50 लाख की आबादी वाला काठमांडू भारत के ही किसी बड़े शहर की तरह बेतरतीब और विस्तार से बसा हुआ है। इसी कारण दुनिया के हर भू वैज्ञानिक और भूकंप के बाद पुनर्वास से जुड़े विशेषज्ञों ने अपने रिसर्च पेपर में भविष्यवाणी की थी कि ताकतवर भूकंप इस शहर को तबाह कर सकता है।
उस लिहाज़ से देखें तो 7.9 पैमाने का भूकंप तबाही तो लाया है मगर वैसी नहीं तबाही है जिसकी आशंका ज़ाहिर की गई थी। मंगलवार शाम तक 5000 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की ख़बर किसी भी तरह से कम नहीं है बल्कि 10000 तक पहुंचने की आशंका है। अभी तक विस्थापितों की संख्या का ठीक से आंकलन भी नहीं हुआ है लेकिन इसके बाद भी जब आप ऊपर से ली गई तस्वीर में काठमांडू को देखिये तो बहुत सारी इमारतें खड़ी नज़र आ रही हैं, जिन्होंने 7.9 का सदमा बर्दाश्त कर लिया है।
मंगलवार के प्राइम टाइम में वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलोजी, देहरादून के अजय पाल ने कहा भी था कि भूकंप से बर्बादी नहीं होती है। भूकंप के कारण सभी इमारतों के लिए एक ही ऊर्जा निकलती है मगर सारी इमारतें नहीं गिरती हैं। जो कमज़ोर होती हैं वही गिरती हैं। ड्रोन कैमरे से ली गई तस्वीर में आप पहाड़ी पर बने स्वयंभू नाथ मंदिर परिसर में हुए नुकसान को भी देख रहे हैं। इसका मुख्य मंदिर 2500 साल पुराना बताया जाता है। ऐसा नहीं हैं कि ऐतिहासिक इमारतें नहीं गिरी हैं लेकिन इतने ताकतवर भूकंप के बाद भी कई ऐतिहासिक और आधुनिक इमारतें सुरक्षित खड़ी रह गईं हैं। बहरहाल काठमांडू के ज्यादातर हिस्सों में बिजली बहाल हो गई है। गोरखपुर, पोखरा और बीरपुर को काठमांडू से जोड़ने वाली सड़कें चालू हो गईं हैं। काठमांडू में फील्ड अस्पताल बना दिया गया है।
ऐसी दिलचस्पी हुई कि भारत के अलावा दुनिया के अन्य देश किस तरह से नेपाल में मदद कार्य पहुंचा रहे हैं तो इसके लिए मैं चीनी समाचार साइट सी सी टीवी की वेबसाइट पर गया। सीसीटीवी के अनुसार 90 से ज्यादा सैनिकों और मनोचिकित्सकों का दल नेपाल भेजा गया है। इन सभी को चीन के वेंचुआन और लुशान में आए भयंकर भूकंप में राहत कार्य चलाने का अनुभव भी हासिल है। सीसीटीवी की वेबसाइट पर मौजूद वीडियो में न्यूज़ एंकर ने प्रमुखता से भारत के प्रयासों का ज़िक्र किया और बताया कि ग्रामीण इलाकों में भारतीय बचाव दल का पहुंचना शुरू हो चुका है।
वैसे बुधवार सुबह मैंने ऑल इंडिया रेडियो के हिन्दी अंग्रेजी समाचारों की पहली सुर्खी की पहली लाइन में नेपाल में मल्टी नेशन मदद का ज़िक्र सुना। सिंगापुर एयरफोर्स ने 61 लोगों की टीम भेजी है। अमेरिका ने 130 और रूस ने 90 लोगों की टीम भेजी है। यूरोपीय संघ ने तीस लाख यूरो की आपात राशि देने का फैसला किया है।
अमेरिका ने भी एक करोड़ डॉलर मदद राशि देने का ऐलान किया है। हमारे सहयोगी ह्रदयेश जोशी ने रिपोर्ट भेजी है कि किस तरह चीनी बचाव दल और भारतीय एनडीआरएफ मिलकर काम कर रहे हैं। बेवजह भारत चीन प्रतियोगिता के इंतज़ार के बजाय देखिये कि कैसे दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं और एक दूसरे से सीख रहे हैं।
दूसरी तरफ भारत में कई संस्थाएं और राज्य सरकारें फिर से हरकत में आ रही हैं। भारतीय मानक ब्यूरो के निदेशक ने हिमांशु शेखर को बताया है कि 2015 के आखिर तक नेशनल बिल्डिंग कोड तैयार कर लिया जाएगा, जिसमें दस साल से कोई बदलाव ही नहीं हुआ है। इसके तहत सेफ्टी सर्टिफिकेट की प्रक्रिया सख्त की जाएगी, सुपर हाइराइज़ बिल्डिंग के लिए सुरक्षा मानक तय किये जाएंगे। निर्माण से जुड़े इंजीनियर, आर्किटेक्ट और बिल्डर की जवाबदेही तय की जाएगी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक दिसंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि जिस भी इमारत में 100 या 100 से ज्यादा लोग रहते हैं वहां बाहर एक पट्टी पर लिखा होना चाहिए कि यह इमारत भूकंप की किस श्रेणी के झटके को सहने योग्य है। ऐसा आपने कहीं होता देखा है क्या। किसी को पता ही नहीं है कि कौन इसका रेगुलेटर है और आम खरीदार कैसे पता करे। इलाहाबाद से एक महिला ने फोन कर हमें बताया कि जब उन्होंने बिल्डर से पूछा तो बताने से इनकार कर दिया।
