देहरादून के दून पुस्तकालय और शोध केंद्र में तीन दिन के अंदर दो अलग-अलग महत्वपूर्ण आयोजन हुए. इनमें इतिहास और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. एक ओर 'हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक' पुस्तक के जरिए इतिहास और दावों पर सवाल उठे, वहीं 'खबरपात' के मंच पर हिमालय, पर्यावरण और मीडिया विषय पर चर्चा हुई. दून लाइब्रेरी, देहरादून में इस शनिवार लेखक तापस चक्रबर्ती की पुस्तक ‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक' का लोकार्पण किया गया और इसके साथ ही किताब पर चर्चा भी हुई. इस किताब का प्रकाशन विनसर प्रकाशन ने किया है. लेखक ने बताया कि वे यात्रा-वृत्तांत इस तरह लिखते हैं कि पाठक किताब को उनकी नजर से देख सके और उसे लगे कि वह उस क्षेत्र में स्वयं घूम रहा है. उन्होंने कहा कि जब यूनेस्को ने 2019 में हम्पी को 'Must See Destination' की सूची में डाला, तब से वे वहां घूमना चाहते थे. उन्होंने कहा कि यह जगह एक भौगोलिक करिश्मा है, जहां छोटे-छोटे पत्थरों पर विशालकाय पत्थर रखे हुए हैं.
किष्किंधा से विजयनगर तक: इतिहास और वैभव
तापस कहते हैं कि हम्पी में कोरेकल राइड होती है, जो काफी रोचक है. उन्होंने बताया कि हम्पी का पुराना नाम किष्किंधा है, जिसका रामायण से संबंध रहा है. बाली और सुग्रीव से जुड़े स्थलों का उल्लेख वहां किया जाता है. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताते हुए तापस ने कहा कि हम्पी, विजयनगर राज्य की राजधानी थी. तेनालीराम का संबंध भी वहीं से था. उन्होंने कहा कि विजयनगर की आबादी उस समय पांच लाख से ज्यादा थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना समृद्ध था. 50 रुपए के नोट में जो रथ है, वह हम्पी में ही स्थित है.
तापस कहते हैं कि विजय विट्ठल मंदिर के अंदर ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे अलग-अलग ध्वनियां निकलती हैं और यह बेहद अद्भुत है. जब वे वहां गए, तो उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें पूरा परिसर देखने का अवसर मिला और वहां के दृश्य बेहद शानदार थे. तापस के मुताबिक 1565 के दौरान राज्य में युद्ध हुआ और हार के बाद राजा का परिवार विजयनगर से पलायन कर गया. इसके बाद दूसरी जगह उनका राज्य सीमित ही रह गया.
इस किताब पर लेखक-साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि उन्होंने इस किताब को तीन बार पढ़ा है. इसमें इतिहास की अच्छी जानकारी है और लेखक इसमें गाइड की भूमिका में भी नजर आते हैं. कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉक्टर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि साहित्यकार इतिहासकार भी हो तो हम्पी जैसी किताब निकल सकती है. इस पुस्तक के पन्ने पलटने से हम्पी जाने की जिज्ञासा बढ़ती रहती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह किताब स्कूली छात्रों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, इससे वे अपने इतिहास को ज्यादा गहराई से समझ सकेंगे.
डॉक्टर जितेन ठाकुर ने कहा कि किताब पठनीय है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किताब में बाली के महल की बात कही गई है, लेकिन यह संदेहास्पद लगता है कि त्रेता युग के अंत से अब तक बाली का महल किसी न किसी रूप में मौजूद हो. उनका मानना है कि संभवतः उस क्षेत्र को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे बाली का महल कहा जाता है.
आपदाओं से पर्यावरण तक: ‘खबरपात' में हिमालय और रिपोर्टिंग पर उठे सवाल
देहरादून के दून पुस्तकालय और शोध केंद्र में 'खबरपात' का आयोजन किया गया. खबरपात, उत्तराखंड के मासिक समाचारों और विचारों को परस्पर साझा करने का एक नागरिक विमर्श मंच है. इस साल पत्रकार राजू सजवाण ने हिमालय, पर्यावरण और मीडिया विषय पर कार्यक्रम में अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि हमारे यहां की आपदाओं को ‘इवेंट' कहा जाता है.

देहरादून के दून पुस्तकालय और शोध केंद्र में 'खबरपात' में अपनी बात रखते वक्ता.
हिमालय में पर्यावरणीय संकट पर राजू सजवाण ने कहा कि हिमालय वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं. जल चक्र और हिमपात में बदलाव की वजह से खेती, बागवानी चौपट हो रही है. पहाड़ों में जाकर यह दिखता है कि इससे खेती पर कितना असर हो रहा है. राजू कहते हैं कि हिमालय की हर कहानी पर्यावरण की कहानी है, बस उसे देखने का नजरिया चाहिए. इस बार जल स्रोत सूख रहे हैं लेकिन इस पर कोई रिपोर्ट नहीं हुई है, जब लोग पानी की कमी को लेकर आंदोलन करेंगे तब इस पर रिपोर्ट होगी.
राजू ने कहा कि हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के एक रिसर्च पेपर के अनुसार केवल 4.82 फीसदी खबरें पर्यावरण से जुड़ी होती हैं, इसमें सबसे ज्यादा कवरेज प्राकृतिक आपदाओं पर होती हैं. उन्होंने कहा कि खबरों में 'क्या हुआ' बताया जाता है, लेकिन 'क्यों हुआ' नहीं बताया जाता है. राजू कहते हैं कि उत्तराखंड में मजबूत लोकल रिपोर्टिंग का अभाव है, 2022 में जोशीमठ की आपदा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तब आपदा को इतना सही तरीके से नहीं दिखाया गया लेकिन 2023 की आपदा के बाद हमने देखा कि उसे राष्ट्रीय खबर बना दिया गया, अगर 2022 की घटना की ही सही रिपोर्टिंग कर ली जाती तो अगले वर्ष हुई घटना के लिए सही समय से जागरूक रहा जा सकता था.
राजू ने कहा कि दिसंबर-जनवरी में जो बर्फ गिरनी थी, वह नहीं गिरी और यह चिंताजनक पहलू था पर उस पर कोई खबर नहीं हुई, लेकिन फरवरी में बर्फबारी होते ही यह खबर बन गई, खनन व भूमि उपयोग पर कोई बात नहीं होती. उन्होंने कहा खेती का संकट उत्तराखंड के लिए एक बड़ा संकट है, पारंपरिक खेती छोड़ने जैसे विषय पर गहराई से काम करने की जरूरत है. हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते उन्होंने कहा कि कैसे वहां सेब की खेती में कीटनाशकों के प्रयोग ने कैंसर जैसी बीमारी को न्यौता दिया है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)