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लोग लाइब्रेरी अब भी जा रहे हैं, लेकिन मकसद कुछ और

वन्दना यादव
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 14, 2026 09:03 am IST
    • Published On जुलाई 14, 2026 09:01 am IST
    • Last Updated On जुलाई 14, 2026 09:03 am IST
लोग लाइब्रेरी अब भी जा रहे हैं, लेकिन मकसद कुछ और

स्वतंत्रता प्राप्ती के समय एक देश के तौर पर हमारा लटरेसी रेट बारह प्रतिशत था. आज वर्ष 2026 में यह लगभग 80.9 प्रतिशत है. आंकड़े बताते हैं कि भारत में पढ़ने का स्केल लगातार बढ़ा है और बढ़ रहा है. हर गली-मोहल्ले में लाइब्रेरी खुल गई है. इन लाइब्रेरी की संख्या में लगातार इजाफा भी हो रहा है. यहां पढ़ने वाले बच्चे अपने और लाइब्रेरी के सीमित समय, साधन और सुविधा के कारण शिफ्ट में पढ़ने के लिए आते हैं. अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इससे हमारे देश में पढ़ने की संस्कृति जिसे 'रीडिंग कल्चर' कहते हैं, क्या वह भी बढ़ रहा है? एक देश के तौर पर क्या हम शिक्षा प्राप्त करने के लिए यानी ज्ञान प्राप्ति के लिए पढ़ रहे हैं? इसका सीधा-सा अर्थ यह होता है कि युवावस्था की ओर कदम बढ़ा रहा भारत लाइब्रेरी में मिलता है, लेकिन सभी उम्र और लिंग के लोग पुस्तकालय जाते हैं, ऐसा नहीं है. स्वाध्याय के लए पढ़ने के चलन से एक राष्ट्र के रूप में हम दूर होते जा रहे हैं.

पाठकों की संख्या में कमी

कुछ दशक पहले तक मनोरंजन से लेकर बौद्धिक विलास के लिए लोग पत्र-पत्रिकाओं पर, पुस्तकों पर पर निर्भर थे. पढ़ना हर साक्षर की आवश्यकता थी. आज हालात बदल गए हैं. मनोरंजन के लिए अस्सी के आखिरी और नब्बे के आरंभ दशक में घर-घर तक टेलीविजन की पहुंच के बाद से पाठकों की संख्या में कुछ कमी आनी शुरू हो गई थी. इसके बाद दिन-रात चलने वाले चैनलों पर परोसे जा रहे धारावाहिकों और हर वक़्त दिखाए जाते समाचारों के रूप में भी मनोरंजन के पहुंचने से पाठकों की संख्या में कमी आने लगी थी. मानना होगा कि आज हमारे देश में पढ़ने का चलन कम हुआ है. पुस्तक मेलों में आने वाले जनसैलाब से पाठकों की संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. ऐसे मेलों से वापस लौटने वाले गनती के साहित्य प्रेमियों के हाथों में पुस्तकों के पैकेट होते हैं. स्पष्ट है कि अधिकांशत: साहित्यकार ही एक-दूसरे को पढ़ रहे हैं. हां, कुछ साहित्य प्रेमी अब भी बचे हुए हैं और ऐसा हमेशा, हर युग में होता रहेगा. शेष सब के सब विद्यार्थी हैं जो ऐसे मेलों में मिलने वाले भारी डिस्काउंट से पुस्तकें खरीद रहे हैं. 