हरियाणा के मुख्यमंत्री एम एल खट्टर ने मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि जितने भी बाइ लॉज़ हैं वो अपने आप में पर्याप्त हैं और उन सभी नियमों का पालन हो रहा है। हरियाणा के आपदा प्रबंधन मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने कहा कि फरीदाबाद, गुड़गांव में सिज़्मिक ज़ोन चार के अनुसार सारे नियम बने हैं और बिल्डरों को पालन करना पड़ता है। अगर किसी उल्लंघन का पता चलता है तो हम कार्रवाई करेंगे। 28 अप्रैल के ट्रिब्यून ने लिखा है कि गुड़गांव प्रशासन के पास 1100 ऊंची इमारतों का ज्योगरफिक इंफौरमेंशन सिस्टम तैयार नहीं है जो भूकंप के बाद बचाव के लिए ज़रूरी होता है।
हिमाचल प्रदेश ने सभी ज़िलों में अलर्ट जारी कर भीड़ भाड़ वाले इलाके में मॉक ड्रिल करने को कहा है। लेकिन कई जानकारों का कहना है कि शिमला सहित प्रदेश के कई शहरों में अंधाधुंध निर्माण पर नज़र रखने का वक्त आ गया है। उत्तर प्रदेश सरकार के हाउसिंग के प्रधान सचिव ने कहा है कि भूकंप रोधी नियमों को और सख्त किया जाएगा और इन नियमों का पालन नहीं करने वाले सरकार और प्राइवेट बिल्डरों को निर्माण पूरा होने का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा। इसे फायर सेफ्टी नियमों की तरह लागू किया जाएगा।
इसका मतलब है कि सरकारें भी सक्रिय हो रही हैं। ज़रूरी है कि आप भी अपनी सक्रियता को बनाए रखिये। पार्षद, विधायक सांसद से संपर्क कर दबाव डालिए और यह भी ज़रूरी है कि आप अपने निजी मकानों में भी इन नियमों का पालन करें। सब सरकार भरोसे नहीं हो सकता है।
जयपुर के डॉ. कैलाश सरन ने ट्वीटर पर बताया कि उन्होंने अपना घर बनाते समय भूकंप रोधी क्षमता का पूरा ध्यान रखा। वो इस बात को लेकर सजग थे कि पूरी जिंदगी की कमाई लगा रहे हैं तो थोड़ा और सही। यह भी बताया कि सामान्य खर्चे की तुलना में पंद्रह प्रतिशत खर्च ज्यादा हुआ मगर चैन की नींद सोते हैं। लेकिन दिल्ली से एक महिला ने हमें ईमेल किया है कि दक्षिण दिल्ली में जहां ढाई हज़ार फ्लैट बने हैं वहां बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी तरफ से एक-एक कमरे और जोड़ लिये हैं। महिला ने लिखा है कि नियम तोड़ने वाले इन अमीर घरों में कोई करोड़पति है, कोई अफसर है, कोई इंजीनियर भी है लेकिन सब मिलकर सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं।
इस साल मुंबई में जनवरी में इंडियन साइंस कांग्रेस हुआ था। उसी दौरान आईआईटी के रिटायर भू वैज्ञानिक वी सुब्रमण्यम ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा था कि मुंबई में 23 मंज़िल से ज्यादा ऊंची इमारत नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि मुंबई में कागज़ पर तो आपदा प्रबंधन की योजनाएं तैयार दिखती हैं मगर ज़मीन पर नहीं मिलती हैं। उनका कहना है कि हर ऊंची इमारत की जांच भू विज्ञानी से करानी चाहिए।
सुब्रमण्यम साहब बीस साल से मुंबई के इलाके में झटकों की प्रवृत्ति का अध्ययन कर रहे हैं। उनका कहना है कि मुंबई को जापान के यसाका पगोडा की टेक्निक से सीखना चाहिए। पांच मंज़िला पगोडा भूकंप आने पर सांप की तरह हिलता है। हर मंज़िल एक दूसरे से स्वतंत्र हिलती है और झटका जाने के बाद वापस अपनी जगह पर आ जाती है। झटके समाप्त होते ही वापस अपनी जगह पर आ जाती है। हमें पैगोडा बनाने की ज़रूरत तो नहीं है पर इसके सिद्धांतों को हम अपना सकते हैं।
वैसे उत्तरकाशी की यमुना घाटी में कोटी बनाल गांव के घर भी यसाका पगोडा जैसे ही दिखते हैं। लकड़ी और पत्थर के तालमेल से बने ये पांच मंज़िला घर इतने लचीले हैं कि दो सौ सालों से भूकंप के झटके झेलते हुए खड़े हैं। भारत में भी ऐसे पारंपरिक मकानों की तकनीक तो है मगर अब अवांट बवांट यूरोपीय नाम वाले घरों में रहने की सबको इतनी बेचैनी है कि किसे फुर्सत है कि वो अपने घर को महफूज़ बनाए।
This Article is From Apr 28, 2015
नेपाल का भूकंप सबके लिए सबक
Ravish Kumar
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Updated:अप्रैल 30, 2015 19:02 pm IST
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Published On अप्रैल 28, 2015 21:17 pm IST
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Last Updated On अप्रैल 30, 2015 19:02 pm IST
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