मध्य प्रदेश को एक समय पूरे देश में 'सोया स्टेट' के नाम से जाना जाता था. 1980 और 1990 के दशक में सोयाबीन के विस्तार ने राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को बदल दिया. लंबे समय तक देश के कुल सोयाबीन उत्पादन में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही. इसी दौर में इंदौर 'सोयाबीन कैपिटल ऑफ इंडिया' के रूप में उभरा और राज्य ने नकदी कृषि की नई पहचान बनाई. आज के हालात का जायजा लेने के लिए पिछले दिनों मैं प्रदेश के महाकौशल इलाके के डिंडोरी जिले में था. वहां मैंने जो देखा और महसूस किया, उसे आप भी पढ़िए.
सोयाबीन की फसल के फायदे क्या हैं
सुबह के सात बजे हैं. डिंडोरी जिले के पिपरिया माल गांव में रात की कोई तीन-चार घंटे की बारिश के बाद मिट्टी की भीनी गंध अब भी हवा में घुली हुई है. सामने मैकाल की पहाड़ियां हैं, जिनकी ढलानों पर छोटे-छोटे खेत सीढ़ियों की तरह फैले दिखाई देते हैं. कहीं सोयाबीन की हरी कतारें हवा के साथ झूम रही हैं, तो कहीं पौधों की पत्तियां बारिश का इंतज़ार करती हुई मुरझाई-सी लगती हैं. खेतों के बीच कोई बड़ी नहर नहीं है, न ही दूर तक स्प्रिंकलर की आवाज़ सुनाई देती है. यहां खेती का सबसे बड़ा सिंचाई तंत्र आज भी आसमान है. किसान की नज़र सबसे पहले अपनी फसल पर नहीं, बादलों पर जाती है.
खेत की मेड़ पर खड़े कपिल राम टाकरे आसमान की ओर देखते हुए कहते हैं,''पहले हम कोदो-कुटकी और धान पर ज़्यादा निर्भर थे. अब सोयाबीन भी बोते हैं क्योंकि नकद पैसा मिलता है. लेकिन मौसम पहले जैसा नहीं रहा. बारिश समय पर हो जाए तो फसल अच्छी होती है, नहीं तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है.''
यही एक वाक्य डिंडोरी की कृषि व्यवस्था का सबसे सटीक परिचय है. मध्य प्रदेश का यह आदिवासी बहुल जिला, जहां बैगा और गोंड समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है, पिछले तीन दशकों में खेती के एक बड़े बदलाव का साक्षी रहा है. कभी कोदो, कुटकी, मक्का, ज्वार, अरहर और मिश्रित खेती पर निर्भर रहने वाला यह इलाका अब बड़ी मात्रा में सोयाबीन की खेती करता है. कृषि विशेषज्ञ इस बात से इनकार करते हैं कि सोयाबीन की खेती मुख्यतः गैर-आदिवासी या कुछ विशेष किसानों द्वारा अधिक की जाती है, लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि सोयाबीन की खेती में कौन शामिल है बल्कि सवाल यह है कि क्या इस बदलाव ने स्थानीय समाज की आर्थिक स्थिति को स्थायी रूप से मजबूत किया है या केवल खेती का स्वरूप बदला है जबकि जोखिम पहले की तरह बने हुए हैं?

डिंडोरी मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल जिला है, पिछले तीन दशकों में यह इलाका खेती में आए एक बड़े बदलाव का साक्षी रहा है.
Photo Credit: Amarendra Kishore
क्या मानसून पर ही निर्भर है सोयाबीन की खेती
डिंडोरी का भूगोल इस प्रश्न का पहला उत्तर देता है. यह जिला मैकाल पर्वतमाला और सतपुड़ा के पठारी क्षेत्र में स्थित है. अधिकांश खेत छोटे, असमतल और ढाल वाले हैं. मालवा के जिलों—देवास, सीहोर या उज्जैन—की तरह यहां विशाल समतल खेत नहीं हैं, जहां बड़े पैमाने पर नहर या पाइपलाइन आधारित सिंचाई आसानी से विकसित की जा सके. यही कारण है कि यहां की कृषि आज भी मुख्यतः वर्षा आधारित है.
