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डियर बाबा जी- बंगाल में नॉनवेज दुर्गापूजा के दौरान भोजन नहीं भोग है

मनोज्ञा लोईवाल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    सितंबर 08, 2026 21:44 pm IST
    • Published On सितंबर 08, 2026 21:05 pm IST
    • Last Updated On सितंबर 08, 2026 21:44 pm IST
डियर बाबा जी- बंगाल में नॉनवेज दुर्गापूजा के दौरान भोजन नहीं भोग है

“मैं शाकाहारी बंगाली हूं”, मैंने जवाब दिया.

महाअष्टमी पर संधि पूजा के दौरान मेरी श्रद्धा और मंत्रोच्चारण देखकर दक्षिण कोलकाता के मुदियाली पूजा पंडाल में पुजारी जी ने मुझसे पूछा, “क्या आप बंगाली हैं?” 

मैंने फिर जवाब दिया, “मैं शाकाहारी बंगाली हूं.”

मेरे उस वाक्य ने कइयों को चौंका दिया. 

हालांकि बंगाल और मछली एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. और दुर्गा पूजा तब तक दुर्गा पूजा नहीं होता जब मटन का एक टुकड़ा और सिल्वर हिल्सा आपके खाने की थाली में न हो.

लेकिन बंगाली पहचान सिर्फ खाने की थाली से तय नहीं होती.

मैं इस सच को जानते हुए बंगाल के इसी हिस्से में बड़ी हुई. 

बंगाल और मछली को लेकर ऐसा मजबूत सांस्कृतिक रिश्ता है कि दोनों को अलग करके देखना कई लोगों को मुश्किल लगता है. और जब बात दुर्गा पूजा की हो, तो यह धारणा और मजबूत हो जाती है. 

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बंगाल में मां दुर्गा बेटी बन कर आती हैं

खास बात ये है कि  बंगाल में, मां दुर्गा वो मेहमान बनकर नहीं आतीं जिन्हें पवित्रता में डुबोना जरूरी हो.

बंगाल में मां दुर्गा बेटी बनकर आती हैं. बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को सिर्फ एक देवी के रूप में नहीं देखा जाता. उन्हें बेटी की तरह भी देखा जाता है, जो अपने मायके यानी पिता के घर कुछ दिनों के लिए आती हैं.

इसीलिए दुर्गा पूजा सिर्फ पूजा नहीं, घर आई बेटी का स्वागत भी है. और जब बेटी घर आती है, तो घर में वही खाना बनता है जो उस घर की अपनी परंपरा है. वही जो वहां बहती नदी से उसे मिला है. तो जब देवी रूपी मां दुर्गा आपके परांगन में आती हैं तब आप उन्हें वहीं खिलाते हैं जो आप खुद घर पर खाते हैं. 

बंगाली घरों में मां शब्द का संबोधन प्यारी बेटी को पुकारने के लिए किया जाता है. 

यही वजह है कि दुर्गापूजा के दौरान बंगाल, मछली और मटन ईश्वर की भक्ति को तोड़ना कदापि नहीं है.

और यही वजह भी है कि बंगाल की अलग-अलग पूजा परंपराओं में भोग और प्रसाद के रूप भी अलग दिखाई देते हैं. कहीं पूरी तरह सात्विक भोग है.

दुनिया को दिखने वाले भौतिक नजरिए में चढ़ाया जाने वाला भोजन जब देवी के सामने रख दिया जाता है तो यह प्रसाद या भोग में तब्दील हो जाता है.

कहीं ये पूरी तरह सात्विक है तो कहीं मछली या बकरे का अर्पण है.

तो जिस बकरे की बलि दी गई थी या जो मछली उस रोज पकड़ी गई, देवी के भोग के रूप में वह साधारण मांस नहीं रही.

इसे उस घर ने अर्पित किया है, और देवी ने भोग के बाद लौटाया है. 

नवमी के मायने बिल्कुल स्पष्ट हैं.

अष्टमी आमतौर पर सात्विक दिन होता है. अंजलि, खिचड़ी, लाबड़ा और पंडाल में लंबी कतारों में मां दुर्गा के दर्शन का इंतजार- इस दिन की ये दिनचर्या हुआ करती हैं.

लेकिन नवमी अलग ही होती है. पारंपरिक तौर पर यही वो दिन है जब मां को अर्पण किया जाता है.

आज भले ही कुर्बानी एक सिंबॉलिक चीज बन गई है, पर कई घरों में इसकी याद आज भी किचन में जिंदा है. उस दिन पकाया गया मटन निरामिश मांगशो होता है- जिसमें न प्याज डाली जाती है और न ही लहसुन पड़ता है.

मानो या न मानो पर मटन बिना प्याज और लहसुन के पकाए जाने पर प्रसाद के लिए निरामिष खाना बन जाता है.

अदरक, दही, गरम मसाला और बहुत सारा संयम. हम इसे मजाक में ‘निरामिश मांगशो' कहते हैं क्योंकि जो मसाले रोज के खाने को सामिश बनाते हैं, उन्हें मां दुर्गा की थाली से बाहर रखा जाता है. 

संधि पूजा, महिषासुर वध और महाभोग

जैसे ही अष्टमी से बढ़ते हुए बंगाल नवमी में प्रवेश करता है, पंचांग के उस 48 मिनट के मुहूर्त को संधि पूजा के रूप में पूजा जाता है.

संधि पूजा का अर्थ शाम की पूजा से नहीं, बल्कि अष्टमी और नवमी के दो दिनों के 24-24 मिनट से है. माना जाता है कि यह बिल्कुल उतना ही वक्त है जब मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था.  

