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संकट के इस समय में विदेश यात्राओं पर क्यों जा रहे हैं प्रधानमंत्री, भारत को क्या मिल रहा है

डॉ समीर शेखर
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 27, 2026 14:22 pm IST
    • Published On मई 27, 2026 14:22 pm IST
    • Last Updated On मई 27, 2026 14:22 pm IST
संकट के इस समय में विदेश यात्राओं पर क्यों जा रहे हैं प्रधानमंत्री, भारत को क्या मिल रहा है

आज दुनिया अभूतपूर्व आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों का सामना कर रही है. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में अस्थिरता, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक मंदी की आशंका और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार विदेश दौरे केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा जरूरतों, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक नेतृत्व को मजबूत करने की रणनीति के रूप में सामने आए हैं. प्रधानमंत्री की विदेश नीति का मूल उद्देश्य 'भारत प्रथम' की अवधारणा के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के हितों को सुरक्षित करना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, तकनीकी सहयोग बढ़ाना और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को सशक्त बनाना है. पीएम मोदी ने पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात, नार्वे, इटली, स्वीडज और डेनमार्क की यात्रा की. आइए देखते हैं कि इस यात्रा से भारत को क्या हासिल होगा. 

विदेश यात्राओं की आवश्यकता और पृष्ठभूमि

विश्व राजनीति में आज आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy) का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है. किसी भी देश की शक्ति केवल सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि उसके आर्थिक संबंधों, ऊर्जा संसाधनों और वैश्विक साझेदारियों से भी तय होती है. भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है.भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का करीब 85 फीसद तेल आयात करता है. ऐसे में तेल संकट भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता उत्पन्न हुई. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत में महंगाई, व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा. इसके अतिरिक्त वैश्विक मंदी की आशंका ने निर्यात आधारित अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित किया. ऐसी परिस्थिति में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएं कई कारणों से आवश्यक हो गईं, इनमें ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, वैकल्पिक तेल और गैस आपूर्ति स्रोत विकसित करना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, नई तकनीकों और हरित ऊर्जा सहयोग को बढ़ाना, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका मजबूत करना, भारत को विनिर्माण और निवेश केंद्र के रूप में स्थापित करना आदि शामिल है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विदेश नीति में 'बहु-संरेखीय कूटनीति' (Multi-alignment Diplomacy) को अपनाया है. इसमें भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, खाड़ी देशों और एशियाई देशों सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए हुए है.

भारत और संयुक्त अरब अमीरात के संबंध कैसे हैं

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)आज भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा साझेदार बन चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न विदेश यात्राओं के दौरान भारत और UAE के बीच कई ऐतिहासिक समझौते हुए. जिन्होंने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. दोनों देशों के बीच लागू किया गया व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (कम्प्रेहैंसिव इकनोमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट) द्विपक्षीय व्यापार को तेज़ी से बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.इसके  माध्यम से व्यापारिक बाधाओं को कम कर निवेश और निर्यात को प्रोत्साहन मिला है. इसके अतिरिक्त भारतीय रुपया और यूएई दिरहम में व्यापार करने की सहमति से डॉलर पर निर्भरता कम होने और विदेशी मुद्रा की बचत में सहायता मिली है. ऊर्जा क्षेत्र में तेल भंडारण, एलएनजी आपूर्ति और नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती प्राप्त हुई है.वहीं फिनटेक और डिजिटल भुगतान प्रणाली के अंतर्गत भारत के यूपीआई और यूएई की डिजिटल व्यवस्था के बीच सहयोग ने आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है. इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, स्मार्ट सिटी और औद्योगिक परियोजनाओं में यूएई के निवेश ने भारत में रोजगार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा किए हैं. इन समझौतों का एक महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि खाड़ी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति अधिक मजबूत हुई है. वहां रहने वाले भारतीय प्रवासी समुदाय के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है. अब भारत एक बड़े निवेश गंतव्य, तकनीकी साझेदार और वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है.

किस दिशा में जा रहे हैं भारत-इटली के संबंध 

इटली के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया कूटनीतिक सक्रियता ने भारत-इटली संबंधों को एक नया रणनीतिक आयाम प्रदान किया है. लंबे समय तक दोनों देशों के संबंध मुख्यतः व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित रहे, लेकिन वर्तमान वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों देशों ने अपने संबंधों को 'रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक उन्नत कर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत और इटली अब केवल पारंपरिक सहयोगी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैश्विक साझेदार के रूप में आगे बढ़ना चाहते हैं. प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी के नेतृत्व में हुए समझौतों ने रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की नई संभावनाएं खोल दी हैं. विशेष रूप से रक्षा और सुरक्षा सहयोग के अंतर्गत रक्षा उत्पादन, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों पर सहमति भारत के 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को मजबूती प्रदान करती है. इससे भारत को अत्याधुनिक यूरोपीय रक्षा तकनीकों और उत्पादन क्षमता तक पहुंच प्राप्त होगी, जिससे घरेलू रक्षा उद्योग का विकास संभव होगा. इसके अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए समझौते वर्तमान वैश्विक ऊर्जा संकट के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा संक्रमण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने हेतु दोनों देशों के बीच सहयोग भारत के सतत विकास लक्ष्यों और हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र में मशीनरी, ऑटोमोबाइल और डिजाइन उद्योगों में निवेश बढ़ाने पर सहमति भारत को यूरोपीय तकनीकी दक्षता और पूंजी प्राप्त करने में सहायक होगी. स्टार्टअप और नवाचार सहयोग के अंतर्गत भारतीय तकनीकी स्टार्टअप्स और अनुसंधान संस्थानों को यूरोपीय बाजार और वैश्विक नवाचार नेटवर्क से जुड़ने का अवसर मिलेगा. इन समझौतों का व्यापक प्रभाव यह है कि यूरोप में भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्वीकार्यता बढ़ी है. इटली भारत के लिए यूरोपीय संघ के भीतर एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के रूप में उभर रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला संकट के दौर में भारत और इटली के बीच यह बढ़ती निकटता न केवल आर्थिक हितों की पूर्ति करती है, बल्कि दोनों देशों को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक-दूसरे का विश्वसनीय साझेदार भी बनाती है. 