डिंडोरी की करीब 64–65 फीसद आबादी अनुसूचित जनजाति की है, इसमें गोंड सबसे बड़ा समुदाय है, जबकि बैगा समुदाय विशेष रूप से समनापुर, बजाग और करंजिया क्षेत्रों में अधिक संख्या में निवास करता है. गैर-आदिवासी समुदाय मुख्यतः डिंडोरी नगर, शाहपुरा और कुछ मैदानी क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं. उपलब्ध कृषि रुझानों के अनुसार शाहपुरा, मेहंदवानी और डिंडोरी ब्लॉकों में सोयाबीन का क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि बजाग और करंजिया में पारंपरिक फसलें (कोदो-कुटकी, मक्का आदि) अभी भी महत्वपूर्ण हैं.
डिंडोरी की कृषि आज भी पूरी तरह मानसून की धड़कनों पर टिकी है. केंद्रीय भू-जल आयोग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार जिले में औसत वार्षिक बारिश करीब 1,450 मिमी होती है, लेकिन इसका असमान वितरण खरीफ खेती को अनिश्चित बना देता है. लगभग 2.05 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलें बोई जाती हैं, इनमें केवल 22 हजार हेक्टेयर (करीब 11फीसद) क्षेत्र सिंचित है, जबकि शेष 1.84 लाख हेक्टेयर वर्षा पर निर्भर है. इसलिए यहां बारिश केवल मौसम नहीं, बल्कि पूरी कृषि अर्थव्यवस्था की धुरी है. कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर पीएल अम्बुलकर के अनुसार सोयाबीन का बढ़ता रकबा किसानों की बदलती आर्थिक सोच का संकेत है, पर स्थायी आय के लिए समय पर बारिश, उन्नत बीज, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, वैज्ञानिक खेती, उत्पादकता और मूल्य संवर्धन अनिवार्य हैं.
बाजार से कितनी जुड़ी हुई है सोयाबीन की खेती
स्थानीय पत्रकार राजीव बलैया कहते हैं कि सोयाबीन ने केवल नई फसल नहीं दी, बल्कि खेती को आत्मनिर्भर व्यवस्था से नकदी आधारित बाजार अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया. अब किसान बीज, उर्वरक और खरपतवारनाशी खरीदता है और पूरी उपज बाजार में बेचता है. डिंडोरी के कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉ. गीता सिंह बताती हैं कि सोया आधारित कंपनियां उपज की खरीद करती हैं. फिर भी वर्षा आधारित परिस्थितियों में प्रति एकड़ 14–18 हजार रुपये की लागत, 7–10 क्विंटल औसत उत्पादन और 4,500–5,000 रुपये प्रति क्विंटल भाव के बीच ही लाभ तय होता है. अच्छी बारिश में 18–30 हजार रुपये तक शुद्ध लाभ संभव है, जबकि कमजोर मानसून या गिरते दाम किसान को कई बार केवल लागत वसूलने तक सीमित कर देते हैं.

डिंडोरी में सोयाबीन की खेती ने केवल नई फसल नहीं दी है, बल्कि खेती को आत्मनिर्भर व्यवस्था से नकदी आधारित बाजार अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है.
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स्थानीय पत्रकार राजीव बिलैया बताते हैं कि सोयाबीन के शुरुआती वर्षों ने डिंडोरी के अनेक किसानों की आय बढ़ाई. अच्छी बारिश वाले मौसम में पक्के मकान बने, कृषि उपकरण खरीदे गए, बच्चों की पढ़ाई और घरेलू जीवन स्तर में सुधार आया. लेकिन यह लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचा; अधिक भूमि वाले किसानों को अपेक्षाकृत अधिक फायदा मिला, जबकि छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह फसल अवसर के साथ जोखिम भी लेकर आई. 20 साल पहले खेती मुख्यतः परिवार के भोजन के लिए होती थी, आज उसका बड़ा हिस्सा बाजार के लिए है.
डिंडोरी के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. पीएल अम्बुलकर के अनुसार सोयाबीन समय पर बारिश पर अत्यधिक निर्भर है; देर से बारिश, लंबे सूखे या अत्यधिक बारिश तीनों उत्पादन को प्रभावित करते हैं, जबकि मानसून अब पहले से अधिक अनिश्चित हो गया है. अनुराग पटेल मानते हैं कि सिंचाई, मूल्य स्थिरता और स्थानीय प्रसंस्करण के बिना यह बदलाव स्थायी समृद्धि नहीं दे सकता. बढ़ती लागत, बाजार के उतार-चढ़ाव और समर्थन मूल्य तक सीमित पहुंच के कारण डिंडोरी में सोयाबीन आज भी किसानों के लिए एक साथ 'उम्मीद की फसल' और 'जोखिम की फसल' बनी हुई है.
