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This Article is From May 18, 2018

मी लॉर्ड - कनार्टक के बाद, इंसाफ सोने न पाए

विराग गुप्ता
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 18, 2018 14:02 pm IST
    • Published On मई 18, 2018 13:57 pm IST
    • Last Updated On मई 18, 2018 14:02 pm IST
वोटिंग से पहले ही सरकार बनाने की घोषणा करने वाले आत्मविश्वासी येदियुरप्पा के वकीलों ने विश्वासमत के लिए 15 दिन का समय मांगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद येदियुरप्पा को शनिवार शाम 4 बजे विश्वासमत हासिल करना होगा. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग मामले में बेंच गठन के बारे में पारित प्रशासनिक आदेश को सार्वजनिक करने से इंकार करने वाली जस्टिस सीकरी की बेंच ने येदियुरप्पा द्वारा गर्वनर को लिखे गए पत्रों को पेश करने का आदेश देकर एक बेहतर मिसाल कायम की. कनार्टक मामले पर देर रात सुप्रीम कोर्ट के खुलने और झटपट फैसले से आम जनता में न्यायपालिका के प्रति नया भरोसा जागा है. सांसद और कांग्रेस के वकील सिंघवी ने कहा है कि 'जस्टिस नेवर स्लीप्स', पर आम जनता के लिए यह कितना सच है...? स्वतंत्र चेतना के नाम पर वोट डालने वाले विधायकों को रिसॉर्ट में कैद रखा गया है, तो फिर उन्हें जनता का प्रतिनिधि कैसे माना जाए...?

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कर्नाटक मामले में जल्द फैसले से यह ज़ाहिर हो गया कि आधी रात में जागने वाली अदालतें नियमों का मोहताज हुए बगैर त्वरित न्याय कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने दो सुनवाई के बाद येदियुरप्पा द्वारा बड़े फैसले लेने पर रोक लगा दी, लेकिन आम जनता के मामलों में लंबी सुनवाई के दौरान ही गरीबों की कमर टूट जाती है. सुप्रीम कोर्ट में शाम 4 बजे के बाद कोई मामला दायर नहीं हो सकता, जिसके बाद रजिस्ट्रार द्वारा मुकदमों की पड़ताल में ही महीनों लग जाते हैं. उसके बाद नोटिस, जवाब और सालों बाद सुनवाई के बावजूद फैसला तो हो जाता है, लेकिन गरीबों को न्याय नहीं मिलता.

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एडीआर के आंकड़ों के अनुसार कनार्टक के 97 फीसदी से ज़्यादा विधायक करोड़पति हैं और सत्ता बनाने के खेल में उन्हें 100 करोड़ का ऑफर भी मिल रहा है. कनार्टक के लिए चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार विधायकों के चुनाव में खर्च की सीमा 28 लाख रुपये की है. एक महीने के निवेश में 350 गुना रिटर्न के कारोबार में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सत्ता किसी को भी मिले, परंतु आम आदमी को तो पिसना ही है. संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत सभी नागरिक बराबर हैं और अनुच्छेद-32 के तहत लोगों के जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक व्यवस्था अब बड़े वकीलों और मीडिया की गिरफ्त में है. याकूब मेनन की फांसी को रोकने के लिए कथित मानवाधिकारवादी और कनार्टक के करोड़पति विधायकों द्वारा सत्ता हासिल करने के खेल में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे भी आधी रात को खुल गए, पर आम जनता के लिए ये दरवाजे अब भी बंद हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा गया कि शपथग्रहण से पहले विधायकों द्वारा दूसरी पार्टी के नेता को समर्थन देने से दल-बदल विरोधी कानून का उल्लघंन नहीं होता. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सत्ता के खेल के लिए सूटकेसों के आदान-प्रदान की अनुमति कैसे दी जा सकती है...? भूख और गरीबी से लाचार अपराध करने वाले युवाओं पर रासुका लगाने वाली व्यवस्था अब सत्ताखोर विधायकों पर देशद्रोह का मामला क्यों नहीं दर्ज करती...? नोटबंदी के नाम पर आम जनता को महीनों परेशान किया गया, तो फिर कनार्टक के सभी विधायकों का नारको टेस्ट क्यों न हो, जिससे भ्रष्ट व्यवस्था के माफिया तंत्र के पर्दाफाश से 'रियल न्यू-इंडिया' बन सके. येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए राज्यपाल के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है. सुप्रीम कोर्ट के चार बड़े जजों ने न्यायिक व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े किए थे, जिन पर फैसले के बाद ही जनता को न्याय के जगने का सुखद अहसास होगा.

विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं...

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