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This Article is From Jul 27, 2017

प्राइम टाइम इंट्रो: क्या बिहार में जनादेश का पालन हुआ?

रवीश कुमार
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जुलाई 27, 2017 22:40 pm IST
    • Published On जुलाई 27, 2017 22:40 pm IST
    • Last Updated On जुलाई 27, 2017 22:40 pm IST
तीन चार साल के मीडिया और पॉलिटिक्स का पैटर्न देखिये. पहले एक ईवेंट आता है, फिर उससे बड़ा ईवेंट आता है, फिर कोई महा इवेंट आता है, फिर बीच में छोटे मोटे इवेंट आते हैं, फिर बड़ा और बड़ा और महा इवेंट लॉन्‍च होता रहता है. एक विषय पर बहस निष्कर्ष पर पहुंचती नहीं कि दूसरा मुद्दा आ जाता है. इस बैंड पर कभी विपक्ष के खेमे के यहां छापा पड़ता है, बगावत होती है और वो सब बीजेपी में ही आते है और आकर पवित्र हो जाते हैं. चुनाव आएगा तो विपक्ष का स्टिंग होने लगेगा, फिर राज्यों में पिछले दरवाज़े से सरकार का बनना और गिरने का भी सीज़न चलता है. इस पैटर्न को समझने के बाद आपका काफी समय बच सकता है. 2015 में सुशील मोदी ने नीतीश कुमार को धोखेबाज़ कहा था मगर इस्तीफा देने के एक घंटे के भीतर उनको अपना नेता चुनते हुए नज़र आए. नीतीश कुमार ने भी उनका दामन थाम लिया. बिहार में सरकार बन गई है. तर्क सम्मेलन के बाद के शमियाने में प्लास्टिक के प्लेट की तरह हवा में उड़ रहे हैं.

20 महीने ही पुरानी हुई हैं बिहार विधानसभा की तस्वीरें. क्या घमासान हुआ था नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच. कोई मोदी की राजनीति की तुलना हिटलर से कर रहा था, तो मोदी नीतीश कुमार को अवसरवादी बता रहे थे, डीएनए में ख़राबी बता रहे थे. बिहार की जनता ने नीतीश लालू गठबंधन को ही चुना. जब जनादेश बीजेपी को नहीं मिला तो क्या बीजेपी को इस संकट में जनता से पूछने की अपनी नैतिकता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था. क्या बगैर जनादेश के किसी सरकार में जाना पिछले दरवाज़े के सियासी खेल के आरोपों की पुष्टि नहीं करता है. नए फैसले में बिहार की जनता की औपचारिक राय नहीं है. क्या बीजेपी ने इसलिए परवाह नहीं की क्योंकि इसी तरह के मास्टर स्ट्रोक से मणिपुर और गोवा में उसकी सरकार बन गई, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगवा दिया गया जो अदालत में ग़लत साबित हुआ. एक ज़माना था जब राजनीति में नैतिकता हमेशा विपक्ष के साथ होती थी, अब सत्ता के साथ रहने लगी है. जब नैतिकता सत्ता के अनुसार होने लगे तब सवालों का कोई मतलब नहीं रह जाता है. गुजरात कांग्रेस के तीन विधायक इस्तीफा देते हैं, कांग्रेस से इस्तीफा देते ही बीजेपी उसे राज्यसभा का टिकट भी दे देती है.

विपक्ष के खेमे में कमज़ोरियां तो हैं मगर भगदड़ सिर्फ कमज़ोरियों के कारण नहीं है क्योंकि वही कमज़ोरियां सत्ता पक्ष के खेमे में आराम से ढूंढी जा सकती हैं. यह सब भारतीय राजनीति की सामान्य प्रक्रियाएं नहीं हैं. शिवसेना बीजेपी की सहयोगी और सेंटर और महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ सरकार में है. मार्च 2016 में जब उत्तराखंड की सरकार ग़ैर कानूनी तरीके से गिरा दी गई तब शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने एक बयान दिया था. उन्‍होंने कहा था, 'उत्तराखंड में जो हो रहा है वो लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है. लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों को सिर्फ उसी तरीके से हटाया जाना चाहिए. एक ही दल की सत्ता की आकांक्षा तानाशाही और आपातकाल से भी ख़तरनाक है.'

नीतीश के दोबारा बीजेपी के साथ आने से राजनीति बदल गई है. अभी देखना बाकी है कि 2019 के पहले या उसके बाद मोदी-शाह की आक्रामक बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का अनुभव कैसा रहता है. फिलहाल समाजवादी आंदोलन से भी भारत की राजनीति मुक्ति की तरफ प्रशस्त लग रही है. कांग्रेस ही नहीं, कांग्रेस विरोध के नाम पर खड़े हुए क्षेत्रिय दलों के सामने भी अस्तित्व की चुनौतियां मंडरा रही हैं.

