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OPINION

इजरायल के अरब दल: हाशिये से सत्ता की दहलीज तक पहुंचने का सफर

इजरायल में संसदीय चुनाव की मतगणना चल रही है. अब तक 90 फीसदी से अधिक वोटों की गिनती हो चुकी है. कोई भी गठबंधन बहुमत का 61 सीटों का आंकड़ा छूता हुआ नहीं दिख रहा है. ऐसे में सरकार बनाने के लिए अरब दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो गया है. इजरायल के राजनीतिक दलों के बारे में बता रहे हैं डॉ. श्रीश कुमार पाठक.

इजरायल के अरब दल:  हाशिये से सत्ता की दहलीज तक पहुंचने का सफर

दो जून 2021 की रात इजरायल के रमत गान स्थित एक होटल में कैमरों की चमक के बीच मंसूर अब्बास ने जिस समझौते पर हस्ताक्षर किए, वह केवल एक राजनीतिक गठबंधन का दस्तावेज नहीं था. आधी सदी से अधिक समय में पहली बार किसी स्वतंत्र अरब दल का नेता इजरायल की राष्ट्रीय सरकार में भागीदारी के लिए आगे आया था. तस्वीरें खूब छपीं, लेकिन इस समझौते तक पहुंचने की कहानी कहीं ज्यादा पुरानी थी. उन बरसों की कहानी, जब इजरायल के अरब नागरिकों के पास वोट डालने का अधिकार तो था, लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज को संगठित करने की गुंजाइश सीमित थी.

इजरायल में अरब दलों का इतिहास क्या है

इजरायली मानवाधिकार संगठन 'अदाला' के मुताबिक, 1948 से 1966 तक फिलस्तीनी नागरिक सैन्य शासन के अधीन रहे. 1965 तक अल-अर्द जैसे स्वतंत्र राजनीतिक दलों को भी चुनावी राजनीति में जगह नहीं मिल पाई. मताधिकार था, लेकिन स्वतंत्र राजनीतिक मंच नहीं. यह दूरी केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि सत्ता की संरचना में स्वीकार्यता की भी थी. फिर आया 1976. अकेवोत अभिलेखागार के मुताबिक, गैलिली में भूमि अधिग्रहण के विरोध में 30 मार्च को हुई आम हड़ताल के दौरान झड़पों में छह अरब नागरिक मारे गए. यह घटना आगे चलकर 'लैंड डे' के रूप में याद की जाने लगी. भूमि के प्रश्न ने नागरिक अधिकारों और राजनीतिक पहचान के सवालों को एक साथ ला खड़ा किया. अरब समाज की राजनीतिक चेतना के विकास में यह एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था. 1992 में राजनीति ने एक और करवट ली.शास के सरकार से बाहर होने के बाद अल्पमत में आई यित्ज़ाक राबिन की सरकार को हदाश और अरब डेमोक्रेटिक पार्टी ने बाहर से समर्थन दिया. इससे सरकार को अविश्वास प्रस्तावों से बचने में मदद मिली. यह सत्ता में औपचारिक भागीदारी नहीं थी, लेकिन इसने दिखाया कि संसद में अरब दलों की भूमिका केवल विपक्ष में बैठने तक सीमित नहीं थी. रॉबिन की हत्या के साथ यह प्रयोग थम गया. फिर 2000 में भरोसे को एक और झटका लगा, जब प्रदर्शनों के दौरान पुलिस से टकराव में 13 अरब नागरिक मारे गए.

2003 में चुनाव समिति ने बलद और उसके नेता अज़मी बिशारा को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश की. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने सात के मुकाबले चार मतों से चुनाव समिति का फैसला पलट दिया. इस घटना में इजरायल की अरब राजनीति का एक स्थायी सूत्र दिखाई देता है: राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिश होती है, लेकिन अदालत कभी-कभी उन्हें वापस भीतर आने का रास्ता देती है. 2014 में क्नेसेट ने चुनावी सीमा दो फीसद से बढ़ाकर 3.25 फीसद कर दी. यूरोपीय काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के मुताबिक, यही बदलाव 2015 में जॉइंट लिस्ट के गठन की प्रमुख वजह बना. चार दल एक मंच पर आए, लेकिन उनकी विचारधाराएं एक जैसी नहीं थीं. हदाश अरब-यहूदी कम्युनिस्ट धारा का प्रतिनिधित्व करती थी, बलद फ़िलस्तीनी राष्ट्रवादी राजनीति की, ता'अल अरब राष्ट्रवादी राजनीति की और रा'आम इस्लामवादी राजनीति की. चुनावी व्यवस्था ने उन्हें साथ आने के लिए प्रेरित किया, उनकी वैचारिक दूरियां समाप्त नहीं कीं. जॉइंट लिस्ट ने 2015 में 13 सीटें जीतीं और 2020 में उसका प्रतिनिधित्व बढ़कर 15 सीटों तक पहुंच गया. लेकिन रा'आम के अलग होने के बाद 2021 में जॉइंट लिस्ट की सीटें घटकर छह रह गईं.

