विज्ञापन

महिलाओं के अधिकारों और स्थिति पर समाज से सवाल करतीं दो फिल्में

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 08, 2026 10:00 am IST
    • Published On मार्च 08, 2026 10:00 am IST
    • Last Updated On मार्च 08, 2026 10:00 am IST
महिलाओं के अधिकारों और स्थिति पर समाज से सवाल करतीं दो फिल्में

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर अक्सर महिलाओं के अधिकार और समानता की बात होती है. भारतीय मनोरंजन जगत ने भी कई बार पर्दे पर ऐसे सवाल उठाए हैं जो हमारे समाज की गहरी सच्चाइयों को सामने रखते हैं. फिल्म 'English Vinglish' और वेब सीरीज 'Made in Heaven' दो अलग दौर और दो अलग सामाजिक वर्गों की कहानियां हैं, लेकिन दोनों का मूल संदेश एक ही है कि महिलाओं को सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान चाहिए.

श्रीदेवी हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं. उन्हें 'चांदनी', 'मिस्टर इंडिया', 'इंग्लिश विंग्लिश' जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है. करीब 15 साल के लंबे ब्रेक के बाद साल 2012 में श्रीदेवी ने 'इंग्लिश विंग्लिश' फिल्म से हिंदी सिनेमा में वापसी की थी. गौरी शिंदे के निर्देशन में बनी इस फिल्म में श्रीदेवी ने एक साधारण गृहिणी शशि का किरदार निभाया, शशि का किरदार यह याद दिलाता रहता है कि महिलाओं को किसी खास विशेषाधिकार की नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान की जरूरत है.

एक साधारण गृहिणी का असाधारण संघर्ष

फिल्म में शशि एक साधारण गृहिणी है, जो पत्नी, बहू और मां की जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाती है, लेकिन अंग्रेजी न आने की वजह से खुद को परिवार के बीच कमतर महसूस करती है.'कितनी भी कोशिश करूं, किसी को खुश नहीं कर पाती' जैसे संवाद उसके भीतर के दबाव और अकेलेपन को सामने लाते हैं. कहानी का टर्निंग प्वाइंट तब आता है जब उसे अमेरिका जाना पड़ता है और वहीं अंग्रेजी सीखने के बहाने वह अपने आत्मविश्वास को फिर से गढ़ना शुरू करती है.

फिल्म के कई दृश्य आज भी याद रह जाते हैं. कैफे में अंग्रेजी न बोल पाने की वजह से बाहर आकर शशि का चुपचाप रोना हो या फिर पहली बार अंग्रेजी क्लास में अपनी तारीफ सुनकर सड़क पर उसका खिल उठना, हर पल श्रीदेवी के अभिनय की बारीकियों को दिखाता है. यही वजह है कि यह फिल्म सिर्फ भाषा सीखने की कहानी न होकर आत्मसम्मान की यात्रा बन जाती है.

पुरुषवादी सोच पर सवाल

फिल्म में शशि की बहन मनु का किरदार भी एक अलग परत जोड़ता है, जहां वह यह कहते हुए कि 'अगर उसने मुझे बढ़ावा नहीं दिया होता तो मैं वैसी की वैसी ही रह जाती', अनजाने में उस मानसिकता को उजागर करती है जिसमें स्त्री की उपलब्धियों को पुरुष की स्वीकृति से जोड़कर देखा जाता है. इसके बरक्स शशि का नजरिया धीरे-धीरे बदलता है और वह खुद की पहचान को समझने लगती है.

श्रीदेवी के कई संवाद आज भी सामाजिक सोच पर सवाल खड़े करते हैं. 'मर्द खाना बनाए तो कला है, औरत बनाए तो उसका फर्ज है' जैसी लाइनें रोजमर्रा के जीवन में मौजूद लैंगिक असमानता को सीधे शब्दों में सामने लाती हैं. वहीं जब शशि कहती है,'राधा, मुझे प्यार की जरूरत नहीं है, जरूरत है तो सिर्फ थोड़ी इज्जत की', तो यह सिर्फ एक पात्र का कथन न रहकर असंख्य महिलाओं के आत्मसम्मान की मांग बन जाता है.

