दुनिया बदल रही है. एक समय विश्व राजनीति अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शक्ति-संतुलन से तय होती थी. सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका लंबे समय तक दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्ति रहा. लेकिन अब चीन का उभार, भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक क्षमता, रूस और पश्चिम के बीच तनाव, पश्चिम एशिया के संघर्ष और व्यापार और तकनीक की नई प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक व्यवस्था को बदल दिया है. ऐसे समय में 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक अंतरराष्ट्रीय बैठक भर नहीं है. यह इस बात की परीक्षा भी है कि दुनिया की उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी सामूहिक ताकत का इस्तेमाल किस तरह करना चाहती हैं.
ब्रिक्स की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी. बाद में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ. हाल के विस्तार के बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी इसका हिस्सा बन चुके हैं. आज 11 सदस्यीय ब्रिक्स दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और करीब 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है. साल 2026 में ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं. इसलिए नई दिल्ली का सम्मेलन विस्तारित ब्रिक्स के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. लेकिन सवाल है, आखिर ब्रिक्स इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है?
क्यों बढ़ गया है ब्रिक्स का महत्व?
आज आर्थिक शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा पहले की तरह अलग-अलग विषय नहीं हैं. ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, तकनीक, डिजिटल भुगतान, आपूर्ति शृंखला और वित्तीय व्यवस्था भी किसी देश की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं. इसीलिए विकासशील देश नए बाजार, नए निवेश स्रोत और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखलाएं चाहते हैं. वे यह भी चाहते हैं कि विश्व बैंक, IMF और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में उनकी आवाज उनकी वास्तविक आर्थिक और जनसंख्या शक्ति के अनुरूप हो. ब्रिक्स उन्हें इसके लिए एक मंच देता है. लेकिन ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गठबंधन मानना सही नहीं होगा. इसके सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित अलग-अलग हैं. वे अमेरिका और यूरोप के साथ भी अलग-अलग स्तर पर संबंध रखते हैं और हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एकमत नहीं हैं.ब्रिक्स की वास्तविक ताकत यही है कि अलग-अलग देश अपने साझा हितों पर सहयोग कर सकते हैं, बिना किसी एक शक्ति के अधीन हुए. यह भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है.

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Photo Credit: PTI
भारत के लिए ब्रिक्स कितना महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व मुख्यतः तीन क्षेत्रों में है—रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक अवसर और वैश्विक प्रभाव.
भारत अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति या गुट से बांधना नहीं चाहता. अमेरिका के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, रूस के साथ भी, यूरोप और जापान के साथ भी और चीन के साथ भी वहां सहयोग जरूरी है, जहां दोनों के हित मिलते हैं. ब्रिक्स भारत के रणनीतिक विकल्पों को बढ़ाता है. आर्थिक दृष्टि से भी इसका महत्व तेजी से बढ़ा है. साल 2024 में ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार करीब 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो 2003 के मुकाबले लगभग 13 गुना है. भारत ने 2025-26 में ब्रिक्स देशों को करीब 82 अरब डॉलर का माल निर्यात किया. भारत की अध्यक्षता में छोटे और मध्यम उद्योगों, व्यापार वित्त, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और डिजिटल सेवाओं पर विशेष जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य केवल बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि छोटे कारोबारियों को भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना है. यानी ब्रिक्स भारत के लिए तभी उपयोगी होगा जब इसका लाभ दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों से निकलकर भारतीय उद्योग, निर्यातक और रोजगार तक पहुंचे.
ब्रिक्स के लिए भारत इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
ब्रिक्स के लिए भारत का महत्व भी कम नहीं है. भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है. उसके पास विशाल बाजार, मजबूत सेवा क्षेत्र, तकनीकी क्षमता, दवा उद्योग और तेजी से बढ़ता डिजिटल बुनियादी ढांचा है. लेकिन भारत की सबसे बड़ी विशेषता शायद उसके व्यापक अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं. भारत पश्चिम के साथ भी काम करता है, रूस के साथ भी, खाड़ी देशों के साथ भी और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी. इसलिए वह ब्रिक्स को किसी एक देश के प्रभाव वाले मंच के बजाय अधिक व्यापक और व्यावहारिक मंच बनाए रखने में भूमिका निभा सकता है. यही कारण है कि भारत को ब्रिक्स की जरूरत है और ब्रिक्स को भी भारत की जरूरत है.
ब्रिक्स में चीन कहां खड़ा है?
यहीं सबसे कठिन प्रश्न सामने आता है. चीन ब्रिक्स की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिस्पर्धी भी है. सीमा विवाद, व्यापार घाटा, तकनीकी निर्भरता और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेद हैं. फिर भी हाल के महीनों में संबंधों में सावधानीपूर्ण स्थिरता दिखाई दी है. 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक हुई. दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति बनाए रखने, सीमा प्रबंधन मजबूत करने, नए संवाद और हॉटलाइन तंत्र बनाने, तीन सीमा व्यापार केंद्रों को फिर खोलने तथा 2027 में अगली बैठक भारत में करने सहित कई बिंदुओं पर सहमति बनाई. लेकिन इसे सीमा विवाद का समाधान कहना जल्दबाजी होगी. भारत और चीन ने अपने मतभेद समाप्त नहीं किए हैं; उन्होंने उन्हें संभालने के लिए संवाद और व्यवस्थाओं को मजबूत किया है.