इसी पूजा के बाद मीट पकाया जाता है और उसे मां दुर्गा को अर्पित किया जाता है और फिर इसे महाप्रसाद के रूप में भक्तों के बीच बांटा जाता है.
तो मेरे पूजनीय बाबा जी, मटन दुर्गा पूजा के दौरान निरामिष भोग है!!

काली पूजा में भी यही लॉजिक होती है. अमावश्या की उस रात, निरामिश मांगशो परिवार के लिए भोज नहीं होता. उसे पहले मां काली को चढ़ाया जाता है फिर उसे प्रसाद के रूप में दिया जाता है.

मैंने उन घरों को भी देखा है जहां के किचन में साल भर निरामिश खाना पकता है पर वो भी उस प्रसाद को लेते हैं जो अब ‘निरामिश मांगशो' बन गया है.  

यह परंपराओं से गुजरते हुए अब सर्वस्वीकार्य हो चला है.

हालांकि मैं इसे नहीं खाती, मैंने कभी नहीं खाया है.

फिर भी मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि दुर्गा पूजा मेरे बगैर किसी दूसरे कमरे में सम्पन्न हो रही है.

क्योंकि इस त्योहार का महत्व एक थाली से कहीं अधिक है. 

अधिकांश बंगाली परिवारों के लिए, हां- यह पूजा मछली के बगैर पूरी नहीं मानी जाती.

हिल्सा, रोहू, सरसों में बनी तरी और तले हुए इसके टुकड़े तो परिवार के लोगों के खाने के लिए बैठने से पहले ही गायब हो जाते हैं. 

कइयों के लिए मटन के बगैर नवमी ठीक वैसे ही होता है कि आपने पूरा वाक्य बोल दिया पर अंतिम शब्द नहीं बोले. यानी मटन के बगैर नवमी पूरी नहीं होती. 

यह उनकी विरासत का हिस्सा है, जिस पर कोई बहस नहीं है.

मेरी दुर्गापूजा...

हालांकि मेरी परंपरा अलग है और वो भी बंगाली ही है.

मैं इस त्योहार को अलग भोग में पाती हूं- यह वो भोग है जो पंडाल के बाहर लगी कतार और घर पर थाली दोनों में परोसा जाता है.

घी में भुने मूंग के दाल के स्वाद वाली खिचड़ी- ये एक ऐसी चीज है जिसे आप साल के किसी भी दूसरे समय अपनी रसोई में ठीक वैसा ही नहीं बना सकते.

लाबरा, जिसमें सीताफल, बैंगन और कच्चा केला और फलियां ये भूल जाती हैं कि वो अलग-अलग सब्जियां हैं. 

लुची इतनी हल्की कि ग्रेविटी को ही चुनौती दे रही हो और साथ में नारियल वाली छोलार दाल 

बिना प्याज के आलूर दम. टमाटर खेजुर चटनी, पायस, मिष्टी दोई.

दोपहर का वो लंबा समय जब ढाक की आवाज अब भी गूंज रही है और कोई ऐसी चीज फिर मांग रहा है जिसमें मांस जरा भी नहीं है.

वह खाना किसी तरह का समझौता नहीं है.

यह पूजा का अहम हिस्सा है. कम्युनिटी पंडालों में हजारों लोगों को यह खाना खिलाया जाता है.

विधवाएं इसे खाती हैं. बच्चे इसे खाते हैं.

नवरात्रि में नॉनवेज नहीं खाने वाले बाहर से आए रिश्तेदार भी इसे चुपचाप खाते हैं क्योंकि यही तो इस त्योहार का स्वाद है.

मैं भी उन कतारों में खड़ी हूं, पर एक पत्रकार के तौर पर नहीं बल्कि इस संस्कृति की एक बेटी के रूप में.

मैं हाईवे पर शूटिंग से वापस आने के बाद भी भोग के समय का ध्यान रखती थी.

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लोग कभी-कभी लड़ना चाहते हैं: क्या ये पूजा शाकाहारी है या नहीं?

बंगाल दो विकल्पों की सोच को नकारता है.

एक ही हफ्ते में निरामिश मांगशो और खिचड़ी-लाबरा-पायश.

नदी से आई मछली और एक विधवा के प्लेट में एक सी आस्था दिखती है. क्योंकि एक ही बेटी दोनों के किचन में आई है.

हां... मैं एक शाकाहारी बंगाली हूं. 

नवमी के दिन मां आ गई हैं, यह जानने के लिए मुझे मटन नहीं चाहिए.

मुझे धुना की खुशबू, ढाक के सफेद पंखों, अंजलि के समय भीड़ का मसलना, खिचड़ी भोग की पहली चम्मच का पाना, दसवीं के दिन सिंदूर लगे चेहरों पर नदी की ओर विसर्जित होने के लिए बढ़ चुकी प्रतिमा के बीच मां से बिछड़ने का अजीब सा दर्द चाहिए.

बाकी लोग अपना-अपना प्रसाद रख सकते हैं, मेरे प्रसाद तो थाली की दूसरी तरफ है.

हमेशा से मेरा मानना रहा है कि मां प्रोटीन नहीं गिनती हैं.

वो तो बस ये देखती हैं कि घर का दरवाजा खुला है या नहीं... क्योंकि मां के रूप में हमारी बेटी अपने घर आया करती है... और मुझ जैसे शाकाहारी लोग भी ‘नॉनवेज' के साथ दुर्गापूजा मनाते रहते हैं.

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