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बर्फीले तूफान और गर्म होती पृथ्वी: जलवायु परिवर्तन पर कितना सच बोल रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप

ओजस्विनी तक्षक
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जनवरी 25, 2026 10:28 am IST
    • Published On जनवरी 25, 2026 10:25 am IST
    • Last Updated On जनवरी 25, 2026 10:28 am IST
बर्फीले तूफान और गर्म होती पृथ्वी: जलवायु परिवर्तन पर कितना सच बोल रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से जलवायु परिवर्तन को लेकर वैज्ञानिक समुदाय की सर्वसम्मत राय पर संदेह जताते रहे हैं.एक बार फिर उन्होंने इसी रुख को दोहराते हुए एक बड़े शीतकालीन तूफान (विंटर स्टॉर्म) को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ 'सबूत' के रूप में पेश करने की कोशिश की है. ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रूथ सोशल' पर लिखा, ''रिकॉर्ड ठंडी लहर 40 राज्यों को प्रभावित करने वाली है. पहले कभी ऐसा कम ही देखा गया है. क्या पर्यावरणवादी बता सकते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का क्या हुआ?''

पृथ्वी गर्म हो रही है या नहीं

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिका के बड़े हिस्से में एक भीषण शीतकालीन तूफान आया हुआ है. इसे  'विंटर स्टॉर्म फर्न' नाम दिया गया है. इस तूफान के कारण भारी बर्फबारी, खतरनाक बर्फीली बारिश, तेज हवाएं और अत्यधिक ठंड पड़ रही है. अनुमान है कि सोमवार तक यह तूफान अमेरिका में 23 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित कर सकता है. अमेरिका के करीब 14 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी में पहले ही आपातकाल घोषित किया जा चुका है.

हालांकि, जिस तरह से ट्रंप ने इस तूफान को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ तर्क के रूप में पेश किया, वह वैज्ञानिक दृष्टि से एक आम लेकिन गंभीर गलतफहमी को दर्शाता है. ठंडा मौसम या तीव्र सर्दी का होना यह साबित नहीं करता कि पृथ्वी गर्म नहीं हो रही है या जलवायु परिवर्तन नहीं हो रहा है. इसके विपरीत, जलवायु विज्ञान इससे कहीं अधिक जटिल और दीर्घकालिक प्रक्रिया है. मौसम और जलवायु को सामान्य जीवन में लोग एक जैसा अर्थ ही समझते हैं, इसलिए पहले दोनों के बीच अंतर समझना बेहद आवश्यक हो जाता है. मौसम किसी स्थान पर दिन-प्रतिदिन या सप्ताह-दर-सप्ताह होने वाले बदलावों को दर्शाता है, जिसमें बारिश, ठंड, गर्मी या तूफान इत्यादि निहित होते हैं. वहीं जलवायु किसी क्षेत्र या पूरे पृथ्वी के लंबे समय के औसत मौसम पैटर्न को दर्शाती है. 'टाइम' मैगजीन के एक लेख में इंडियाना यूनिवर्सिटी ब्लूमिंगटन में जलवायु विज्ञान के प्रोफेसर क्रिस्टोफर कॉलहन ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए हमें लंबी अवधि के रुझानों को देखना चाहिए बजाय इसके कि हम किसी एक मौसमीय घटना के आधार पर जलवायु परिवर्तन के बारे में राय बना लें. उनके अनुसार,''जलवायु परिवर्तन का दीर्घकालिक प्रक्रिया होने की वजह से हमे बीच-बीच में मौसम के उतार-चढ़ाव को अस्थायी घटनाओं के रूप में देखने की ओर इंगित करता है. अतः मौसम के इस अस्थायी बदलाव का मतलब यह नहीं है कि समग्र रूप से पृथ्वी गर्म नहीं हो रही है.''

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बर्फीले तूफान को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सबूत के रूप में पेश करने की कोशिश की है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बर्फीले तूफान को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ 'सबूत' के रूप में पेश करने की कोशिश की है.

कैसे आता है सर्दी का मौसम

पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव ही विभिन्न ऋतुओं का कारक है. जब उत्तरी गोलार्ध का झुकाव सूर्य से दूर की ओर होता है तब सर्दी होती है. जबकि उसी समय दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी होती है. यह हजारों सालों से चली आ रही प्राकृतिक प्रक्रिया है जो जलवायु परिवर्तन पर निर्भर नहीं है. इसका मतलब यह है कि भले ही वैश्विक औसत तापमान बढ़ रहा हो, फिर भी सर्दियों का आना, बर्फ पड़ना या ठंडे तूफानों का बनना पूरी तरह संभव और स्वाभाविक है.जलवायु परिवर्तन ऋतुओं को 'खत्म' नहीं करता, बल्कि उनके स्वरूप और तीव्रता को प्रभावित करता है.

