''हम बांग्लादेश, नेपाल जैसी हिंसा नहीं चाहते, पुलिस वाले हमारे दुश्मन नहीं, बहुतों ने हमें बचाया''

Jantar Mantar Protest, Ground Report: NDTV ने भोपाल से आए तीन दोस्तों से बात की और समझने की कोशिश की कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर बैठे छात्रों के जेहन में अभी क्या चल रहा है.

''हम बांग्लादेश, नेपाल जैसी हिंसा नहीं चाहते, पुलिस वाले हमारे दुश्मन नहीं, बहुतों ने हमें बचाया''
Jantar Mantar Protest, Ground Report: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने एमपी से आए तीन दोस्त (फोटो- NDTV)

"हम नहीं चाहते कि बांग्लादेश या नेपाल वाली हालत हो. उससे हम बच्चों का और देश का बहुत वक्त बर्बाद हो जाएगा"

यह कहना है मध्य प्रदेश से दिल्ली के जंतर-मंतर में विरोध प्रदर्शन में शामिल होने आए तीन छात्रों का. उनके लिए यह प्रदर्शन अपने हक के लिए आवाज उठाने का मौका है. वे परिवार से लड़कर यहां आए हैं, बिना प्लानिंग के आए हैं. भले वे घर से बताकर आए थे कि हम एक दिन के लिए जा रहे हैं लेकिन यहां आकर अब उनका कहना है कि आंदोलन खत्म होने तक वे वापस नहीं लौटेंगे. 

Advertisement - Scroll to continue

पहले क्विक अपडेट

एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक चली अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है. उन्होंने यह कदम सरकार के उस आश्वासन के बाद उठाया है जिसमें कहा गया है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी. वांगचुक के अनशन खत्म करने के कुछ ही देर बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर एक पोस्ट में कहा, "मैं सोनम जी से आग्रह करता हूं कि वे डॉक्टरों की सलाह मानें और जल्द से जल्द अपना पुराना वजन वापस हासिल करें. मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सोनम जी स्वस्थ रहें." इससे पहले परीक्षा का पेपर लीक करने वालों को सज़ा देने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की घोषणा करने के कुछ घंटों बाद, पीएम मोदी ने गुरुवार रात एक वीडियो जारी कर बताया कि एक नया सख्त कानून आने वाला है. उन्होंने कहा कि उन्हें इसका मसौदा (ड्राफ्ट) मिल गया है और शुक्रवार को कैबिनेट की बैठक में इस पर चर्चा होगी.

वहीं जंतर-मंतर पर आंदोलन को लीड कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर  अभिजीत दिपके ने कहा है कि राहत और खुशी है कि सोनम सर ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है लेकिन हमारा शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं दे देते.

"हम गिल्ट में थे कि हम शुरू में नहीं आ पाए"

NDTV ने भोपाल से आए तीन बच्चों से बात की. स्पाइडरमैन का मास्क पहनकर आंदोलन कर रहे पीयूष ने कहा कि हमने बहुत पहले डिसाइड कर लिया था कि हमें दिल्ली जाकर जंतर-मंतर पर हो रहे आंदोलन में शामिल होना है लेकिन घर वाले नहीं मान रहे थे. उन्होंने कहा, "वो अभी भी राजी नहीं हुए हैं. हम उनसे लड़कर आए हैं. वैसे बोलकर तो आए थे कि एक दिन के लिए जा रहे हैं लेकिन अब 2-3 दिन हो चुके हैं. अब उनको कॉल पर बता दिया है कि जब आंदोलन खत्म होगा, हम तब ही आएंगे."

Latest and Breaking News on NDTV

पीयूष ने साफ-साफ कहा कि हम लोग बहुत गिल्ट में थे कि हमारी ही लड़ाई हो रही और हम ही उसमें शामिल नहीं हो पा रहे हैं. जब यह सवाल किया गया कि यहां जमा हुए बच्चे इतने क्रिएटिव मीम्स के जरिए अपनी बात को कैसे रख रहे हैं, वो कैसे डिसाइड कर रहे हैं कि क्या पोस्टर बनाने हैं तो इसपर जिम में वर्कआउट से प्यार करने वाले यथार्थ ने कहा, "मेरा मानना है कि सबसे अच्छा विरोध प्रदर्शन उस समय होगा जब सब एक साथ बैठेंगे और दिशा तय करेंगे. स्लोगन कैसे होने चाहिए, कौन से मीम्स से सरकार को टारगेट करना है." 

यथार्थ की बात को बीच में काटते हुए समय ने कहा कि इस जेनेरेशन को आपस में जोड़ने के लिए कई तरीके अपनाने पड़ेंगे. "उनको बुलाने का कोई एक तरीका नहीं है. एनीमे या सुपरहीरो वाले मीम्स से उन्हें बुलाया जा सकता है, उन्हें कहा जा सकता है कि आप अपने दोस्तों के साथ आ जाओ. वे धीरे-धीरे ही समझेंगे कि हमें भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हो जाना चाहिए. वे एक बार आएंगे तो वह दूसरों की बातें सुनेंगे, यह जानेंगे कि यहां क्या हो रहा है. मीम्स उन्हें यहां तक लाने का एक तरीका है."

