बिहार सरकार द्वारा हाल ही में गांवों में हर घर पर प्रति वर्ष 1200 रुपये का कर लगाने का प्रस्ताव विचाराधीन है. इसका उद्देश्य पंचायतों को सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट और अन्य स्थानीय सेवाओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराना है. यह कदम राज्य के खर्च के बोझ को कम करने की दृष्टि से स्वागत योग्य है. जब राज्य सरकार हर छोटे-मोटे कार्य के लिए राजकीय कोष से व्यय करती है तो वित्तीय दबाव बढ़ना स्वाभाविक है. लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल कर संग्रह से वास्तविक समाधान निकलेगा? या हमें स्मार्ट गांवों के निर्माण के लिए पंचायती राज को सशक्त बनाने की एक सोची समझी योजना बनानी चाहिए?
क्या सफल है नगर निगम मॉडल
नगर निगम मॉडल गांवों पर सीधे लागू करने से समस्याएं बढ़ेंगी. जैसा की हमने देखा है कि सालों से शहर में नगर पालिका/परिषद कर संग्रह तो करते हैं, परंतु सड़कों पर गड्ढे, नालों की मरम्मत और सफाई की समस्या अभी भी वही हैं. अगर देखें तो न्यूनतम स्तर की सेवाएं भी नहीं मिल पा रही हैं. वो भी जब उन्हें राज्य सरकार निरंतर अनुदान देती रहती है. ऐसी स्थिति में केवल कर लगाने से पंचायतों में जिम्मेदारी का भाव नहीं जगेगा. गांववासी को पता है ये पैसा सरकारी कोष में जाएगा. इसमें ना उनकी कोई भागीदारी है ना जिम्मेदारी. सार्वजनिक संपत्ति को लेकर जो सामूहिक भावना होनी चाहिए, वो हमारे समाज में विकसित ही नहीं हुई है. लोग नई ढली सड़क से सीमेंट और सरिया तक उठा ले जा रहे हैं और सड़कों पर लगे फूल के गमले चुरा लिए जाते हैं.
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इसलिए सरकार को कर संग्रह के साथ-साथ पंचायतों को आर्थिक स्वायत्तता और राजस्व सृजन का अधिकार भी देना चाहिए, ताकि स्मार्ट गांवों का सपना साकार हो सके. दुनिया के कई देशों में स्थानीय शासन के सफल मॉडल यही सिखाते हैं कि जब स्थानीय समुदाय को अपनी संपत्ति और संसाधनों पर नियंत्रण मिलता है तो विकास तेज और सामूहिक हुआ है. बिहार में भी इसी दिशा में सोचने की जरूरत है.
यहां तक की आईआईएम अहमदाबाद ने अपने 2025 में एक कार्य पुस्तिका 'ग्राम पंचायतों द्वारा अपने राजस्व स्रोतों का सृजन'और नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (NIPFP) ने पंचायती राज मंत्रालय को 'स्वयं के राजस्व (OSR) सृजन के लिए एक व्यवहार्य वित्तीय मॉडल' नाम की रिपोर्ट सौंपी थी. इसमें पंचायती राज को आर्थिक दृष्टि से विकसित करने के उपायों पर विस्तृत जानकारी दी गई है.

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Photo Credit: AI Generated Images
कहां से प्रेरित है भारत की त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था
हमने देखा है कि दक्षिण अफ्रीका के तीन स्तरीय शासन से प्रेरित परंतु भारतीय अनुभवों, सामाजिक परिस्थितियों और राजनीतिक जरूरतों पर आधारित पंचायती राज व्यवस्था ने कैसे सत्ता के विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों को ज़मीनी स्तर पर किस तरह से मज़बूत किया है. ऐसे में हमें पंचायत को केवल गृह कर पर निर्भर ना बनाकर उन्हें सार्वजनिक जमीन, जंगल और जल स्रोतों का आर्थिक उपयोग करने का अधिकार देना चाहिए. गांवों में तालाब या पोखर के मछली पालन का अक्सर राज्य स्तर पर टेंडर होता है. इससे मिली राशि राज्य सरकार के खजाने में चली जाती है. सार्वजनिक भूमि और जंगल के उत्पादों का भी यही हाल है. इसका परिणाम यह होता है कि गांववासी इस सारी प्रक्रिया से अपने को अलग-थलग महसूस पाते हैं. यदि पंचायत खुद प्रतिवर्ष इन तालाबों, जंगलों के उत्पाद, सार्वजनिक उद्यानों का ख़ुद ही आय अर्जित करें तो स्थिति बदल सकती है. यह धन सीधे गांव की सड़कों, स्वच्छता और संरचनात्मक सुविधाओं पर खर्च होगा. इससे न केवल संसाधन बढ़ेंगे बल्कि गांववासियों में स्वामित्व का भाव जगेगा.
दूसरा, अतिक्रमण की समस्या का समाधान होगा. गांवों में सार्वजनिक संपत्ति जैसे तालाब, बगीचे, जमीन अक्सर कुछ लोगों द्वारा हड़प ली जाती है. पंचायतों को इन अतिक्रमणों को हटाने और उस भूमि से राजस्व उत्पन्न करने का अधिकार होना चाहिए. खाली पड़ी जगहों पर सामुदायिक उद्यान, छोटे बाजार या अन्य उपयोगी संरचना बनाकर किराया वसूला जा सकता है. इस आय का उपयोग गांव के सामूहिक उद्यमों जैसे डेयरी, हैंडीक्राफ्ट या सौर ऊर्जा परियोजनाओं में किया जा सकता है.
