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किस राज्य में कितने लोगों ने साइन की है लिविंग विल? सबसे आगे इस प्रदेश का नाम

सुप्रीम कोर्ट से कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी भारत में लिविंग विल को अपनाने वाले लोग अभी कम हैं. हाल ही में एक जिले में 30 लोगों ने एक साथ लिविंग विल साइन की, जिसके बाद इस विषय पर देशभर में चर्चा तेज हो गई है.

किस राज्य में कितने लोगों ने साइन की है लिविंग विल? सबसे आगे इस प्रदेश का नाम
लिविंग विल को लेकर भारत में कितने जागरुक हैं लोग

भारत में जिंदगी के आखिरी दौर के इलाज को लेकर एक खास दस्तावेज इन दिनों चर्चा में है, जिसे लिविंग विल कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट से कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद अभी भी बहुत कम लोग इसके बारे में जानते हैं या इसे अपनाते हैं. लेकिन हाल ही में एक राज्य से आई खबर ने इस विषय को फिर सुर्खियों में ला दिया है. वहां एक जिले में 30 लोगों ने एक साथ लिविंग विल पर साइन किए. ये पहल गंभीर रूप से बीमार लोगों की देखभाल करने वाले एक पेलियेटिव केयर ग्रुप ने की. इस कदम के बाद पूरे देश में इस विषय को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है. तो चलिए आपको बताते हैं कि किस राज्य के कितने लोगों ने एक साथ साइन किया लिविंग विल और किस राज्य का नाम इस मामले में है सबसे आगे.

क्या होती है लिविंग विल

लिविंग विल को एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव भी कहा जाता है. ये एक कानूनी दस्तावेज होता है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से लिखकर अपनी इच्छा बता सकता है. अगर भविष्य में वह किसी गंभीर बीमारी, कोमा या ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह अपनी बात कहने की हालत में न रहे, तो डॉक्टर उसके इलाज को किस तरह जारी रखें या बंद करें, ये उसमें लिखा होता है. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनी मान्यता दी थी. बाद में इसकी प्रक्रिया को थोड़ा आसान भी किया गया ताकि लोग इसे आसानी से तैयार कर सकें.

कौन सा राज्य इस मामले में आगे

भारत के ज्यादातर राज्यों में अभी भी लिविंग विल को लेकर जागरूकता काफी कम है. लेकिन इस मामले में केरल बाकी राज्यों से थोड़ा आगे नजर आता है. इसकी बड़ी वजह वहां का मजबूत पेलियेटिव केयर नेटवर्क माना जाता है. त्रिशूर और कोझिकोड जैसे जिलों में कई संगठन लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार मरीजों और उनके परिवारों के साथ काम कर रहे हैं. यही संगठन लोगों को लिविंग विल के बारे में समझा रहे हैं और उन्हें इसके लिए प्रेरित भी कर रहे हैं.

बाकी राज्यों में क्या है स्थिति

दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी अब डॉक्टर और अस्पताल इस विषय पर चर्चा शुरू कर चुके हैं. हालांकि इसे अपनाने वाले लोगों की संख्या अभी भी सीमित है. कई लोगों को इस दस्तावेज के बारे में जानकारी ही नहीं है, जबकि कुछ लोग कानूनी प्रक्रिया को लेकर उलझन में रहते हैं. यही वजह है कि अभी तक राज्यवार कोई बड़ा आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है.

क्यों बढ़ रही है इसकी जरूरत

आज के समय में मेडिकल तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि कई बार मरीज लंबे समय तक मशीनों के सहारे जिंदा रहता है. ऐसी स्थिति में मरीज की असली इच्छा क्या है, ये जानना मुश्किल हो जाता है. लिविंग विल इसी स्थिति में मरीज की इच्छा को सम्मान देने का एक तरीका बन सकती है. त्रिशूर में 30 लोगों के एक साथ साइन करने की पहल को भी इसी दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. त्रिशूर (Thrissur) में 'पेन एंड पैलिएटिव केयर सोसाइटी' (Pain and Palliative Care Society) के जरिए ये काम हुआ. बताया गया है कि इन 30 लोगों में डॉक्टर, नर्स और वॉलेंटियर शामिल हैं. 

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