बिना प्लानिंग के आ रहे बच्चे

खास बात है कि ये तीनों दोस्त बिना किसी तैयारी के सिर्फ एक दिन के लिए आए थे. यह किस्मत पर छोड़कर कि जो होगा देखा जाएगा. एक दिन की प्लानिंग अब 2-3 दिन में बीत चुकी है लेकिन वे अभी भी यहीं हैं और लंबे वक्त के लिए रहने को तैयार हैं. यथार्थ ने कहा, "हमने इंस्टा पर देखा था कि लोग दूर-दूर के राज्यों के गांवों से आ रहे हैं. हमारा यही सोचना था कि अगर वह दिल्ली में सर्वाइव कर ले रहे हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते. हमें यहां खाने को मिल जाता है. लोग अलग-अलग राज्यों से खाना भिजवा रहे हैं. हम में तीनों एक-एक बैग के साथ आए हैं बस. रात भर नारे लगाते हैं. हम पिछले दो दिनों से मुश्किल से दिन भर में एक या दो घंटे सोए हैं."

जंतर मंतर पर आंदोलनकारी स्टूडेंट का कई समूह अलग-अलग दिशाओं में नारे लगाते निकलता है
जंतर-मंतर की ओर जाने वाले तमाम रास्तों पर लगी पुलिस की बैरिकेडिंग के बाहर आपको हर वक्त दर्जनों फूड डिलिवरी करने वाली बाइक्स दिख जाएंगी. यहां बाहर ही वालंटियर्स खड़े हैं जो खाना रिसीव कर रहे हैं और अंदर भिजवा रहे हैं. यह खाना ऑनलाइन दूर-दराज के राज्यों से लोग भिजवा रहे हैं और एक तरह से इस विरोध-प्रदर्शन को अपना सपोर्ट दिखा रहे हैं. अंदर कई जगह दिल्ली के ही कई लोग और ग्रूप अपने-अपने स्तर पर खाना बांट रहे हैं. आप जिधर देखें उधर बच्चों को बर्गर, पिज्जा, छोले भटूरे से लेकर वेज बिरयानी खाते देखेंगे. 

"यह जेन जी है. यही तो सबकुछ कर पाएगी"

यह बच्चे यहां अपना डिसिप्लिन भी दिखा रहे हैं. मानो जैसे एक सिस्टम तैयार है. सैकड़ों बच्चे प्रोटेस्ट साइट पर झाड़ू के साथ फैले हुए हैं, कूड़ा जमा कर रहे हैं, उन्हें प्लास्टिक की बड़ी थैलियों में समेट रहे हैं और एक जगह जमा करते जा रहे हैं. ये तीन बच्चें भी सुबह से रात तक वक्त निकालकर यह काम करते हैं. पीयूष का कहना है, "हम खुद जाकर हेल्प करते हैं. किसी को भी सफाई करवानी होती है, हम पहुंच जाते हैं. आपको खाना बंटवाना हो या कोई न्यूज फैलवानी हो, हम उसमें हेल्प करते हैं. यहां किसी ऑर्गनाइजेशन की जरूरत नहीं है. कोई भी एक इंसान अगर सफाई कर रहा होता है तो उसकी मदद के लिए बहुत सारे लोग पहुंच जाते हैं.

Latest and Breaking News on NDTV

इन बच्चों से सवाल किया गया कि अमूमन स्कूल जाने वाले स्टूडेंट से इतनी मैच्योरिटी की उम्मीद नहीं की जाती है तो यहां उनका एकदम अलग रूप क्यों देखने को मिल रहा है. इसपर जवाब आया कि अब आपको उम्मीद करनी पड़ेगी. "यह जेन जी है. यही तो सबकुछ कर पाएगी. अब इस जेनेरेशन से उम्मीद नहीं रखेंगे तो और किससे रखेंगे."

"हमें नेपाल या बांग्लादेश वाली हालत नहीं चाहिए"

इन तीनों बच्चों का साफ कहना है कि वे बस शिक्षा व्यवस्था में सुधार चाहते हैं. वे हिंसा नहीं चाहते. समय ने कहा, "हमें नेपाल और बांग्लादेश वाली हालत किसी सूरत में नहीं चाहिए. एक तो वे दोनों इतने बड़े देश नहीं हैं. वहां प्रोटेस्ट हुए और सरकारें गिरीं. वहां सरकार दुबारा बनी तो जल्दी से काम पर लग जाएगी. लेकिन भारत में ऐसा कुछ हुआ तो पूरा स्ट्रक्चर हिल जाएगा. हर मिनिस्टर के लिए कोई नया मिनिस्टर चाहिए होगा, उसमें वक्त लगेगा. हम नहीं चाहते कि बांग्लादेश या नेपाल वाली हालत हो. उससे बहुत वक्त बर्बाद हो जाएगा. अगर किसी की नौकरी उस दौरान चली गई तो सुनने वाली कोई मिनिस्ट्री ही नहीं होगी उस वक्त."

Latest and Breaking News on NDTV

पुलिस कार्रवाई पर भी इन बच्चों की बात सुनना चाहिए. उनका कहना है कि ये पुलिस वाले हमारे लिए दुश्मन नहीं है. हम बस यही चाहते हैं कि वे अगर हमारा साथ नहीं दे सकते हैं तो हमारे खिलाफ कुछ करें भी नहीं. यथार्थ ने कहा, "वे अपनी जॉब ही कर रहे हैं. जब लाठी चल रही थी तो कुछ पुलिस वाले ऐसे भी थे जो बच्चों को बचा रहे थे, किनारे कर रहे थे, ताकि उन्हें डंडे न पड़े. लेकिन कुछ ऐसे भी हिंसक थे जिनको देखकर लगा कि वे घर का गुस्सा हम पर उतार रहे थे."

यह भी पढ़ें: जंतर मंतर के आस-पास 'कई जंतर मंतर', बोल रही हैं दीवारें- Ground Report