जदयू के केरल यूनिट की खबर जब इंडियन एक्सप्रेस में देखी तो अचानक ख़्याल आया कि समाजवादी आंदोलन का कहां तक विस्तार था. वहां से जेडीयू के सांसद वीरेंद्र कुमार हैं जिन्होंने कहा कि वे सदन से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं. नीतीश कुमार से हमारा संबंध समाप्त हो गया है. बिहार से राज्यसभा सांसद अली अनवर ने इसे राष्ट्रीय दुर्घटना बताया है लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा है. यूपी में समाजवादी आंदोलन ने बीजेपी ने कुचला मगर कारण उस आंदोलन में ही था. सपा और राष्ट्रीय लोकदल में समाजवाद का नाम लेते लेते ये नेता कहीं और निकल गए. इसलिए अब समाजवादी धड़े की राजनीतिक प्रासंगिकता कमज़ोर पड़ती जा रही है. बेहतर होता लालू यादव तमाम आरोपों के जवाब देते और अपनी पार्टी के ढांचे में भी बदलाव करते. समाजवादी दलों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर व्यक्तिगत साम्राज्य का ही विस्तार किया है लेकिन ऐसा क्या धर्मनिरपेक्षता की राजनीति का विरोध करने वाले नेताओं की राजनीति बग़ैर पैसे और संसाधनों के ही चलती है. बड़े दलों के पास कारपोरेशन का अथाह पैसा है या समर्थन है तो इन छोटे छोटे दलों के पास शायद करप्शन का.

2015 में सुशील मोदी नीतीश कुमार पर धोखा देने का आरोप लगा रहे थे, 2017 में राहुल गांधी धोखा देने का आरोप लगा रहे हैं. राजनीति में ये सब आरोप थियेटर के संवाद की तरह हो गए हैं. भारतीय राजनीति अभी बेचैनियों के दौर से गुज़र रही है वरना जो नेता सबसे सुरक्षित और लोकप्रिय स्थिति में हैं वो दूसरे दलों के आंगन में शिकार करते नज़र न आते.

इस संकट के बाद की दलीलों में कांग्रेस पर खूब हमले हो रहे हैं. कांग्रेस से नेताओं का पलायन हो रहा है. कांग्रेस से गठबंधन नहीं संभल रहा है. राहुल गांधी ने कहा कि राजनीति की कोई साख नहीं है. यही बात उन पर भी लागू होती है जितनी दूसरों पर लागू होती है. जनता की भागीदारी को देखकर तो नहीं लगता है कि राजनीति की साख नहीं है. 2019 में अब लड़ाई एक तरफा हो चुकी है. क्या विपक्ष नीतीश कुमार के कारण ही कमज़ोर हुआ, या विपक्ष कमज़ोर और आलसी था ही. क्या भ्रष्टाचार में डूबे नेताओं के दम पर विपक्ष लड़ने की नैतिकता हासिल कर सकता है? ठीक है कि व्यापम घोटाले की जवाबदेही मुख्यमंत्री पर नहीं आई, मीडिया को पैसे देकर खबर छपवाने का आरोप साबित होने के बाद भी मध्य प्रदेश के मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इस्तीफा नहीं दिया, महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले में कोई प्रगति नहीं हुई, कहा जा रहा है कि इसलिए ठंडा है क्योंकि एनसीपी बीजेपी की सहयोगी हो सकती है. इसी बीच एक नई नैतिकता लॉन्‍च हो गई है. इंडियन एक्सप्रेस की हेडलाइन देखिये. छत्तीसगढ़ के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का बयान है कि अगर आरोप साबित हुआ तो सरकार की ज़मीन लौटा देंगे. ये हुई नैतिकता. अभी तक मंत्री कहते थे कि आरोप साबित होगा तो राजनीति छोड़ देंगे, इस्तीफा देंगे लेकिन पहली बार कोई मंत्री कह रहा है कि सरकार की जो ज़मीन पत्नी ने कथित तौर पर खरीदी है, वो आरोप सही हुआ तो ज़मीन लौटा देंगे. ब्रजमोहन अग्रवाल का यह बयान कइयों को राहत देने वाला होगा. कह देंगे कि भ्रष्टाचार पकड़ाएगा तो पैसा लौटा देंगे.

यह भी अच्छा है कि विपक्ष के खेमे में ही सही, भ्रष्टाचार के खिलफ अभियान काफी सक्रिय है लेकिन क्या भाजपा या उसके सहयोगी दलों के भीतर ऐसे नेता नहीं हैं जिनके पास बेनामी संपत्ति है या जिनके पास भ्रष्टाचार से जुटाए संसाधन हैं. असम के ताकतवर मंत्री हैं हिमांता विस्वा सरमा, जब ये कांग्रेस में थे तब बीजेपी इन पर घोटाले के आरोप लगाती थी, अब उन घोटालों की जांच धीमी हो जाने की खबरें आने लगी है. उत्तराखंड सरकार मे में भी ऐसे मंत्री हैं जो कांग्रेस सरकार में मंत्री थे तो उन पर बीजेपी भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी. वैसे लोकपाल अभी तक नहीं आया है. सरकार बन गई है नैतिकता पर बहस का कोई मतलब नहीं है.

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