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Photo Credit: NDTV

क्या इजरायल यहूदियों की देश है

इस बीच 2018 में राष्ट्र-राज्य कानून 62 के मुकाबले 55 मतों से पारित हुआ. इस कानून ने इजरायल को यहूदी लोगों का राष्ट्र-राज्य घोषित किया और अरबी को आधिकारिक भाषा का दर्जा नहीं दिया. अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और राज्य की राष्ट्रीय पहचान के बीच का तनाव इस तरह और स्पष्ट हुआ.

मंसूर अब्बास का तर्क इस पूरी बहस से अलग रास्ता सुझाता था. उनके मुताबिक, बराबरी की मांग करते रहने से कानून तो बदलते नहीं दिखे, इसलिए राजनीतिक मोलभाव के रास्ते ठोस लाभ हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए. इसी सोच से 2021 का समझौता निकला. रा'आम के अपने दावे के मुताबिक, इसमें अरब समाज के लिए 53 अरब शेकेल से अधिक के बजट और विकास योजनाएं शामिल थीं. लेकिन कुछ ही महीनों में अब्बास यह कहने लगे कि सरकार अपने वादे पूरे नहीं कर रही है. गठबंधन डेढ़ साल ही चल पाया. इसके बाद रा'आम ने अपने संगठनात्मक ढांचे में भी बदलाव किया. अब उसका आम सम्मेलन इस्लामी आंदोलन या उसकी शूरा परिषद की भागीदारी के बिना उम्मीदवारों का चयन करता है. हालांकि, विश्लेषक इहाब जबरीन के मुताबिक, संगठनात्मक दूरी का अर्थ आवश्यक रूप से वैचारिक दूरी नहीं है. यानी रा'आम की राजनीति में बदलाव का सवाल केवल उसके चुनावी फैसलों से नहीं समझा जा सकता.

सात अक्टूबर 2023 के हमास हमले ने अरब दलों के बीच मौजूद मतभेदों को और उजागर कर दिया. मंसूर अब्बास हमले की निंदा करने वाले पहले अरब नेताओं में थे. उन्होंने उसी दिन दोपहर तक ऐसा कर दिया था. अयमान ओदेह ने कहा कि इजरायली कब्जा निर्दोष नागरिकों को नुकसान पहुंचाने को जायज नहीं ठहराता. लेकिन बलद के नेता सामी अबू शहादेह के एक लेख का अनुच्छेद, जिसे बाद में उन्होंने अदालत में सही ढंग से न लिखा हुआ माना, 2026 में उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने के खतरे तक ले आया. इस पूरे विवाद के बीच आम अरब नागरिक एक कठिन स्थिति में खड़ा था. इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के सर्वेक्षण में 56 फीसद उत्तरदाताओं ने माना कि हमास का हमला अरब समाज के मूल्यों का प्रतिनिधित्व नहीं करता. लेकिन गाजा में फिलस्तीनी नागरिकों की मौतों के लिए 58 फीसद ने इजरायली सेना और हमास, दोनों को जिम्मेदार ठहराया. हमास के हमलों में 20 अरब नागरिक भी मारे गए थे. निंदा और विरोध एक ही वाक्य में समा सकते हैं, लेकिन राजनीति अक्सर लोगों को इनमें से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करती है.