कैसे अपनी आय बढ़ा सकते हैं गांव
तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत सरकारी बगीचे, तालाब को कमाई का जरिया बनाया जाना चाहिए. मनरेगा के तहत अनेक तालाब खुदवाए गए और वृक्षारोपण किया गया, लेकिन आज इनकी कोई देखभाल नहीं हो रही है. ये सब अब धीरे-धीरे नष्ट हो रही हैं. तालाबों में मछली पालन का ठेका, वृक्षों से फल-फूल या लकड़ी संबंधी आय या फिर पर्यटन जैसा उपयोग. जब पंचायत इन पर नियंत्रण रखेगी तो रखरखाव भी सुनिश्चित होगा और अतिरिक्त राजस्व गांव के विकास में लगेगा. इससे योजनाओं की दीर्घकालिक उपयोगिता बढ़ेगी और स्मार्ट गांवों की नींव मजबूत होगी.
चौथा, पंचायतों को सार्वजानिक भूमि और संपत्ति पट्टे पर देने की अनुमति दी जाए. कई गांवों में सरकारी भवन या खाली प्लॉट पड़े रहते हैं. इच्छुक किसान या युवा इन पर पट्टा लेकर छोटे उद्योग, दुकान या पशुपालन शुरू कर सकें. पंचायत एक निश्चित शुल्क लेकर आय प्राप्त करे और गांव के विकास में लगाए.
पांचवां, प्रत्येक पंचायत को नियमित साप्ताहिक बाजार आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए. स्थानीय उत्पादों के लिए हाट लगाई जाए जहां किसान, कारीगर और छोटे व्यवसायी अपने सामान बेच सकें. विक्रेताओं से मामूली शुल्क लेकर पंचायत राजस्व उत्पन्न करें. परंपरागत रूप से ये बाजार कस्बों में होते रहे हैं, लेकिन अब गांवों को सहायता देकर वहां ऐसे साप्ताहिक मेले या हाट-बाजार लगवाने चाहिए. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था सक्रिय होगी, किसानों को बेहतर मूल्य मिलेगा और पंचायत को निरंतर आय का स्रोत प्राप्त होगा.
गांव के उत्पादों की उपभोक्ताओं तक पहुंच कैसे बनेगी
छठा, गांवों को ई-कॉमर्स की आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ना. आज शहरी उपभोक्ता सीधे किसानों से ताजा और ऑर्गेनिक उत्पाद चाहते हैं. चीन के ताओबाओ गांवों का मॉडल इस दिशा में प्रेरणादायक है. वहां के गांवों ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए शहरी बाजार तक सीधी पहुंच बनाई. बिहार में भी पंचायतों को युवाओं को प्रशिक्षण देकर, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था करके इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. सरकार शुरुआती सहायता दे- ऐप प्रशिक्षण, छोटे गोदाम और परिवहन साझेदारी. जब किसान सीधे उपभोक्ता तक पहुंचेंगे तो आय बढ़ेगी, मध्यस्थों के द्वारा शोषण कम होगा और गांव आत्मनिर्भर बनेंगे.
इन उपायों से केवल वित्तीय लाभ ही नहीं होगा. गांववासियों में सामूहिक जिम्मेदारी का भाव जगेगा. विकास की प्रक्रिया में वे सक्रिय भागीदार बनेंगे न कि केवल करदाता. वर्तमान व्यवस्था में कर संग्रह के बाद जवाबदेही का अभाव रहता है. जब आय का स्रोत गांव के भीतर होगा तो पारदर्शिता बढ़ेगी. डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से खर्च का विवरण सार्वजनिक किया जा सकता है. सोशल ऑडिट और नियमित ग्राम सभाएं इस प्रक्रिया को मजबूत करेंगी. हालांकि इसमें चुनौतियां भी हैं. भ्रष्टाचार की आशंका को रोकने के लिए ग्राम सभा की नियमित बैठक, पंचायत स्तर पर ऑडिट और लेखा-जोखा का डिजिटल सार्वजनिकता की व्यवस्था से काफ़ी हद तक समाधान हो सकता है. राज्य हर साल पंचायतों को प्रोत्साहित और प्रतियोगिता भावना लाने के हर साल अच्छा काम करने वाले गांवों को एक निश्चित सरकारी अनुदान दे. सशक्त पंचायतें ही सच्चे विकेंद्रीकरण और स्मार्ट गांवों का आधार बन सकती हैं.
बिहार जैसे राज्य में जहां संसाधन सीमित हैं और आकांक्षाएं ऊंची, पारंपरिक तरीकों से आगे सोचने की जरूरत है. यदि पंचायतें केवल कर वसूलने वाली इकाई बनकर रह गईं तो विकास अधूरा रहेगा. समय आ गया है कि हम पंचायती राज को सही मायने में सशक्त करें. कर लगाना शुरुआत है, लेकिन सशक्तिकरण इसका अंतिम लक्ष्य होना चाहिए. जब गांव अपनी कमाई खुद करेंगे, राज्य सरकार अपने वर्तमान वितीय अनुदान में भी भारी कटौती ना करे तो गांव अपनी समस्याएं खुद सुलझाएंगे और अपनी सफलता खुद गिनेंगे. तब जाके स्मार्ट गांवों का सपना पूरा होगा और बिहार की सच्ची प्रगति संभव होगी. यह न केवल वित्तीय समाधान है बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है.
(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के चीनी अध्ययन, पूर्वी एशियाई अध्ययन विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.