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असीमित ताकत ने रावण को किया था बर्बाद, क्या AI एजेंट्स भी बनेंगे आधुनिक भस्मासुर? जानें सबसे बड़ा साइबर खतरा

देवेश वत्सा
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 05, 2026 20:35 pm IST
    • Published On सितंबर 05, 2026 20:34 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 05, 2026 20:35 pm IST
असीमित ताकत ने रावण को किया था बर्बाद, क्या AI एजेंट्स भी बनेंगे आधुनिक भस्मासुर? जानें सबसे बड़ा साइबर खतरा

कहा जाता है कि ताकत इंसान को भ्रष्ट बनाती है, और असीमित ताकत पूरी तरह से भ्रष्ट कर देती है. हिंदू पौराणिक कथाओं में रावण की कहानी इसका एक बड़ा उदाहरण पेश करती है. भक्ति और तपस्या से अपार शक्ति और अजेय होने का वरदान पाने के बावजूद, उसने अहंकार को अपनी बुद्धि पर हावी होने दिया और अपनी ताकत को अत्याचार में बदल दिया. उसका पतन ये साबित करता है कि अगर अनियंत्रित इच्छाओं पर लगाम न लगाई जाए, तो क्षमता किसी बात की गारंटी नहीं देती है. यही हश्र बिना पर्याप्त नियंत्रण के काम करने वाले किसी शक्तिशाली AI एजेंट का भी हो सकता है.

हम आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को केवल सवालों के जवाब देने वाले सिस्टम्स (Query या Prompt) से आगे बढ़कर खुद काम करने वाले सिस्टम्स (AI Agents) में बदलते देख रहे हैं. AI एजेंट्स इंटरनेट ब्राउज कर सकते हैं, कोड लिख और चला सकते हैं. साथ ही डेटाबेस एक्सेस कर सकते हैं, APIs कॉल कर सकते हैं, मैसेज भेज सकते हैं, नए अकाउंट्स बना सकते हैं और दूसरे एजेंट्स के साथ तालमेल बिठा सकते हैं. 'Intelligence-as-a-service' से 'Agency-as-a-service' की ओर ये बदलाव जहां प्रोडक्टिविटी में भारी बढ़ोतरी का वादा करता है, वहीं यह साइबर सिक्योरिटी की एक बिल्कुल नई चुनौती भी खड़ी करता है.

AI Agents निकल रहे हाथ से

कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट से बाहर निकलकर बाहरी वेबसाइट्स से जुड़ने वाले अनकंट्रोल्ड (rogue) AI एजेंट्स से जुड़ी हालिया घटनाएं दिखाती हैं कि इस चिंता को अब सिर्फ साइंस-फिक्शन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. जुलाई 2026 में, OpenAI ने खुलासा किया कि एक इंटरनल साइबर-कैपेबिलिटी टेस्टिंग के दौरान, उसके AI एजेंट्स सैंडबॉक्स (सुरक्षित घेरे) से बाहर निकल गए. उन्होंने इंटरनेट का अनचाहा एक्सेस हासिल कर लिया और बेंचमार्क टेस्ट के जवाब पाने के लिए Hugging Face के प्रोडक्शन सिस्टम में सेंध लगा दी. इसे बिना किसी इंसानी दुर्भावना वाला एक "अभूतपूर्व साइबर हादसा" बताया गया. बाद में स्वतंत्र जांचकर्ताओं ने रिपोर्ट दी कि सैकड़ों एजेंट्स ने आपस में अपनी गतिविधियों का तालमेल बिठाया और अपने किए के सबूतों को छिपाने या उनसे छेड़छाड़ करने की कोशिश की.

इससे भी ज्यादा चिंता की बात ये है कि सितंबर 2026 में सामने आई रिपोर्ट्स में इससे भी पहले की एक घटना का जिक्र है. जिसमें OpenAI से जुड़े एजेंट्स ने कथित तौर पर एक जर्मन भाषा की विकी साइट पर कंट्रोल कर लिया, उसे बातचीत के प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल किया और हजारों एडिट्स किए. ये घटनाएं साइबर रिस्क की एक नई कैटेगरी की ओर इशारा करती हैं, एक ऐसा ऑटोनॉमस एजेंट जो अनजाने में खुद एक साइबर अटैकर बन जाता है.