क्या अरब दलों का समर्थन लेंगे नेतन्याहू या आइज़ेनकोट

2026 का चुनाव इन्हीं सवालों के बीच हुआ. 19 अगस्त को हदाश, ता'अल और बलद ने साझा सूची (गठबंधन) बनाई, जबकि रा'आम अलग चुनाव लड़ी. चुनाव समिति ने दोनों सूचियों को चुनाव लड़ने से रोक दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से वह फैसला रद्द कर दिया. अदालत ने दोनों सूचियों को चुनाव लड़ने का रास्ता दिया, लेकिन एक नेता को अयोग्य ठहरा दिया. इसके बाद सीएनएन के मुताबिक, दोनों अरब दलों को मिलाकर रिकॉर्ड 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया और अरब मतदाताओं का मतदान लगभग 80 फीसद रहा. इस उभार के पीछे केवल राजनीतिक लामबंदी नहीं, बल्कि समुदाय की सुरक्षा का प्रश्न भी था.कतर के टीवी चैनल 'अल जज़ीरा' के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में इजरायल में हत्या के 309 पीड़ितों में 241 अरबी थे. अपराध और असुरक्षा की यह स्थिति अरब पार्टियों के लिए एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुकी है. अब चुनाव के बाद की राजनीति का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू सामने है. मतों की जरूरत सबको है, लेकिन उन्हें देने वाले दलों के साथ खड़े दिखाई देने की राजनीतिक कीमत भी है. नेतन्याहू के लिए अरब पार्टियों से दूरी चुनाव प्रचार का औज़ार बनी रही है. 'अल जज़ीरा' के मुताबिक, उन्होंने अरब दलों के साथ गठबंधन को शर्म और अपमान का विषय बताया. एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, उन्होंने इसे विश्वासघात कहा और रा'आम पर चुनाव चुराने की कोशिश करने का आरोप लगाया. लेकिन इतिहास में एक और तथ्य दर्ज है. नेतन्याहू 2021 में स्वयं मंसूर अब्बास से बातचीत कर चुके थे. स्मोट्रिच के वीटो के बाद ही अब्बास बेनेट-लैपिड गठबंधन की ओर गए थे. इस बार गादी आइज़ेनकोट की दूरी शर्तों की भाषा में दिखाई देती है: इजरायल के यहूदी और लोकतांत्रिक चरित्र की स्वीकृति, अनिवार्य सैन्य सेवा का विस्तार और हमास की निंदा. उनके संभावित सहयोगी बेनेट और लिबरमैन अरब दलों के साथ साझेदारी को खुले तौर पर खारिज कर चुके हैं.

दूसरी ओर, रा'आम ने राजनीतिक स्वीकार्यता हासिल करने के लिए एक यहूदी उम्मीदवार, योआव सेगालोविट्ज़, को अपनी सूची में शामिल किया. जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ़ जबरीन ने कहा है कि उनकी पार्टी ऐसी आइज़ेनकोट सरकार में शामिल नहीं होगी, जो गाजा अभियान और दक्षिणी लेबनान पर कब्जे का समर्थन करती हो. यानी अरब पार्टियों के भीतर भी सत्ता में भागीदारी और बाहर से समर्थन देने के बीच स्पष्ट अंतर है. लेकिन अंततः राजनीति को संसदीय गणित से गुजरना ही पड़ता है. नेतन्याहू का खेमा 53 सीटों पर और आइज़ेनकोट का खेमा 48 पर है . इजरायल हयोम के मुताबिक, रा'आम के समर्थन से भी आइज़ेनकोट 61 सीटों के बहुमत तक नहीं पहुंचते. इसके लिए जॉइंट लिस्ट का समर्थन भी जरूरी होगा.

क्या इजरायल में बनेगी एकता सरकार

एनपीआर के मुताबिक, रास्ते दो हैं. पहला, आइज़ेनकोट के सहयोगी चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों से पीछे हटें और अरब दलों के बाहरी या आंतरिक समर्थन से अल्पमत सरकार बनाएं. दूसरा, नेतन्याहू के साथ एकता सरकार बनाई जाए, जिसके अधीन काम करने से आइज़ेनकोट इनकार कर चुके हैं. इस तरह की राजनीतिक स्थिति पहले भी बन चुकी है. 2019 में जॉइंट लिस्ट ने 1992 के बाद पहली बार प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बेनी गांट्ज़ को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने की सिफारिश की थी. लेकिन किसी उम्मीदवार का समर्थन करना और उसके साथ सरकार में बैठना दो अलग-अलग फैसले हैं. दूरी दिखाना सस्ता है, सत्ता की कीमत चुकाना महंगा.

आइए लौटते हैं उस होटल की मेज पर, जहां दो जून 2021 की रात मंसूर अब्बास ने समझौते पर दस्तखत किए थे. एक कलम थी, कुछ वादे थे और एक सवाल था, जो आज भी वहीं रखा है: क्या अरब नागरिक का वोट हमेशा सौदेबाज़ी की जिंस रहेगा या कभी साझेदारी का अधिकार भी कहलाएगा? लोकतंत्र की कसौटी केवल यह नहीं कि कोई अल्पसंख्यक कितनी सीटें जीतता है. कसौटी यह भी है कि जीतने के बाद उसकी बात कितनी सुनी जाती है. जिस दिन समर्थन की कीमत पर नहीं, समानता की शर्त पर बातचीत होगी, उस दिन वह तस्वीर पूरी होगी.

(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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