भारत में निवेश करेगा नार्वे?

नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नार्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्तोरे के बीच हुई वार्ताओं ने भारत-नार्वे संबंधों को एक नई रणनीतिक दिशा प्रदान की. यह यात्रा केवल द्विपक्षीय कूटनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि हरित ऊर्जा, ब्लू इकॉनमी, समुद्री तकनीक और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर दीर्घकालिक साझेदारी का आधार बनी. भारत के लिए नार्वे जैसे तकनीकी रूप से उन्नत और ऊर्जा संपन्न देश के साथ सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है.दोनों देशों ने ग्रीन हाइड्रोजन, ऑफशोर विंड एनर्जी, कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज और नवीकरणीय ऊर्जा निवेश को बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की. उल्लेखनीय है कि नार्वे की सरकारी निवेश निधि 'नॉर्वेजियन सॉवरेन वेल्थ फंड' जिसकी परिसंपत्तियां 1.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मानी जाती हैं, भारत के अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और हरित परियोजनाओं में लगातार निवेश बढ़ा रही है. भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है. इसमें नार्वे की तकनीकी विशेषज्ञता भारत के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है.

भारत की खाद्य, जल और तकनीकी सुरक्षा को मजबूत करेगा नीदरलैंड? 

वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट, ऊर्जा अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा भारत की आर्थिक और रणनीतिक कूटनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई. कृषि तकनीक, डेयरी, जल प्रबंधन और हाई-टेक उद्योगों में अग्रणी नीदरलैंड, सीमित कृषि भूमि होने के बावजूद अमेरिका के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कृषि निर्यातक देश है. उसका सालाना कृषि निर्यात 120 बिलियन यूरो से अधिक है. प्रधानमंत्री मोदी और डच प्रधानमंत्री मार्क रूट के बीच हुई वार्ता में स्मार्ट एग्रीकल्चर, क्लाइमेट रेजिलिएंट फार्मिंग, डेयरी तकनीक, कोल्ड चेन, जल संरक्षण और बंदरगाह अवसंरचना जैसे विषय प्रमुख रहे. दोनों देशों ने कृषि एवं जल प्रबंधन कार्यसमूह को सक्रिय बनाने और हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और गुजरात में ड्रिप सिंचाई, प्रिसीजन फार्मिंग और ग्रीनहाउस तकनीकों को बढ़ावा देने पर सहमति जताई है. यह सहयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की करीब 52 फीसद कृषि भूमि मानसून पर निर्भर है और नीति आयोग के अनुसार करीब 60 करोड़ लोग जल संकट से प्रभावित हैं. नीदरलैंड की बाढ़ नियंत्रण और शहरी जल निकासी तकनीक मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों के लिए उपयोगी मानी जा रही है. इसके अतिरिक्त सेमीकंडक्टर, डिजिटल तकनीक और हाई-टेक विनिर्माण में सहयोग 'मेक इन इंडिया' को गति देगा. साल 2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 27 बिलियन डॉलर तक पहुंचा, जबकि डच निवेश 50 बिलियन डॉलर से अधिक आंका गया. यह यात्रा भारत की खाद्य, जल और तकनीकी सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई.

क्या रक्षा संबंध बढ़ाएंगे भारत-स्वीडन

प्रधानमंत्री की स्वीडन यात्रा भारत की आर्थिक और तकनीकी कूटनीति के नजरिए से अत्यंत महत्वपूर्ण रही. प्रधानमंत्री मोदी और स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसॉन के बीच हुई वार्ताओं में विशेष रूप से हरित ऊर्जा, उन्नत विनिर्माण, रक्षा तकनीक, स्मार्ट मोबिलिटी, 5G/6G संचार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टार्टअप सहयोग जैसे विषयों पर सहमति बनी. दोनों देशों ने 'ग्रीन ट्रांजिशन पार्टनरशिप' को और मजबूत करने पर बल दिया, इसके तहत कार्बन उत्सर्जन में कमी, स्वच्छ औद्योगिक तकनीकों और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाने की योजना बनाई गई. Ericsson, IKEA, Volvo औल ABB जैसी स्विडिश कपंनियां पहले से ही भारत में दूरसंचार, विनिर्माण, परिवहन और ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं. वर्ष 2024-25 में भारत और स्वीडन के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 3.5 बिलियन डॉलर से अधिक आंका गया, जबकि 280 से अधिक स्वीडिश कंपनियां भारत में सक्रिय हैं. ये कंपनियां लाखों की संख्या में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर उत्पन्न कर रही हैं. इस यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग भी प्रमुख विषय रहा, जिसमें उन्नत रक्षा उपकरण, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा से जुड़े समझौतों पर चर्चा हुई. भारत के 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत स्वीडिश कंपनियों द्वारा रक्षा एवं हरित प्रौद्योगिकी विनिर्माण में निवेश की संभावनाएं बढ़ीं. इसके अतिरिक्त, स्मार्ट सिटी, अपशिष्ट प्रबंधन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के क्षेत्र में स्वीडन की विशेषज्ञता भारत के सतत शहरी विकास लक्ष्यों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जा रही है. 


डिस्क्लेमर: लेखक ओडिशा के भुबनेश्वर स्थित कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विपणन पढ़ाते हैं.  इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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