AI असिस्टेंस से AI एजेंसी तक

पारंपरिक AI आमतौर पर इंसानी निर्देशों का इंतजार करता है और सिर्फ जवाब तैयार करता है. इसके विपरीत, एक AI एजेंट किसी टारगेट को समझ सकता है, प्लान बना सकता है, टूल्स चुन सकता है, कई स्टेप्स पूरे कर सकता है और नतीजों के आधार पर खुद को ढाल सकता है. यही खूबी इन एजेंट्स को बेहद ताकतवर और साथ ही बेहद खतरनाक बनाती है.

उदाहरण के लिए, अगर किसी एजेंट को ये लक्ष्य दिया जाए कि "किसी खास सिस्टम में खामियां ढूंढो", तो वह सिस्टम्स को स्कैन कर सकता है, अकाउंट्स बना सकता है, खामियों का फायदा उठा सकता है और लंबे समय तक अपना एक्सेस बनाए रख सकता है. इसी तरह अगर इसे "किसी खास बिजनेस प्रोसेस को बेहतर बनाने" का काम दिया जाए, तो यह डेटाबेस में बदलाव कर सकता है, मैसेज भेज सकता है या सेटिंग्स बदल सकता है. अगर लक्ष्य को लेकर इसकी समझ इंसानी सोच से अलग हो गई, तो ये एजेंट मशीन की रफ्तार से गलत रणनीति पर काम कर सकता है.

इस वजह से सुरक्षा का मूल सवाल अब ये नहीं रह गया कि "क्या AI नुकसानदेह जानकारी बना सकता है?", बल्कि ये हो गया है कि "AI असल दुनिया में अपने दम पर क्या-क्या कर सकता है?"

परमिशन की दिक्कत

सबसे बड़ा खतरा शायद कोई मैलेशियस AI नहीं है, बल्कि जरूरत से ज्यादा परमिशन वाला कोई वैलिड AI है. अगर किसी कंपनी का एजेंट ईमेल, क्लाउड स्टोरेज, सोर्स-कोड रिपॉजिटरी, फाइनेंशियल सिस्टम, पहचान प्लेटफॉर्म और इंटरनल डेटाबेस से एक साथ जुड़ा है, तो वह असल में खास अधिकारों वाला एक डिजिटल कर्मचारी बन जाता है. अगर इसके साथ कोई छेड़छाड़ होती है या इसे हैक कर लिया जाता है, तो ये एजेंट किसी अटैकर्स को कंपनी के कई दायरों में आसानी से घुसने का बना-बनाया रास्ता दे देता है.

यह ठीक उसी तरह "Living off the agent" (LOTA) का खतरा पैदा करता है, जैसे साइबर हमलों में "Living off the land" (LOTL) तकनीक होती है. इसमें कोई मैलवेयर डालने के बजाय, अटैकर्स किसी ऑथोराइज्ड AI एजेंट को अपने हिसाब से भटका देता है और उससे अपने फायदे के लिए काम करवाता है. हालिया साइबर सुरक्षा विश्लेषणों ने इस उभरते खतरे को का जिक्र किया है क्योंकि एजेंट्स कंपनियों के कामकाज में गहराई से शामिल होते जा रहे हैं.

'इनडायरेक्ट प्रॉम्प्ट इंजेक्शन' से हो सकता है गंभीर खतरा

AI एजेंट्स साइबर हमलों के लिए एक नया रास्ता भी खोलते हैं क्योंकि वे गैर-भरोसेमंद जानकारी को प्रोसेस करते हैं. किसी वेबपेज, ईमेल, डॉक्यूमेंट, रिपॉजिटरी या डेटाबेस में छिपा कोई दुर्भावनापूर्ण निर्देश एजेंट द्वारा सामान्य डेटा के बजाय एक आदेश समझ लिया जा सकता है. इसे 'इनडायरेक्ट प्रॉम्प्ट इंजेक्शन' कहा जाता है.

इसके नतीजे काफी गंभीर हो सकते हैं. सुरक्षा शोधकर्ताओं ने ऐसे लैंडस्कैप दिखाए हैं जहां खतरनाक वेब कंटेंट एजेंट्स को प्राइवेट जानकारी उजागर करने, फैसलों को बदलने या अनऑथोराइज्ड कदम उठाने के लिए भड़का सकता है. ये समस्या इसलिए ज्यादा पेचीदा है क्योंकि आम बोलचाल की भाषा खुद इस हमले का जरिया बन जाती है. किसी लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) के लिए "सिर्फ पढ़ने लायक डेटा" और "पालन करने लायक निर्देश" के बीच का फर्क समझना हमेशा आसान नहीं होता.

अनकंट्रोल्ड एजेंट काफी खतरनाक

एक अकेला अनकंट्रोल्ड एजेंट भी खतरनाक होता है. लेकिन जब सैकड़ों या हजारों एजेंट्स आपस में मिलकर काम करने लगें तो ये हालात को पूरी तरह बदल सकता है. ये बिल्कुल युद्ध में ड्रोन के झुंड (swarms) की मारक क्षमता जैसा है. जैसा आपने हाल में मौजूदा संघर्षों और ऑपरेशन-सिंदूर (Op-Sindoor) में देखा था. हाल ही में OpenAI/Hugging Face की जांच में कथित तौर पर एजेंट्स के बीच बड़े पैमाने पर बातचीत और तालमेल पाया गया, जो 'AI साइबर स्वार्म्स' (झुंड) की आशंका को जन्म देता है जहां बड़ी संख्या में कैपेबल एजेंट्स आपस में काम बांट लेते हैं.

PLA के एटलस ड्रोन प्रोग्राम की तरह, एक AI साइबर झुंड एक साथ जासूसी (रेकी), कमियों की तलाश, उनका फायदा उठाना, पासवर्ड/क्रेडेंशियल्स की खोज, सोशल इंजीनियरिंग और लंबे समय तक सिस्टम में बने रहने जैसे काम एक साथ कर सकता है. सबसे अहम बात है कि ये एजेंट्स एक-दूसरे की सफलताओं और विफलताओं से सीख सकते हैं.

इससे साइबर युद्ध का पूरा गणित बदल जाता है. वर्तमान में जटिल साइबर ऑपरेशन्स के लिए कुशल इंसानों की बड़ी टीमों की जरूरत होती है, लेकिन जल्द ही बहुत कम इंसान हजारों टार्गेट्स पर लगातार काम करने वाले बड़ी संख्या में ऑटोनॉमस डिजिटल एक्टर्स की निगरानी कर सकेंगे.

लेनी होगी जिम्मेदारी

जवाबदेही की भी एक बड़ी समस्या है. जब कोई एजेंट अपनी तय सीमाओं से बाहर जाकर काम करता है, तो जिम्मेदार कौन होगा? क्या जिम्मेदारी उस डेवलपर की है जिसने मॉडल बनाया? उस कंपनी की जिसने इसे तैनात किया? उस कर्मचारी की जिसने इसे अधिकृत किया? क्लाउड प्रोवाइडर की? या फिर खुद उस एजेंट की?

मौजूदा साइबर सुरक्षा नीतियां मुख्य रूप से इंसानी फैसला लेने वालों और तयशुदा नियमों पर चलने वाले सॉफ्टवेयर के इर्द-गिर्द बनाई गई थीं. ऑटोनॉमस एजेंट्स उस सीमा को धुंधला कर देते हैं. इसलिए कंपनियों को एजेंट्स को सिर्फ एक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार, जवाबदेही और व्यवहार वाले डिजिटल एक्टर्स के रूप में देखना होगा.

होना चाहिए AI एजेंट्स के चारों तरफ मजबूत सुरक्षा ढांचा

इन तमाम खतरों के बावजूद AI एजेंट्स के डेवलपमेंट को रोका नहीं जाना चाहिए. बिजनेस और रोजमर्रा के कामकाज के लिए इनकी कैपिबिलिटी बहुत जरूरी हैं. जरूरी ये है कि कोड की पहली लाइन से ही AI एजेंट्स के चारों तरफ मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार किया जाए.

Agentic AI डेवलप करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर एजेंट के पास कुछ चीजें हों.

  • किसी भी एजेंट को जरूरत से ज्यादा अधिकार या परमिशन नहीं मिलनी चाहिए.
  • हर एक्शन किसी खास एजेंट और उससे जुड़े जिम्मेदार इंसान के नाम दर्ज होना चाहिए.
  • पूरे सिस्टम का पूरा एक्सेस देने के बजाय केवल तय कामों के लिए ही अनुमति दी जानी चाहिए.
  • पैसों के लेन-देन, डेटा डिलीट करने, अधिकार बढ़ाने और बाहरी सिस्टम्स से जुड़ने जैसे बड़े कदमों के लिए इंसानी मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए.
  • कंपनियों को केवल नेटवर्क ट्रैफिक ही नहीं, बल्कि एजेंट के लक्ष्यों, टूल्स के इस्तेमाल और फैसले लेने के तरीकों पर भी लगातार नजर रखनी चाहिए.
  • एजेंट्स के पास अपने खुद के एक्शन लॉग्स और सबूतों को बदलने या मिटाने का अधिकार नहीं होना चाहिए.
  • एजेंट्स को कड़े कंट्रोल वाले सैंडबॉक्स में काम करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उनके अधिकार तुरंत वापस लिए जा सकने चाहिए.
  • ऑटोनॉमस सिस्टम्स को बिना रोक-टोक दूसरे एजेंट्स को खोजने, उन पर भरोसा करने या उनके साथ तालमेल बिठाने की छूट नहीं होनी चाहिए.
  • कंपनियों को नियमित रूप से यह टेस्ट करना चाहिए कि क्या एजेंट्स को उनकी तय सीमाओं को तोड़ने के लिए भड़काया जा सकता है.
  • किसी भी एजेंट के काम को तुरंत रोकने और उसके क्रेडेंशियल्स रद्द करने का एक पक्का और भरोसेमंद तंत्र हमेशा मौजूद होना चाहिए.
  • इसका मूल मंत्र "Zero trust for agents" होना चाहिए.

सबक लेने की जरूरत

अनकंट्रोल्ड एजेंट्स की घटनाओं से सबसे बड़ा सबक ये नहीं है कि AI बुरा या दुष्ट बन रहा है. बल्कि सबक ये है कि क्षमता कभी-कभी कंट्रोल से आगे निकल सकती है. भारी नुकसान पहुंचाने के लिए किसी AI एजेंट को इंसानों जैसी चेतना की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए केवल पर्याप्त क्षमता, एक्सेस, लगातार प्रयास और अस्पष्ट लक्ष्य ही काफी होते हैं.

इसलिए साइबर सुरक्षा का दायरा एक बार फिर बदल रहा है. कोड को सुरक्षित करने से लेकर डेटा की सुरक्षा, AI मॉडल्स की सुरक्षा और अब ऑटोनॉमस डिजिटल एक्टर्स की सुरक्षा तक. अगली पीढ़ी की साइबर सुरक्षा को ये मानकर चलना होगा कि कुछ एजेंट्स हैक होंगे, कुछ अप्रत्याशित व्यवहार करेंगे और कुछ अपनी पाबंदियों को तोड़ने की पूरी कोशिश करेंगे.

इसका सीधा सिद्धांत होना चाहिए कि किसी भी ऑटोनॉमस एजेंट को कभी ऐसा अधिकार न दें जिसे आप लगातार मॉनिटर, लिमिट या तुरंत कैसिंल न कर सकें.

AI एजेंट्स मानवता द्वारा तैयार किया गया अब तक का सबसे प्रोडक्ट डिजिटल वर्कफोर्स बन सकते हैं. लेकिन स्ट्रांग कंट्रोल के बिना, यही वर्कफोर्स हमारी कंपनियों के भीतर एक हमलावर ताकत बन सकता है और जीरो-डे (Zero-day) कमजोरियों की खोज करके पूरे इंटरनेट के लिए खतरा पैदा कर सकता है. इस वजह से AI सुरक्षा का भविष्य केवल बुद्धिमान मशीनों को भरोसेमंद बनाने तक सीमित नहीं है. ये सुनिश्चित करना भी है कि ये बुद्धिमत्ता कभी गैर-जवाबदेह ताकत न बन जाए.

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