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This Article is From Sep 24, 2014

बाबा की कलम से : सबका अपना-सपना, महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना!

Manoranjan Bharti, Rajeev Mishra
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  • Updated:
    नवंबर 20, 2014 15:09 pm IST
    • Published On सितंबर 24, 2014 18:50 pm IST
    • Last Updated On नवंबर 20, 2014 15:09 pm IST

महाराष्ट्र में महादंगल चल रहा है। कांग्रेस-एनसीपी, बीजेपी-शिवसेना सभी ऐसे लड़ रहे हैं मानो अजनबी हों। जबकि बीजेपी−शिवसेना गठबंधन 25 सालों से साथ हैं और कांग्रेस−एनसीपी 15 सालों से साथ सरकार चला रही है। मगर बात बन नहीं रही है।

बीजेपी-शिवसेना को लगता है कि इस बार सत्ता उनकी आनी ही है ऐसे में कौन बनेगा मुख्यमंत्री सबसे बड़ा सवाल है। कौन ऐसा मौका छोड़ना चाहेगा। बीजेपी जाहिर है कि लोकसभा चुनाव के बाद काफी उत्साहित है और मोदी लहर का फायदा उठाना चाहती है।

साथ में कुछ छोटे दल भी हैं जो बीजेपी और शिवसेना के बीच झूल रहे हैं। यह पहला चुनाव है, विधानसभा का जब बाल ठाकरे नहीं हैं। राज ठाकरे कमजोर पड़ गए से दिख रहे हैं। उनके विधायक बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और तैयार बैठे हैं।

आंकड़ों के हिसाब से लोकसभा चुनाव 2014 के अनुसार बीजेपी 131 सीटों पर आगे है जबकि शिवसेना 100 सीटों पर। जाहिर है बीजेपी 130 सीटों से पीछे नहीं हटना चाहती। वहीं, उद्धव ठाकरे पहले ही कह चुके हैं मिशन 150 यानी इतनी सीटें जीतने का लक्ष्य। ऐसे में गठबंधन का पेंच फंस गया है। साथ ही शिवसेना पहले से मानती है कि लोकसभा में अधिक सीटें बीजेपी लड़े और विधानसभा में शिवसेना। अब तनातनी इतनी बढ़ गई है कि बड़े स्तर पर बातचीत नहीं हो रही है।

वहीं, बीजेपी ने छोटे दलों को अपने साथ कर के सेना पर दबाब बनाने की कोशिश की है जैसे राजू शेट्टी की स्वाभिमानी शेतकरी संगठन लोकसभा के आंकड़ों के हिसाब से नौ सीटों पर आगे है।

जाहिर है वह कम से कम 10 सीटें चाहते हैं, जबकि शिवसेना अपनी बात पर अड़ गई है। उससे लगता है कि 15 सालों के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे खिसक रही है। वहीं, हालात कांग्रेस और एनसीपी के लिए भी अच्छे नहीं हैं।

एनसीपी बात नहीं करके समय ले रही है। वह इस इंतजार में भी हो सकती है कि यदि शिवसेना−बीजेपी का गठबंधन टूटता है तो एक मौका हो सकता है नया गठबंधन बनाने का। जानकार मानते हैं कि अजित पवार की रणनीति शरद पवार से अलग है। शरद पवार जहां सोनिया गांधी को शायद न नहीं कह पांए, वहीं अजित पवार के दिल में सोनिया गांधी के लिए शरद पवार जितनी भावना नहीं है। आपको याद दिला दें कि सोनिया गांधी ने एक वक्त में शरद पवार को लोकसभा में विपक्ष का नेता बनाया था।

अजित पवार के लिए दिल्ली से अधिक महाराष्ट्र की राजनीति मायने रखती है और वे जानते हैं कि शरद पवार दिल्ली की राजनीति में कमोबेश अपनी पारी खेल चुके हैं और दिल्ली अब सुप्रिया सुले के हवाले है। ऐसे में अजित पवार के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने के सपने का क्या होगा। यही वजह है कि एनसीपी ने ढाई−ढाई साल मुख्यमंत्री का फार्मूला दिया जिससे कांग्रेस बिफर गई।

यदि 2014 के लोकसभा के आकड़ों को देखें तो कांग्रेस केवल 16 विधानसभा सीटों पर आगे है और उसके पास केवल दो सांसद हैं। जबकि एनसीपी 25 विधानसभा सीटों पर आगे है और उनके पास चार सांसद हैं। ऐसे में बराबर सीटों यानि 144 पर दोनों के लड़ने का एनसीपी का दावा मजबूत है।

मगर अब जो हालात बन रहे हैं उसके अनुसार कांग्रेस सभी सीटों पर लड़ने के लिए तैयार दिख रही है। कांग्रेस को लगता है कि महाराष्ट्र में एनसीपी की हालत खराब है क्येंकि सभी महत्वपूर्ण मंत्रालय जैसे गृह, वित्त, पीडब्लूडी सभी एनसीपी के पास हैं और उनके मंत्रियों के खिलाफ गुस्सा अधिक हो सकता है।

कांग्रेस के रणनीतिकार यह भी मानते हैं कि सीटें जो भी आएं यह अच्छा मौका है सभी सीटों पर हाजरी लगाने का। कहीं न कहीं कांग्रेस को लगता है कि 15 साल लगातार सरकार चलाने के बाद जनता शायद ही इस बार इस गठबंधन को मौका दे और ठीक यही सोच कर एनसीपी चाहती है कि यदि बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटता है तो एक नया गठबंधन बनाकर जनता को कुछ नया पेश किया जाए।

सवाल वही है, सबका अपना-सपना है महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना। कुर्सी एक है और दावेदारों में उद्धव ठाकरे, नितिन गडकरी, अजित पवार और पृथ्वीराज चौहान सभी हैं।

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