मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी के लिए मशहूर लेखक पीयूष पांडे की नई किताब 'उसने बुलाया था' पेंगुइन स्वदेश प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. किताब का कवर पेज पाठकों को थ्रिल करता है. दावा भी यही है कि यह एक ऐसा थ्रिलर है, जिसे शुरू करने के बाद आप रुक नहीं पाएंगे. अनसुलझी प्रेम कहानी और एक हत्या की गुत्थी सुलझाते हुए लेखक किताब की शुरुआत में ही एक हत्या से पाठकों के भीतर उत्सुकता और थ्रिल पैदा कर देते हैं.
कहानी की शुरुआत और एक चूक
जब पाठक कहानी और पात्रों से परिचय बना ही रहे होते हैं, उसी दौरान पेंगुइन स्वदेश जैसे बड़े प्रकाशक की एक बड़ी गलती खटकती है.पृष्ठ संख्या 11 में इंस्पेक्टर आदित्य के नाम की जगह मृतक राघव का नाम लिखा गया है. यह चूक इसलिए ज्यादा अखरती है क्योंकि यह किताब की शुरुआती संरचना में आती है और पाठक का ध्यान भंग करती है. इसके बावजूद लेखक दृश्यात्मक लेखन के जरिए कहानी को आगे बढ़ाते रहते हैं. लेकिन थानों की शामें कई बार अलग होती हैं. 'दिन ढलते-ढलते...' जैसे वाक्य कहानी का दृश्य पाठकों के सामने रख देते हैं.
फिल्मी शिल्प और फ्लैशबैक की तकनीक
पीयूष पांडे ने किताब को बिल्कुल किसी हिंदी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की तरह लिखा है.'छह महीने पहले' जैसे संकेतों के साथ कहानी फ्लैशबैक में जाती है.पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे पाठक किसी फिल्म के दृश्य देख रहा हो. उदाहरण देने में लेखक जगह-जगह दक्ष नजर आते हैं. आईएसओ मार्का निशान की तुलना प्रोफेसर पाठक की विश्वसनीयता से करना कहानी को और रोचक बनाता है.
कहानी के साथ-साथ लेखक देश के मौजूदा हालात पर भी टिप्पणी करते चलता है.इससे किताब समसामयिक लगती है.'इस देश में अभी भी लाखों लोगों के लिए चपरासी की नौकरी हासिल करना किसी उपलब्धि से कम नहीं है' जैसी पंक्तियां सामाजिक यथार्थ को सामने लाती हैं. खासी जनजाति के बारे में दी गई जानकारी किताब को और खास बनाती है. लीशा के पात्र को नॉर्थ ईस्ट से जोड़कर लेखक एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ सामने लाते हैं और उसका बयान 'कैसा लगेगा...' पढ़ने योग्य बन पड़ता है.
पत्रकारिता, कोर्टरूम और डिजिटल दुनिया
लेखक का पत्रकार होना कहानी में साफ दिखाई देता है.'एंकर बनने के लिए सिर्फ अच्छा दिखना काफी नहीं है. भाषा की शुद्धता, विषय पर पकड़, कैमरे के सामने सहजता और घंटों काम करने की योग्यता चाहिए' जैसी पंक्तियां इस अनुभव का उदाहरण हैं. जिस तरह एक आम कार्यकर्ता के लिए टिकट का निर्णय करने वाले आलाकमान तक पहुंचना आसान नहीं होता, उसी तरह एक सामान्य इंस्पेक्टर के लिए कमिश्नर तक पहुंचना आसान नहीं होता.इस तरह की पंक्तियों के जरिए लेखक सिस्टम पर व्यंग्य करते हैं.
कोर्ट रूम और ऑनलाइन दुनिया के दृश्य, जैसे 'पेन को अपने घुंघराले बालों में फंसा लिया' या 'आदित्य ने फेसबुक के सर्च बॉक्स में विराट का प्रोफाइल सर्च…', कहानी को आज के समय से जोड़ते हैं. हैशटैग का प्रयोग इसे युवाओं की पहुंच तक लाता है और 'रेपिस्ट तो वो सांप हैं, जो समाज को डसते ही चले जाते हैं' जैसे संवाद इस थ्रिलर को फिल्म या वेब सीरीज के अनुकूल बनाते हैं.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उससे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)