गंभीर साहित्यक सत्रों में खाली पड़ी कुर्सियां

कमोबेश यही हाल साहित्योत्सवों यानी लटरेचर फेस्टिवल का है. यह आयोजन सफ साहित्य पर केंद्रित नहीं होते. कला और साहित्य के नाम पर इनमें फिल्म उद्योग से जुड़े कलाकारों को बुलाकर भीड़ जुटाने का काम किया जाता है. ऐसे आयोजनों में गंभीर साहित्यक सत्रों में खाली पड़ी कुर्सियां, साहित्य प्रेमियों का इंतजार करती हैं. यह सच है कि हमारे देश में पुस्तकालय बढ़ रहे हैं, मगर चिंता की बात यह है कि वहां पाठक नहीं हैं. पुस्तकालय में सिर्फ विद्यार्थी बचे हैं. किसी परीक्षा की तैयार के लिए, रिसर्च के लिए अथवा अन्य कसी अध्ययन की तैयारी वाले छात्र पुस्तकालयों का रूख करते हैं. अपने आसपास के लोगों में गनती करके देखिए कि ऐसे कितने लोग हैं जो नियमित रूप से पढ़ने की, ज्ञान प्राप्त करने की भूख शांत करने के लए पुस्तक पढ़ते हैं अथवा ग्रंथालय जाते हैं?

आज देश भर के छोटे-बड़े गांव-कस्बों और शहरों में ग्रंथालय का, पुस्तकालय का स्थान लाइब्रेरी और रीडिंग रूम ने ले लिया है. ऊंची-ऊंची इमारतों के बेसमेंट इसी तरह के अड्डों में तब्दील होने लगे हैं, जो बालकों को परीक्षा से संबंधित जानकारी रटवाकर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलवाने का पता बनते जा रहे हैं.

सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी

हैरानी की बात तो यह है कि आज महानगरों में उग आई बहुमंजिला इमारतों में से कितनी रिहायशी सोसाइटीज में पुस्तकालय हैं? कुछ इमारतें जहां पुस्तकालय हैं, उनके बारे में जानने की बात यह है कि वहां से किस संख्या में नयमित पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों और समाचार-पत्रो की मांग आ रही है? यहां कितने लोग हैं, जो हर दिन नियम से अपनी सोसायटी के पुस्तकालय जाते हैं? मैं दिल्ली एनसीआर और अलग-अलग राज्यों के आंकड़े जुटाने के लिए बार-बार गूगल पर सर्च करती रही लेकिन हर बार निराश हुई. आज देश भर के छोटे-बड़े गांव-कस्बों और शहरों में ग्रंथालय का, पुस्तकालय का स्थान लाइब्रेरी और रीडिंग रूम ने ले लिया है. ऊंची-ऊंची इमारतों के बेसमेंट इसी तरह के अड्डों में तब्दील होने लगे हैं, जो बालकों को परीक्षा से संबंधित जानकारी रटवाकर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलवाने का पता बनते जा रहे हैं. यह भी बहस का मुद्दा है कि ऐसे कोचिंग सेंटर से कितने युवा अपना मनचाहा करियर बनाने में सफल होते हैं. ऐसे कोचिंग सेंटर में सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के उद्देश्य से बड़ी संख्या में युवा पहुंच रहे हैं. यहां स्वैच्छिक रूप से पढ़ने, स्वस्थ विचार-विमर्श करने वालों की उपिस्थति नगण्य है.

लाइब्रेरी का शाब्दिक अर्थ बदला

आज का युवा जब कहता है कि वह लाइब्रेरी जा रहा है, इसका अर्थ समझा जाता है कि वह अपने सिलेबस अथवा अन्य किसी तरह की पढ़ाई करने जा रहा है. लाइब्रेरी का शाब्दिक अर्थ बेशक पुस्तकालय है लेकिन इसका व्यवहारिक अर्थ बदल गया है. कुछ समय पहले तक पुस्तकालय ज्ञान बढ़ाने, शिक्षा हासिल करने का केंद्र थे. वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति ज्ञान के स्थान पर अंक (नंबर) हासिल करने की अंधी रेस बन गई है. इसका सीधा असर बालकों, युवाओं पर दिखाई देता है. वे अच्छा इंसान बनने के लिए और इतिहास एवं भविष्य को समझने के लिए लाइब्रेरी नहीं जा रहे हैं. वे ज्ञान प्राप्त करने के स्थान पर अच्छे नंबर लाने के लिए पढ़ रहे हैं. भटका हुआ तीर कभी लक्ष्य नहीं भेदता. बढि़या रिजल्ट लाने की गलाकाट प्रतियोगितावादी युग में विद्यार्थी भटके हुए तीर की भांति हैं. वह परिश्रम तो कर रहे हैं, मगर उनके लिए बेहतरीन इंसान बनने से अधिक आवश्यक
बढि़या कमाना, धनोपार्जन करना हो गया है.