आर्थिक संबंधों में भी यही विरोधाभास है. 2024-25 में चीन के साथ भारत का वस्तु व्यापार घाटा 99.2 अरब डॉलर पहुंच गया. चीन से भारत ने 113.5 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात केवल 14.3 अरब डॉलर रहा. समस्या का समाधान केवल चीन से आयात रोकना नहीं है. चीन से आने वाली मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे और औद्योगिक सामान भारत के अपने उत्पादन में भी इस्तेमाल होते हैं. इसलिए भारत की वास्तविक चुनौती है, चीन पर निर्भरता कम करना, लेकिन अपनी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को कमजोर किए बिना. ब्रिक्स इस समस्या को खत्म नहीं कर सकता, लेकिन दोनों देशों को उन क्षेत्रों में सहयोग का मंच दे सकता है, जहां उनके हित मिलते हैं.
18वें ब्रिक्स सम्मेलन में क्या खास है?
नई दिल्ली सम्मेलन भारत की चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता है. भारत ने इस साल 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए हैं. भारत की अध्यक्षता का विषय है: 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण.' भारत के लिए यह अपनी कूटनीतिक क्षमता और नेतृत्व दिखाने का अवसर है. ग्लोबल साउथ के लिए यह देखने का अवसर है कि ब्रिक्स केवल वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करता है या व्यापार, वित्त, स्वास्थ्य, ऊर्जा और तकनीक में वास्तविक विकल्प भी बनाता है. ब्रिक्स देशों के लिए निवेश और व्यापार को नई दिशा देना महत्वपूर्ण होगा.
इसी संदर्भ में नई दिल्ली में आधिकारिक सम्मेलन के समानांतर आयोजित होने वाला iBRICS Investment Summit भी ध्यान देने योग्य है. यह आधिकारिक ब्रिक्स संस्था नहीं, बल्कि एक निजी निवेश मंच है. इसमें 500 से अधिक संस्थागत निवेशकों, पेंशन फंड, फैमिली ऑफिस और अन्य वित्तीय संस्थाओं के भाग लेने की उम्मीद है. आयोजकों के अनुसार इनके पास लगभग एक ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति या पूंजी है. यहां सीमा पार निवेश, डॉलर के अलावा भुगतान व्यवस्था और UPI-Pix जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों के संभावित संपर्क पर चर्चा हो सकती है. इसका महत्व इसलिए है क्योंकि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूंजी और भुगतान की गति भी शक्ति का हिस्सा होगी.
आम भारतीय को इससे क्या मिलेगा?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है. ब्रिक्स सम्मेलन के अगले दिन पेट्रोल सस्ता नहीं होगा और महंगाई अचानक खत्म नहीं होगी. चीन के साथ व्यापार घाटा भी किसी घोषणा से समाप्त नहीं होगा. लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव हमेशा अगले दिन दिखाई नहीं देता. अगर ब्रिक्स में व्यापार वित्त की बेहतर व्यवस्था बनती है तो छोटे भारतीय निर्यातकों को फायदा हो सकता है. नए बाजार खुलते हैं तो भारतीय कंपनियों के अवसर बढ़ सकते हैं. डिजिटल भुगतान प्रणालियों में सहयोग बढ़ता है तो विदेश जाने वाले भारतीयों और कारोबारियों के लिए भुगतान आसान हो सकता है. ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और आपूर्ति श्रृंखलाओं में सहयोग भारत की आर्थिक सुरक्षा मजबूत कर सकता है. और सबसे महत्वपूर्ण; यदि भारत और चीन के बीच स्थिरता बनी रहती है तो इसका लाभ हर भारतीय को मिलेगा. दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के बीच शांति का लाभ किसी आंकड़े में नहीं दिखता, लेकिन उसका महत्व बहुत बड़ा होता है. फिर भी हमें ब्रिक्स से ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह भारत की घरेलू आर्थिक समस्याओं का समाधान कर देगा. भारत को अपने विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, कौशल, तकनीक और संस्थाओं को स्वयं मजबूत करना होगा. ब्रिक्स केवल अवसरों का दरवाजा खोल सकता है.
भारत को ब्रिक्स से क्या हासिल करना चाहिए?
भारत को ब्रिक्स को अमेरिका या पश्चिम के विकल्प के रूप में नहीं देखना चाहिए और न ही चीन का मुकाबला करने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए. भारत का लक्ष्य इससे कहीं बड़ा होना चाहिए. जहां चीन के साथ हित मिलते हैं, वहां सहयोग हो, जहां प्रतिस्पर्धा जरूरी है वहां प्रतिस्पर्धा हो और जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो वहां भारत के हित सर्वोच्च हों.इसके साथ ही अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान, खाड़ी देशों और दुनिया के अन्य हिस्सों के साथ भी भारत अपने हितों के अनुसार संबंध आगे बढ़ाता रहे. यही रणनीतिक स्वायत्तता है. 18वां ब्रिक्स सम्मेलन इसलिए केवल एक शिखर बैठक नहीं है. यह इस बात की परीक्षा है कि भारत अपनी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भूमिका को कितनी प्रभावी ढंग से वास्तविक परिणामों में बदल सकता है. ब्रिक्स की सफलता का अंतिम पैमाना यही होना चाहिए कि क्या इससे भारतीय निर्यातक के लिए बाजार आसान हुआ, भारतीय उद्योग के लिए पूंजी और तकनीक के अवसर बढ़े, ऊर्जा और आपूर्ति सुरक्षा मजबूत हुई और क्या विकासशील देशों की आवाज विश्व व्यवस्था में पहले से अधिक प्रभावशाली बनी. भारत को ब्रिक्स में किसी नए खेमे का हिस्सा नहीं बनना है. उसे ऐसा भारत बनना है जो हर शक्ति केंद्र से अपने हित में बात कर सके, लेकिन किसी एक शक्ति पर निर्भर न हो. नई दिल्ली सम्मेलन की असली सफलता इसी में होगी कि भारत विश्व व्यवस्था को केवल देखे नहीं, बल्कि उसे आकार देने की अपनी क्षमता भी दिखाए.
डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)