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आदत से कब बाज आएगा पाकिस्तान, इस्लामाबाद हमले पर पड़ोसी की शर्मनाक और हास्यास्पद रणनीति

विवेक शुक्ल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 09, 2026 14:13 pm IST
    • Published On फ़रवरी 09, 2026 14:12 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 09, 2026 14:13 pm IST
आदत से कब बाज आएगा पाकिस्तान, इस्लामाबाद हमले पर पड़ोसी की शर्मनाक और हास्यास्पद रणनीति

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में छह फरवरी 2026 को शिया मस्जिद पर हुआ आंतकी हमला हुआ. इसमें कम से कम 31 लोग मारे गए और 170 से अधिक घायल हुए. इस हमले ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी.यह हमला शुक्रवार की नमाज के दौरान हुआ, जब एक हमलावर ने मस्जिद के गेट पर फायरिंग की और फिर खुद को उड़ा लिया. पाकिस्तान की सरकार ने हमेशा की तरह बिना किसी ठोस सबूत के भारत को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. इससे पहले जनवरी के अंत में बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के हमलों में 31 नागरिक और सुरक्षा बलों के 17 जवान मारे गए थे. पाकिस्तान ने इन हमलों के बाद भी भारत की ओर उंगली उठाई थी. उसने दावा किया था कि बीएलए को भारत का समर्थन प्राप्त है. लेकिन सवाल यह है कि अगर पाकिस्तान इतना ही निश्चित है कि भारत इन हमलों के पीछे है, तो उसने अब तक इस्लामाबाद में मौजूद भारतीय राजदूत को तलब क्यों नहीं किया? यह पाकिस्तान की अपनी नाकामियों को छिपाने की पुरानी आदत का प्रमाण है.

अपनी आदत से कब बाज आएगा पाकिस्तान

पाकिस्तान की यह आदत अब हास्यास्पद हो चुकी है. हर बार जब उसकी सरजमीं पर आतंकवादी हमले होते हैं, चाहे वह आईएसआईएस हो, तालिबान हो या बलूच अलगाववादी, पाकिस्तान की पहली प्रतिक्रिया होती है- भारत को दोष दो. इस्लामाबाद में हुए हमले के बाद पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी ने कहा कि पाकिस्तान के पास सबूत हैं कि
आतंकवाद भारत द्वारा प्रायोजित है. रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ट्विटर पर आरोप लगाया कि हमलावर अफगानिस्तान से आया था और भारत ने हमले को प्रायोजित किया. लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया.भारत ने कहा कि पाकिस्तान अपनी सामाजिक समस्याओं को दूसरों पर थोप रहा है.

सच्चाई यह है कि पाकिस्तान की सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए भारत को बलि का बकरा बना रही है. अगर भारत वाकई इन हमलों के पीछे होता, तो पाकिस्तान कूटनीतिक स्तर पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करता? राजदूत को तलब करना तो दूर, पाकिस्तान ने कोई औपचारिक विरोध तक दर्ज नहीं कराया. यह दर्शाता है कि ये आरोप महज प्रोपेगैंडा हैं, पाकिस्तान की घरेलू राजनीति को मजबूत करने के लिए.

क्या कर रही हैं पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसियां

अब बात पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसियों की. आईएसआई, आईबी और अन्य एजेंसियां क्या कर रही हैं? इस्लामाबाद जैसे सुरक्षित शहर में, जहां सेना और सरकार के मुख्यालय हैं, एक सुसाइड बॉम्बर कैसे घुसपैठ कर सका? हमले से पहले कोई चेतावनी नहीं, कोई रोकथाम नहीं. बलूचिस्तान में भी, जहां बीएलए ने नौ जिलों में एक साथ हमले किए-क्वेटा, ग्वादर, मस्तुंग समेत. पाकिस्तान की सेना को पहले से कोई जानकारी नहीं थी.

पाकिस्तान अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है. भारत को दोष देना आसान है, लेकिन इससे समस्या हल नहीं होती. पाकिस्तान को अपनी इंटेलिजेंस को मजबूत करना चाहिए, आतंकवादियों को पनाह देना बंद करना चाहिए और घरेलू मुद्दों पर फोकस करना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ऐसे हमले जारी रहेंगे और पाकिस्तान की साख और गिरेगी.

पाकिस्तान की नाकामी

यह समय है कि पाकिस्तान अपनी पुरानी रणनीति त्यागे. भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाने से ही स्थिरता आएगी, न कि आरोप-प्रत्यारोप से. लेकिन जब तक पाकिस्तान अपनी नाकामियों को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक यह चक्र चलता रहेगा. एक बड़ा सवाल यह भी है कि पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई, जो अपने को दुनिया की सबसे बेहतर एजेंसियों में से एक होने का दावा करती है, अपनी सरजमीं पर आतंकवाद को रोकने में क्यों असफल हो रही है? वजह साफ है, ये एजेंसियां विदेशी दुश्मनों पर ज्यादा फोकस करती हैं, जबकि घरेलू आतंकवाद को पनाह देती हैं या अनदेखा करती हैं. अफगानिस्तान से आने वाले हमलावरों की बात करें तो पाकिस्तान खुद तालिबान को समर्थन देता रहा है.इंटेलिजेंस की यह विफलता पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा को खोखला कर रही है.

ये घटनाएं पाकिस्तान की समग्र नाकामी को उजागर करती हैं. एक तरफ अर्थव्यवस्था दिवालिया होने की कगार पर है तो दूसरी तरफ अलगाववादी आंदोलन मजबूत हो रहे हैं. बलूचिस्तान में बीएलए जैसे गुट इसलिए मजबूत हैं क्योंकि पाकिस्तान ने दशकों से बलूच लोगों के अधिकारों का दमन किया है. प्रांत की प्राकृतिक संसाधनों का शोषण होता है, लेकिन विकास नहीं. शिया समुदाय पर हमले धार्मिक कट्टरता की उपज हैं, जिसे पाकिस्तान की सरकार रोकने में असमर्थ है. 

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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