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योगी राज में भूगोल को मात देता उत्तर प्रदेश, 'लैंडलॉक्ड' होने के बाद भी लिखी विकास की नई इबारत

डॉ. अवनीश मिश्रा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 15, 2026 22:19 pm IST
    • Published On मई 15, 2026 22:19 pm IST
    • Last Updated On मई 15, 2026 22:19 pm IST
योगी राज में भूगोल को मात देता उत्तर प्रदेश, 'लैंडलॉक्ड' होने के बाद भी लिखी विकास की नई इबारत

किसी भी राज्य के भूगोल की पहचान अब उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी महत्वाकांक्षाओं के विस्तार से होती है.  उत्तर प्रदेश ने अपनी भौगोलिक नियति के मौन बंधनों को तोड़कर आज वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसकी कल्पना कभी स्वप्निल लगती थी.'लैंडलॉक्ड' राज्य होना यानी समुद्र से कटा हुआ, बंदरगाहों से दूर, चारों ओर से भूमि से घिरा होना. यह स्थिति किसी समय विकास की राह में एक बेड़ी की तरह देखी जाती थी, लेकिन आज उसी उत्तर प्रदेश ने लीड्स (LEADS) 2025 की रैंकिंग में सर्वोच्च स्थान 'एग्जेम्प्लर' (Exemplar) यानी एक जीवंत मिसाल का दर्जा प्राप्त कर लिया है. यह उपलब्धि उस जिजीविषा का उद्घोष है, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे समुद्र जितने गहरे हों, तो तटों की अनुपस्थिति भी प्रगति के कदम नहीं रोक सकती. लीड्स-2025 (लॉजिस्टिक्स ईज़ अक्रॉस डिफरेंट स्टेट्स) की रैंकिंग ने यही सिद्ध किया है.

लैंडलॉक्ड स्टेट के अभिशाप से मुक्ति पाता उत्तर प्रदेश

यह जानना ज़रूरी है कि लैंडलॉक्ड होने का बोझ केवल मानचित्र पर नहीं, बल्कि आम उद्यमी की जेब पर भी पड़ता है. जब गुजरात का कोई व्यापारी अपना माल कांडला बंदरगाह पर उतारता है और सीधे जहाज़ में लदवा देता है, तो उसी काम के लिए उत्तर प्रदेश का व्यापारी पहले ट्रक से मुंबई तक, फिर बंदरगाह की लंबी कतारों में और फिर कहीं जाकर जहाज़ तक पहुंचता है. इस पूरी यात्रा में समय लगता है, पैसा लगता है और कभी-कभी माल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. देश में लॉजिस्टिक्स लागत का सबसे कठिन बोझ लैंडलॉक्ड राज्यों पर ही पड़ता था. यही कारण है कि लंबे समय तक बड़े उद्योग तटीय राज्यों की ओर आकर्षित होते रहे और एक दशक पहले तक सरकारों ने इस राज्य को उसकी क्षमता के अनुरूप विकसित करने की दिशा में सोचा ही नहीं.

किंतु यह पीड़ा स्थायी नियति नहीं थी. वर्ष 2017 एक विभाजक रेखा बना, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को बीमारू राज्य की छवि से उबारकर संसाधनयुक्त प्रदेश बनाने का संकल्प लिया. आज नौ साल से अधिक बीतने के बाद प्रदेश की जीएसडीपी का 30 लाख करोड़ रुपये से आगे निकलना इसका प्रमाण है. यह उस सोच का परिणाम है, जो लॉजिस्टिक्स को विकास की बुनियाद मानती है. एक्सप्रेस-वे केवल सड़कें नहीं हैं, वे उम्मीदों के राजमार्ग हैं. 2017 में प्रदेश के पास यमुना और आगरा-लखनऊ जैसे गिने-चुने मार्ग थे. आज प्रदेश के पास देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेस-वे नेटवर्क है.पूर्वांचल, बुंदेलखंड और 594 किलोमीटर के गंगा एक्सप्रेस-वे ने दूरियों को समेट दिया है. जहां कभी किसान का ट्रैक्टर घंटों में कुछ किलोमीटर तय करता था, वहां अब रेफ्रिजरेटेड ट्रक रात भर में सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पार कर लेते हैं.

दादरी का आभासी बंदरगाह

इस सपने को साकार करने में जो एक कड़ी सबसे अहम रही, वह है दादरी का मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स हब. दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर के साथ जुड़ा यह केंद्र उत्तर प्रदेश के लिए वह 'आभासी बंदरगाह' बन गया, जो भूगोल ने नहीं दिया था. यहां रेल, सड़क और हवाई मार्ग एक साथ आकर मिलते हैं. माल आता है, छंटता है, पैक होता है और देश के किसी भी कोने या विदेश की ओर रवाना हो जाता है. निर्यात तत्परता सूचकांक में 2022 में सातवें पायदान पर खड़ा उत्तर प्रदेश 2024 में चौथे स्थान पर आ गया और आज लैंडलॉक्ड राज्यों में वह पहले नंबर पर है. इस छलांग के पीछे ज़मीन पर बिछाई गई इन्फ्रास्ट्रक्चर की वह नींव है, जिसे एक-एक ईंट रखकर तैयार किया गया.