क्या किसानों के लिए फायदेमंद है सोयाबीन की खेती
डिंडोरी में सोयाबीन ने खेती को आत्मनिर्भर व्यवस्था से बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ा है. बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी का खर्च लगातार बढ़ रहा है, जबकि आय अब भी अनिश्चित बनी हुई है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए जोखिम अधिक है, क्योंकि समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और बाजार तक पहुंच की व्यावहारिक बाधाएं लाभ को सीमित कर देती हैं. सोयाबीन ने केवल खेत नहीं, भोजन की थाली भी बदली है. लोकमानस यह मानता है कि यदि वर्षा जल का अधिकतम संचयन हो सके, तो भूजल पुनर्भरण बढ़ेगा, खरीफ फसलों की उत्पादकता अधिक स्थिर होगी और किसानों की मानसून पर निर्भरता भी उल्लेखनीय रूप से घट सकती है.
शाहपुर के किसान उत्तम चंदेल कहते हैं कि दस्तावेज़, परिवहन, समय और भुगतान में देरी के कारण कई किसान स्थानीय व्यापारियों को ही उपज बेच देते हैं. उनके अनुसार खेती का अधिकांश श्रम बैगा और गोंड समुदाय की महिलाओं के कंधों पर है, जबकि उसका औपचारिक मूल्यांकन बहुत कम होता है.
कृषि विज्ञान केंद्र, डिंडोरी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के मुताबिक जिले की खेती का भविष्य अधिक बोरवेल में नहीं, बल्कि प्रत्येक गांव के जलग्रहण क्षेत्र के पुनर्जीवन, छोटे जलस्रोतों के संरक्षण, खेत तालाबों और वैज्ञानिक मृदा-जल प्रबंधन में है. जलवायु परिवर्तन ने वर्षा के स्वरूप को अनिश्चित बना दिया है, कभी कम दिनों में अत्यधिक बारिश, तो कभी बुआई के बाद लंबा सूखा. ऐसे में केवल एक नकदी फसल पर आधारित कृषि मॉडल अधिक जोखिमपूर्ण हो सकता है. इसलिए विशेषज्ञ सोयाबीन के साथ दलहन, मोटे अनाज, बागवानी, कृषि वानिकी और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों को किसानों की स्थिर आय का आधार मानते हैं.

डिंडोरी में सोयाबीन की खेती की सफलता किसान की मेहनत से अधिक मौसम और बाजार की शर्तों पर निर्भर है.
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नकदी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते आदिवासी
डिंडोरी का अनुभव बताता है कि सोयाबीन ने आदिवासी समाज को नकदी अर्थव्यवस्था से जोड़ा और अनेक परिवारों की आय बढ़ाई, लेकिन छोटे और बारिश आधारित किसान आज भी मौसम, बाजार और बढ़ती लागत की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं. गोंड समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता रमेश परस्ते कहते हैं, ''आज किसान केवल अच्छी फसल नहीं, बल्कि समय पर बारिश, उचित कीमत, सरकारी सहायता और बदलते मौसम के बीच सुरक्षित भविष्य, इन चारों की एक साथ प्रतीक्षा करता है.''
आने वाले सालों में यह तय होगा कि सोयाबीन डिंडोरी के आदिवासी समाज के लिए स्थायी समृद्धि का आधार बनती है या फिर हर मानसून के साथ उम्मीद और अनिश्चितता के बीच झूलती एक ऐसी फसल बनी रहती है, जिसकी सफलता अंततः किसान की मेहनत से अधिक मौसम और बाजार की शर्तों पर निर्भर करती है.
डिंडोरी के खेतों में हर बरसात के साथ केवल सोयाबीन नहीं उगती; किसानों की उम्मीदें भी अंकुरित होती हैं. फर्क बस इतना है कि इन उम्मीदों की फसल का फैसला अब केवल मिट्टी नहीं, बल्कि बादल, बाजार और नीतियां मिलकर करती हैं.
(डिस्क्लेमर: लेखक जनसरोकार से जुड़े वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और वृत्तचित्र फ़िल्मकार हैं. दिल्ली में रहते हुए उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक सामाजिक न्याय, आदिवासी जीवन, लैंगिक समानता, ग्रामीण भारत, पर्यावरण और गरीबी जैसे मुद्दों पर व्यापक मैदानी रिपोर्टिंग की है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )