जंतर मंतर पर Gen-Z की मिली कामयाबी पर सभी हैरत में हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जेन-जी की ताकत और जमाल का अंदाजा किसी को भी नहीं रहा हो. समाजशास्त्र पढ़ने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि दुनिया का कोई भी समाज जड़ नहीं होता है. वह गतिशील होता है. एक नई पीढ़ी के रूप में जेन-जी एक सामाजिक समुदाय ही है. लिहाजा वह भी नया रूप धारण करने की क्षमता रखता है. गौर इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि वक्त के इस नाजुक दौर में लोकतांत्रिक नैतिकता की पुनर्स्थापना के लिए दुनिया भर का जागरूक बालिग तबका बेचैन नजर आ रहा था. ऐसे मुश्किल दौर में जेन-जी नाम की ये मासूम पीढ़ी सड़क पर उतरी और बड़े-बड़ों को लोकतांत्रिक नैतिकता का पाठ पढ़ाकर चली गई.
जेन जी को मिला मिलेनियल का साथ
बेशक इस पीढ़ी का लहजा और शऊर किसी रहस्य से कम नहीं है. हालांकि यह एक उजागर तथ्य है कि जेन-जी से पहले वाली यानी 29 से 44 साल वाली मिलेनियल पीढ़ी जेन-जी की हैसियत से अनजान नहीं थी. इसका सबूत ये है कि जंतर-मंतर पर आए सैलाब में हर शाम के बाद एक अच्छी खासी तादाद में मिलेनियल्स भी नजर आ रहे थे. ढलती रात में वह पीढ़ी भी जंतर-मंतर पर उतनी ही शिद्दत से मुखर और पैर जमाए नज़र आई. आगे जब इस आंदोलन पर शोध होंगे तो हो सकता है कि यह बात भी निकल कर आए कि तमाम परेशानियों से जूझते हुए जो पढ़ी-लिखी पीढ़ी निजी कंपनियों में कम तनख्वाह वाली नौकरियां कर रही है, उनका साथ भी जेन-जी को खूब मिला. उनके अभिभावक भी अपने बच्चों की भागीदारी के चश्मदीद होने का मौका छोड़ नहीं रहे थे.
इस पीढ़ी को खर्चे-पानी की चिंता नहीं होती. खर्चा कमाने के लिए आमतौर पर गलत को भी सही मान लेने की जो मजबूरियां हो जाती हैं, वैसी मजबूरी इस पीढ़ी के सामने नहीं होती. लिहाजा इस पीढ़ी के युवा देर तक सही बात के लिए बहस करते रह सकते हैं. ये उनकी बहुत बड़ी ताकत है.

भारत की युवा पीढ़ी ने पढ़ाया लोकतंत्र का पाठ.
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जेन जी की समाजिक विज्ञानों में बढ़ती दिलचस्पी
मध्यम वर्गीय परिवारों में नई समझ यह बन रही है कि नए दौर में कारीगरी, इंजीनियरिंग और मेडिकल में करियर बनाना बेहद मुश्किल हो गया है, लिहाजा प्रशासनिक और लिपिकीय कामकाज में करियर बनाना आसान है. इसीलिए इस पीढ़ी को समाज व्यवस्था और राज व्यवस्था जैसे विषयों को शिद्दत से पढ़ने का मौका मिल रहा है. इस बात पर हैरत ही जताई जानी चाहिए कि नौवीं कक्षा की एक छात्रा जंतर-मंतर पर अपनी वह किताब लेकर आई थी जिसमें लोकतंत्र की परिभाषा बताई गई थी. यह नई पीढ़ी वह है, जो किताबों से राजनीतिक जागरूकता पाकर सड़कों पर आ रही है और राजनीतिक संवाद में पटु हो रही है.
प्रौद्योगिकी के क्रांतिकारी युग से सबसे ज्यादा हासिल कर लेने का मौका इसी पीढ़ी को मिला है. आश्चर्यजनक रूप से जागरूक हो रही इस पीढ़ी ने अपने व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रौद्योगिकी का भरपूर फायदा उठाया. यह पीढ़ी संवाद में निपुण है. उसने तपाक से जवाब देने के लिए वाक्यों को सिर्फ एक शब्द में कहने का हुनर सीखा है. उसने पाश्चात्य देशों की जेन-जी से सीखने में काई संकोच नहीं किया. अपनी पीढ़ी में वैश्विक एकरूपता की खातिर उसने धार्मिक, आंचलिक, जातीय, सामुदायिक अस्मिता के आग्रह को उठाकर एक तरफ रख दिया. उसने लोकप्रिय वैश्विक हावभाव और भाव-भंगिमाएं बनाना जल्द ही अपनी आदत में शामिल कर लिया.
भारत में लोकतंत्र की हालत
समाजशास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि युवा शक्ति का एक प्रमुख लक्षण है उसका स्वाभाविक रूप से नैतिक होना. कहते हैं कि कोई ऊर्जा अगर नैतिक भी हो तो उसकी ताकत का क्या कहना. जंतर-मंतर प्रकरण में यह बात बेहिचक कही जा सकती है. इतना ही नहीं अपनी उम्र के कारण उनकी मासूमियत किसी को भी उनका कायल बना सकती है. आंदोलनों या विरोध-प्रदर्शनों के अब तक के इतिहास में यह पहला मौका था कि दुनियाभर में सभी ने उन्हें सही माना. यहां तक जिनके खिलाफ आंदोलन था, उस सरकार को भी उन्हें सही बताना पड़ा.

नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर उन चप्पल-जूतों की प्रदर्शनी लगाई गई, जो पुलिस की कार्रवाई के दौरान छूट गए थे.
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स्वतंत्र भारत में शानदार इतिहास के बाबजूद अपने देश का वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांक संतोषजनक नहीं है. इस साल अप्रैल में जारी रिपोर्ट के मुताबिक 167 देशों की सूची में हम शुरू के 40 देशों में भी कहीं नहीं हैं. गौरतलब है कि इस सूचकांक की गणना के लिए जो पांच प्रमुख मानदंड हैं, उनमें एक पैमाना वहां की राजनीतिक संस्कृति भी है. इसके अलावा राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक अधिकार जैसे दूसरे मानदंड हैं. जाहिर है कि जंतर-मंतर पर मुख्य रूप से जेन-जी और उनके सहयोग में मिलेनियल्स का साथ आना अब अपने देश के लोकतांत्रिक सूचकांक को बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. गौर इस बात पर भी किया जाना चाहिए कि 37 दिन के इस अनोखे प्रदर्शन के आखिरी दिनों में देश के कई नगरों और महानगरों में भी विरोध-प्रदर्शन के लिए युवक-युवतियां सड़कों पर जमा होने लगे थे. जेन-जी आंदोलन के निमित्त से इस लोकतांत्रिक हलचल को एक सकारात्मक और नई लोकतांत्रिक संस्कृति के रूप में ही पहचाना जाना चाहिए.
नई पीढ़ी का नागरिक बोध कैसा है
इस बात को कौन नकार सकता है कि इस समय पूरी दुनिया में अपनी-अपनी शक्ति के प्रदर्शन का रवैया उफान पर है.अपने-अपने प्रदेशों और अपनी अपनी जाति धर्म या माली हैसियत के लिए खंड-खंड होते मानव समाज में सद़भाव और आपसी भाईचारा हाशिए पर दिख रहा है. लेकिन जंतर-मंतर पर अलग ही नजारा बना. अपने हाव-भावों और पहनावे के वैश्विक स्तर के कारण आर्थिक सामाजिक या जेंडर भेद जैसे सारे कुभाव लुप्त नजर आए. गौर करने वाली बात यह है कि कोरपोरेट की दुनिया का पेशेवर समुदाय खुद को कोरपोरेट मजदूर बता रहा था. इनमें निजी कंपनियों में मैनेजरी करने वाले युवक-यवतियां मास्क बांधे जंतर-मंतर पर बिखरे कूड़े कचरे को उठाते दिख रहे थे. इससे नई पीढ़ी के नागरिक बोध का पता चलता है. सबसे बड़ी बात यह कि कहीं कोई छद्म या दिखावा भी नहीं था. इससे यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश की नई पीढ़ी का व्यवहार भविष्य में कैसा रहने वाला है.

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने धरनास्थल की साफ-सफाई का जिम्मा भी अपने हाथ में ले रखा था.
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बेशक जेन-जी का यह प्रदर्शन एक शानदार राजनीतिक हस्तक्षेप था. यह एक समय सिद्ध अनुभव है कि राजनीति में पूर्वानुमान टेढ़ी खीर होते हैं. अगर कोई सही अंदाजा कर भी ले तो कम से कम ये दावा कोई नहीं कर पाता कि वैसा कब होगा. लेकिन 2026 की जेन जी आंदोलन ने जो कुछ पुराना तोड़ा है और जो नया जोड़ा है, उससे ये साफ है कि इस कामयाबी के बाद भारत के जेन जी का हौसला उफान पर होगा. पीढ़ियों के पास कोई औपचारिक संगठन नहीं हुआ करता.वे महज एक समुदाय ही हुआ करते हैं. लेकिन बेरोजगार युवकों को कोकरोच कह दिए जाने की तात्कालिक घटना के बाद एक व्यंगात्मक आंदोलन के रूप में जो एक ऑनलाइन राजनीतिक दल बना, वह एक तात्कालिक संगठन ही था. उसने अपनी दूरगामी दृष्टि और मुहिम का कोई आभास भी नहीं दिया है. देखने लायक बात यह भी है कि इस तात्कालिक संगठन ने जो तात्कालिक लक्ष्य साधा था, उसे जेन जी के बल पर पूरा का पूरा हासिल कर लिया गया है. अब यह किसी नई घटना या दुर्घटना पर ही निर्भर करेगा कि उसे लेकर जंतर-मंतर जैसा कोई उद्यम खड़ा हो पाएगा या नहीं.
(डिस्क्लेमर:लेखक मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय में क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस के असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं. उन्होंने सजायाफ्ता कैदियों पर शोध किया. विश्वविद्यालय से निकलकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी अखबार 'जनसत्ता' के संपादकीय विभाग में 27 साल तक सेवाएं दीं. वो एनडीटीवी समेत कई दूसरी साइटों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते रहते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)