वेयरहाउसिंग यानी भंडारण, यह शब्द सुनने में साधारण लगता है, लेकिन इसकी कमी ने सदियों तक किसानों और उद्यमियों की कमर तोड़ी है. उत्तर प्रदेश में, जहां गेहूं और चावल की फसलें लहलहाती हैं, जहां आम और आलू की उपज दुनिया में अपनी मिसाल रखती है, वहां भंडारण की कमी से फसल कटते ही दाम गिर जाते और किसान को नुकसान उठाना पड़ता है. पिछले कुछ सालों में इस मोर्चे पर जो काम हुआ, उसने लॉजिस्टिक्स की पूरी तस्वीर बदल दी है. कोल्ड चेन नेटवर्क फैला, अनाज के गोदाम बने और प्रसंस्करण इकाइयां खड़ी हुईं. गंगा एक्सप्रेस-वे के किनारे 12 जिलों में 27 एकीकृत औद्योगिक क्लस्टर और लॉजिस्टिक्स हब विकसित किए जा रहे हैं. इनके लिए करीब 7000 एकड़ भूमि आरक्षित की गई है. इससे न केवल किसान को उचित मूल्य मिलेगा बल्कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को भी एक नई सांस मिलेगी.

दूसरे राज्यों को राह दिखाएगा उत्तर प्रदेश

लीड्स में सर्वोच्च रैंकिंग का महत्व इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह केवल सड़कों और गोदामों की गिनती नहीं करती,वह यह भी देखती है कि सरकारी प्रक्रियाएं कितनी सरल हैं, कारोबार करना कितना आसान है और व्यापारी को कितनी पारदर्शिता मिलती है. उत्तर प्रदेश 2022, 2023 और 2024 में लगातार तीन वर्ष 'अचीवर' श्रेणी में रहा था और अब 2025 में वह सीधे 'एग्जेम्प्लर' की श्रेणी में छलांग लगा गया. यह प्रगति की रेखा नहीं, एक उड़ान है. इस पूरी यात्रा में एक और आयाम है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता और वह है मानवीय पहलू. लॉजिस्टिक्स की बेहतरी का अर्थ केवल माल की तेज़ आवाजाही नहीं है. इसका अर्थ है वह ट्रक चालक, जिसका समय बचता है और जो अपने परिवार से थोड़ा जल्दी मिल पाता है.इसका अर्थ है वह छोटा उद्यमी, जो अब मुंबई के बड़े व्यापारी से पूरे आत्मविश्वास के साथ सौदा करता है, क्योंकि उसका माल समय पर पहुंचता है. 2017 तक जो उत्तर प्रदेश नौकरी की तलाश में अपने नौजवानों को पंजाब और महाराष्ट्र भेजता था, आज उसी प्रदेश में जापान, जर्मनी और खाड़ी देशों की कंपनियां निवेश के लिए दस्तक दे रही हैं. ऐसा इसलिए है कि यहां जेवर जैसे विशाल स्वप्न आकार ले रहे हैं, जो न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे उत्तर भारत की लॉजिस्टिक्स रीढ़ बनने को आतुर हैं. नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) की क्षमता जब लाखों टन कार्गो को संभालने की होगी, तब समुद्र की कमी को आकाश की असीमित दूरियों से पाट दिया जाएगा. लॉजिस्टिक्स के आंकड़ों के पीछे ये बदलाव हैं और यही किसी भी रैंकिंग का असली अर्थ है.

हालांकि आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं. लैंडलॉक्ड होने की मूलभूत सीमा समाप्त नहीं होगी, समंदर अब भी दूर है. लेकिन इस दूरी को मात दी जा सकती है. जब देश के अन्य लैंडलॉक्ड राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ अपनी लॉजिस्टिक्स नीतियां बनाएंगे, तो उनके सामने उत्तर प्रदेश का यह मॉडल एक दीपस्तंभ की तरह खड़ा होगा.'एग्जेम्प्लर' का शाब्दिक अर्थ ही यही है- वह जो अनुकरण के योग्य हो, जो रास्ता दिखाए, जो दूसरों को यह विश्वास दे कि यह संभव है. समंदर की लहरें उत्तर प्रदेश की सरज़मीं तक नहीं आतीं,यह सच है. लेकिन इस प्रदेश की मिट्टी में गंगा-यमुना का वो जल है, जिसने सदियों से सभ्यताएं सींची हैं. उस मिट्टी से उगे लोगों ने आज एक नई इबारत लिखी है कि विकास की राह में भूगोल रुकावट नहीं, बस एक चुनौती है. और चुनौतियां तो मनुष्य के लिए ही बनाई गई होती हैं कि वह उन्हें पार करे.

(डिस्क्लेमर: लेखक लखनऊ स्थित डॉक्टर शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय के पूर्व डीन हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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