जो पुस्तकालय कभी ज्ञान का केंद्र थे, वही आज कंपटीशन के युग में किताबी ज्ञान से भरे रोबोट गढ़ रहे हैं. अपनी बात स्पष्ट करने के लए यह बताना आवश्यक है कि - पुस्तकालय का संधिविच्छेद - पुस्तक+आलय अथार्त पुस्तक का घर होता है. यही अर्थ ग्रंथ+आलय = ग्रंथालय होता है. आज पुस्तकों/ग्रंथों के घर जाकर स्वंय को समृद्ध करने के स्थान पर युवा लायब्रेरी जा रहे हैं. यह व्यवहारिक बदलाव हमारी संस्कृति पर विपरीत असर ड़ाल रहा है.

बदलाव के साथ थोड़े लाभ और कुछ चुनौतियों के लिए हमें हमेशा तैयार रहना होता है. आज जिस स्‍थीति में हम हैं, यह सरकारी नीतियों, हमारी लापरवाही और युवाओं के बेख्याली में उठाए गए कदमों का परिणाम है. स्थिति में बदलाव के लिए हम सबको मिलजुल कर प्रयास करने होंगे.

मोबाइल में भी पुस्तक पढ़ने के ऐप के स्थान पर गेम्स

पढ़ना सबको रूचिकर लगता है या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है. साहित्य में किस व्‍यक्ति की कितनी रूचि है, यह भी प्रत्येक व्‍यक्ति के जीवन में अलग तरह से महत्व रखता है. इसके बावजूद बौद्धिक रूप से स्वंय को समृद्ध करने के लए जहाँ कुछ दशक पहले तक रेल-बस यात्रियों के हाथों में पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं होती थीं, आज मोबाइल दिखाई देते हैं. मेट्रो की दिशा तो और भी दयनीय है. प्रत्येक व्‍यक्ति कान में इयरफोन लगाए किसी दूर वाले व्‍यक्ति से बात कर रहा होता है. अपने साथ यात्रा करने वाले से किसी का कोई वास्ता नहीं रह गया है. अधिकांश यात्रियों के हाथ में पकड़ा यह छोटा-सा डिब्बा फिल्म दखाने, गाने सुनाने, बातचीत करवाने अथवा 'गेम' से मन बहलाने का केंद्र बन गया है. हर दिन घंटों का सफर करने वालों के हाथ में कताबें नहीं, मोबाइल हैं. मोबाइल में भी पुस्तक पढ़ने के ऐप के स्थान पर गेम्स, मीम्स, रील, वीडियो हैं जो अनवरत चलते रहते हैं.

आसानी से उपलब्ध मनोरंजन, ज्ञान नहीं

बदलाव के साथ थोड़े लाभ और कुछ चुनौतियों के लिए हमें हमेशा तैयार रहना होता है. आज जिस स्‍थीति में हम हैं, यह सरकारी नीतियों, हमारी लापरवाही और युवाओं के बेख्याली में उठाए गए कदमों का परिणाम है. स्थिति में बदलाव के लिए हम सबको मिलजुल कर प्रयास करने होंगे. एक कहावत है, 'जब जागो, तब सवेरा.' इसी लिए मान कर चलें कि देर कभी नहीं होती. हां जागना हमको ही पड़ेगा. अंग्रेजी कथन 'it's high time.' की तर्ज पर हम बहुत भटकाव झेल चुके हैं. आने वाली पीढि़यों को संक्रमण से बचाने के लए भटकाव से बाहर निकलने का यही सही समय है. याद रखने की बात यह है कि आसानी से उपलब्ध मनोरंजन, ज्ञान नहीं होता. अब ज्ञान प्राप्त करने के लए प्रयास करने होंगे.

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