रिश्तों की परतें खोलती 'मेड इन हेवन' 

अमेजन प्राइम पर स्ट्रीम हो रही वेब सीरीज 'मेड इन हेवन' पहली नजर में शादियों की भव्य दुनिया की कहानी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह भारतीय समाज की कई जटिल सच्चाइयों को सामने लाती है. एक ऐसी टीम की कहानी, जो लोगों की शादी को शानदार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती, दरअसल रिश्तों, पहचान और सामाजिक दबावों के भीतर छिपे सच को उजागर करने का माध्यम बन जाती है.

वेब सीरीज का कथानक केवल शादी की तैयारियों तक सीमित नहीं रहता. हर एपिसोड में कोई नया सामाजिक सवाल सामने आता है. सीरीज का प्रमुख किरदार समलैंगिक हैं, जो अपनी पहचान और निजी जीवन के संघर्षों से जूझता नजर आता है. वहीं उसकी साथी अपने वैवाहिक जीवन की उलझनों और भावनात्मक दबावों से गुजर रही है. इन व्यक्तिगत कहानियों के जरिए सीरीज रिश्तों की जटिलता और समाज की अपेक्षाओं के बीच खड़े इंसान की दुविधा को सामने लाती है.

मानसिक वर्जनाओं को चुनौती देती कहानियां

शादी से पहले संबंधों की स्वीकृति जैसे संवेदनशील विषय से शुरू होकर यह सीरीज भारतीय समाज की कई मानसिक वर्जनाओं को चुनौती देती है. विवाहेतर संबंध जैसे नाजुक मुद्दों को भी यह सीरीज सीधे और स्पष्ट तरीके से सामने रखती है. यह प्रस्तुति दर्शकों को असहज भी करती है और सोचने के लिए मजबूर भी.

सीरीज की एक महत्वपूर्ण परत उम्र और प्रेम के रिश्ते को लेकर है. साठ साल से अधिक उम्र के लोगों के संबंधों को जिस संवेदनशीलता से दिखाया गया है, वह खासतौर पर उन महिलाओं की कहानी कहती है जो विधवा होने या तलाक के बाद अपना पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में लगा देती हैं.'मेड इन हेवन' यह सवाल उठाती है कि क्या ऐसे लोगों को दोबारा प्रेम पाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

सीरीज का एक बेहद प्रभावशाली प्रसंग तब सामने आता है जब एक आईएएस दहेज की मांग करता है. वेब सीरीज में प्रियंका मिश्रा बनी श्वेता त्रिपाठी शादी को तोड़ देना बेहतर समझती है. यह दृश्य केवल एक कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश बनकर उभरता है. यह बताता है कि गलत शर्तों पर रिश्ता निभाने से बेहतर है उसे ठुकरा देना. यही हिम्मत यह वेब सीरीज हमारे समाज की लड़कियों से मांगती हुई लगती है.

उच्च वर्ग तक सीमित दुनिया की कमी

हालांकि सीरीज की सबसे बड़ी सीमा इसका उच्च वर्ग तक सीमित रह जाना है. अधिकतर संवाद अंग्रेजी में हैं और कथानक मुख्य रूप से शहरी, सम्पन्न तबके के इर्द-गिर्द घूमता है. जबकि जिन सामाजिक समस्याओं को यह उठाती है, वे केवल अमीर वर्ग तक सीमित नहीं हैं. गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय समाज का लगभग नदारद होना इसकी यथार्थवादी ताकत को कुछ कमजोर कर देता है.

महिला दिवस के संदर्भ में देखें तो 'मेड इन हेवन' केवल शादियों की कहानी नहीं, बल्कि महिलाओं की इच्छाओं, स्वतंत्रता और समाज द्वारा तय सीमाओं के बीच संघर्ष की कहानी भी है. यह वेब सीरीज दिखाती है कि रिश्ते केवल परंपराओं से नहीं, बल्कि ईमानदार संवाद और आत्मस्वीकृति से बनते हैं. यही वजह है कि 'इंग्लिश विंग्लिश' और 'मेड इन हेवन' जैसी रचनाएं केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि हमारे समाज की सोच पर सवाल भी खड़े करती हैं. शायद इसी कारण अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अवसर पर इन कहानियों को याद करना और भी जरूरी हो जाता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com