उत्तराखंड हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा का परिणाम आने के बाद चम्पावत जिले में लोहाघाट के एक गांव से चिंताजनक खबर सामने आई है. वहां एक छात्र ने फंदे में लटककर आत्महत्या करने का प्रयास किया. बताया जा रहा है कि छात्र ने हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में 73 फीसदी अंक प्राप्त किए थे. अच्छे अंक होने के बावजूद यह कदम उठाया जाना परीक्षा परिणाम और उससे जुड़े दबाव पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
अंकों की दौड़ में खत्म होती सृजनशीलता
छात्रों की आत्महत्याओं पर शिक्षक महेश पुनेठा बताते हैं कि जब तक हम परीक्षा में प्राप्त अंकों का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना और उसका जश्न मनाना बंद नहीं करेंगे, तब तक हम अंकों के लिए लगने वाली अंधी दौड़ और उससे पैदा होने वाला दबाव खत्म नहीं कर पाएंगे. यही दबाव बच्चों को गहरे अवसाद की ओर ले जाता है और आत्महत्याओं जैसी घटनाओं को जन्म देता है. वे कहते हैं कि अंकों के लिए लगने वाली यह अंधी दौड़ बच्चों की सारी सृजनशीलता को सोख लेती है और उनके स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध कर देती है. यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे अधिक दूध प्राप्त करने के लिए दुधारू पशुओं को इंजेक्शन लगाए जाते हैं. पुनेठा के मुताबिक दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के अंकों को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है, यहां तक कि सहपाठियों को भी इसकी जानकारी नहीं होती और इसे बच्चे की निजता के अधिकार से जोड़कर देखा जाता है.
सफलता के तय मानक और उम्मीदों का बढ़ता दबाव
रोहित गुप्ता हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर हैं. छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव पर उनका कहना है कि इसके पीछे समाज द्वारा तय किए गए सफलता और बौद्धिकता के मानक प्रमुख कारण हैं. हमने सफलता को सीमित कर दिया है. अच्छे अंक, बेहतर कॉलेज और ऊंची नौकरी तक ही इसे परिभाषित कर दिया गया है. उनके मुताबिक जब बच्चों को बचपन से ही इन तय मानकों में फिट होने के लिए तैयार किया जाता है, तो असफलता उनके लिए केवल एक घटना ना रहकर आत्मसम्मान से जुड़ा संकट बन जाती है. यही दबाव धीरे-धीरे मानसिक तनाव, अवसाद और गंभीर स्थितियों में खतरनाक कदमों की ओर ले जाता है.
बाल मनोविज्ञान में पीएचडी वसुधा मिश्रा अमेरिका में रहती हैं. उनके मुताबिक बच्चे अपने लक्ष्यों में असफल रहने की वजह से आत्महत्या कम करते हैं, बल्कि वे समाज की उम्मीदों पर खरा न उतर पाने के दबाव में ऐसे कठोर कदम उठाने को मजबूर होते हैं. यह समाज बच्चों से उनकी क्षमता से कहीं ज्यादा अपेक्षाएं रखने लगा है.
दिखावे का समाज और अंकों की संस्कृति
इस विषय पर ‘मेरी स्कूल डायरी' किताब की लेखिका रेखा चमोली लिखती हैं कि हमारे जैसे समाज में यह व्यवस्था अभी संभव नहीं लगती, जहां लोग अपने कपड़ों, गहनों, गाड़ी, घर, बगीचे और यहां तक कि खाने-पीने तक को दूसरों को दिखाना अपनी शान समझते हैं. ऐसे माहौल में अंकों को गोपनीय रखने की बात व्यवहार में लागू करना कठिन दिखाई देता है. उन्होंने लिखा है कि शिक्षा लगातार अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है. एक अच्छा और संवेदनशील मनुष्य बनाने की प्रक्रिया के बजाय यह केवल अंकों की प्राप्ति तक सिमटती जा रही है. यही वजह है कि पढ़ाई का अर्थ सीखना नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना रह गया है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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