इसे पढ़ते हुए ईरान का वह मिजाज कुछ समझ में आता है जो झुकना नहीं जानता. ईरानी लोगों ने बहुत लड़ाइयां लड़ीं- अपनों से भी परायों से भी. इस किताब में इराक के साथ चले युद्धों का भी जिक्र आता है. यह ख्याल भी आता है कि तमाम पाबंदियों के बावजूद वहां महान सिनेमा बनाने वाले और महान साहित्य लिखने वाले लोग रहे. यही ईरान है जो ट्रंप की ताकत और ज्यादती के खिलाफ खड़ा है और अमेरिका को नाकों चने चबवा रहा है. मार्जान सतरापी ऐसे समय गईं जब ईरान अपने एक बड़े संकट का सामना कर रहा है. लेकिन जो जज्बा वे छोड़ गई हैं, वह बना रहेगा.
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