वैज्ञानिक समुदाय में इस बात पर व्यापक सहमति है कि जलवायु परिवर्तन के कारण औसतन सर्दियां छोटी और अपेक्षाकृत हल्की हो रही हैं. लेकिन इसके साथ-साथ चरम मौसम घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ रही है. इनमें शामिल हैं अत्यधिक गर्मी की लहरें, भारी वर्षा और अचानक बाढ, लंबे और गंभीर सूखे, भीषण जंगल की आग, शक्तिशाली तूफान और हरिकेन इत्यादि.

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क्या धरती का तापमान बढ़ने से बारिश अधिक होती है

जहां तक वैज्ञानिकों की बात है तो बहस इस बात पर है कि जलवायु परिवर्तन शीतकालीन तूफानों को भी अधिक तीव्र बना सकती है. प्रोफेसर कॉलहन इसे 'वास्तविक वैज्ञानिक बहस' बताते हैं, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि बुनियादी तथ्यों पर वैज्ञानिकों में सहमति है. एक अहम तथ्य यह है कि जैसे-जैसे पृथ्वी का वातावरण गर्म होता है, उसकी नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है. वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पर वातावरण करीब सात फीसदी अधिक नमी अपने अंदर रख सकता है. यही कारण है कि गर्म होती दुनिया में भारी बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. 

यही सिद्धांत सर्दियों पर भी लागू होता है. अगर सर्दियों के दौरान तापमान शून्य के आसपास रहता है, तो वातावरण में मौजूद अतिरिक्त नमी बर्फ के रूप में गिर सकती है. इसका नतीजा यह हो सकता है कि कुछ क्षेत्रों में पहले की तुलना में अधिक भारी बर्फबारी देखने को मिले, भले ही कुल मिलाकर सर्दियां छोटी होती जा रही हों. कॉलहन के मुताबिक,''आप ऐसी परिस्थितियों की कल्पना कर सकते हैं, जहां शीतकालीन तूफानों में पहले से ज्यादा नमी हो और इस वजह से ज्यादा बर्फ गिरे.''

पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव ही विभिन्न ऋतुओं का कारक है. जब उत्तरी गोलार्ध का झुकाव सूर्य से दूर की ओर होता है तब सर्दी होती है.

पृथ्वी का अपनी धुरी पर झुकाव ही विभिन्न ऋतुओं का कारक है. जब उत्तरी गोलार्ध का झुकाव सूर्य से दूर की ओर होता है तब सर्दी होती है.

राजनीति बनाम वैज्ञानिक सिद्धांत 

डोनाल्ड ट्रंप का बयान इस बात का उदाहरण है कि कैसे जलवायु परिवर्तन जैसे जटिल वैज्ञानिक मुद्दे को राजनीतिक बहस में सरल और भ्रामक तर्कों के जरिए पेश किया जाता है. एक ठंडे दिन या एक भीषण सर्दी के तूफान को देखकर यह कहना कि 'ग्लोबल वार्मिंग खत्म हो गई' न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत है, बल्कि यह जनता को भ्रमित भी करता है. प्रोफेसर कॉलहन का कहना है,पृथ्वी पर ऋतुएं बनी रहेंगी और जलवायु परिवर्तन चाहे जो भी हो, सर्दी का मौसम आता रहेगा. हर सर्दी में यह समझाना वाकई निराशाजनक होता है.''

विंटर स्टॉर्म फर्न जैसे घटनाक्रम यह याद दिलाते हैं कि मौसम कितना विनाशकारी हो सकता है, खासकर तब जब करोड़ों लोग बिजली कटौती, यातायात बाधाओं और जानलेवा ठंड का सामना कर रहे हों. लेकिन ऐसी घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के अस्तित्व को नकारने के लिए इस्तेमाल करना न तो तार्किक है और न ही वैज्ञानिक. जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए हमें व्यक्तिगत मौसम घटनाओं से ऊपर उठकर दीर्घकालिक आंकड़ों, वैश्विक रुझानों और वैज्ञानिक शोध पर भरोसा करना होगा. ठंडी लहरें, बर्फीले तूफान और सर्दियां इस सच्चाई को नहीं बदलतीं कि पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है और इसके प्रभाव मानव समाज, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों पर गहरे पड़ने वाले हैं.

जलवायु परिवर्तन कोई एक दिन या एक मौसम की कहानी नहीं है बल्कि यह दशकों और सदियों में आकार लेने वाली वास्तविकता है. इसलिए जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए विश्व को वैज्ञानिक सोच की जरूरत है, राजनीतिक व्यंग्य की नहीं.

डिस्क्लेमर: लेखिका इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) के स्कूल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी और ट्रांस डिसिप्लिनरी स्टडीज में शोध छात्र हैं.इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, एनडीटीवी का उनसे सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.  

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