नीट पेपर लीक और उससे जुड़े आंदोलन ने न सिर्फ एक परीक्षा-व्यवस्था की खामी को सामने लाया है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की एक बहुत बड़ी कमजोरी को भी उजागर किया है. वह है जवाबदेही से बचने की संस्कृति. जब किसी परीक्षा में अनियमितता होती है, जब छात्रों के बरसों की मेहनत पर पानी फिरता है, जब लाखों छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है. ऐसे समय सबसे पहले यह सवाल उठता है कि इसकी नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा. क्या शिक्षा मंत्री अपने विभाग में हुए गंभीर अनियमितता की नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे, अगर वो नहीं लेंगे तो फिर कौन लेगा?
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है. यह जन विश्वास और उत्तरदायित्व की व्यवस्था है. जब किसी बड़े घोटाले, लापरवाही या संस्थागत विफलता के बाद मंत्री पद पर बने रहना सामान्य बात बन जाए, तो जनता के भीतर यह संदेश जाता है कि सत्ता अपने अहंकार में चूर है. यही वह क्षरण है जो लोकतंत्र को धीरे-धीरे खोखला करता है. मंत्री का पद कोई निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का परिणाम है. और जब वही विश्वास टूट जाए, तो पद पर बने रहना नैतिक रूप से अनुचित प्रतीत होता है.
क्या सरकार ने छात्रों के आंदोलन को नजरंदाज किया
एक महीने से यह आंदोलन चल रहा था. सवाल यह है कि सरकार ने समय रहते संवाद क्यों नहीं किया? जब असंतोष की पहली लहर उठी थी, तभी यदि गंभीरता से बातचीत की जाती, यदि छात्रों, अभिभावकों और आंदोलनकारियों की बातें सुनी जातीं, तो शायद मामला इतना उग्र न होता. सरकार असहमति में उठने वाली हर आवाज़ को पहले दबाना चाहती है. हर आंदोलन को शुरुआत में नजरंदाज करती है. सरकार को लगता है कि आम जनता बिना किसी संसाधन के कितना लंबा आंदोलन कर पाएगी. एक दिन अपने आप लोग थक-हारकर चले जाएंगे. सरकारें अक्सर तब जागती हैं जब सड़कें भर जाती हैं, जब नाराज़गी शोर में बदल जाती है और जब संकट नियंत्रण से बाहर दिखाई देने लगता है. यह शासन की कमजोरी है, ताकत नहीं. समय पर संवाद करना ही समझदारी है; टकराव के बाद बातचीत के लिए बुलाना अक्सर आग लगने के बाद पानी ढूंढने जैसा होता है.
पेपर लीक की समस्या आज किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रही. पिछले एक दशक में देश में 150 से अधिक परीक्षाओं में लीक की घटनाओं का सामने आना इस बात का संकेत है कि व्यवस्था में गंभीर फॉल्ट है. यह पूरी भर्ती-परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है. इसीलिए आज यह आंदोलन केवल किसी एक संगठन के नेतृत्व का परिणाम नहीं है. यह उन लाखों युवाओं के भीतर सालों से जमा असंतोष का विस्फोट है, जो बार-बार व्यवस्था की असफलताओं का गवाह बनते आए हैं. पेपर लीक, परीक्षा रद्द, तारीखों का टलना, न्यायिक प्रक्रियाओं का बरसों लंबित रहना, इन सबका सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, परिवारों की आर्थिक स्थिति और सामाजिक आत्मसम्मान पर पड़ता है. बहुत से विद्यार्थी छोटे कमरों में, सीमित संसाधनों में, घरों से दूर रहकर अपना भविष्य गढ़ते हैं. उनके लिए केवल परीक्षा ही अपने जीवन को संवारने का एकमात्र रास्ता है. जब उन्हीं रास्तों पर भ्रष्टाचार और लापरवाही के बैरिकेड्स लगे हों तो उनका गुस्सा जायज है. ऐसे स्थिति में भी छात्रों को राष्ट्र-विरोधी कहना न केवल अलोकतांत्रिक है, बल्कि यह व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है.

प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने को लेकर देशभर के लोगों में गुस्सा है.
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जनता में असंतोष से कैसे निपटा जाता है
आंदोलन को केवल किसी राजनीतिक समूह से जोड़कर देखना खतरे को देखकर आंखें बंद करने जैसा है. किसी आंदोलन को दिशा देने वाले संगठन भले मौजूद हों, लेकिन उसकी जड़ें अक्सर समाज के भीतर पहले से मौजूद पीड़ा और असंतोष में होती हैं. इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि सब कुछ केवल एक संगठन की साजिश है. यह जन-असंतोष की जमीन पर खड़ा हुआ विरोध-प्रदर्शन है. आज जब सरकार के अपने कोर समर्थकों के भीतर भी असहमति उभरने लगी है, तो उसे केवल राजनीतिक शोर मानकर टालना और भी बड़ी भूल होगी.
दिल्ली पुलिस का भीड़ को संभालने का तरीका भी गंभीर सवाल खड़े करता है. यदि प्रशासन को पहले से अंदाजा नहीं था कि इतने बड़े पैमाने पर लोग जमा हो सकते हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, इंटेलिजेंस की भी विफलता है. भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी है, लेकिन बल प्रयोग आखिरी विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं. लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग जब संवाद से पहले हो, तो वह समाधान नहीं, तनाव को और बढ़ाने वाला कदम बन जाता है. राज्य की शक्ति का अर्थ यह नहीं कि वह मनमाने ढंग से उसका इस्तेमाल करे.
जब सत्ता संवाद का मार्ग छोड़कर दमन का विकल्प चुनती है, जब असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय चुनौती के रूप में देखा जाने लगता है, तब समाज में व्याप्त असंतोष स्वाभाविक रूप से आंदोलनों का रूप ग्रहण करता है. इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि विचारों को बलपूर्वक दबाया जा सकता है, किंतु उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता. असहमति का दमन क्षणिक शांति का भ्रम अवश्य उत्पन्न कर सकता है, परंतु वह अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं में अविश्वास और सामाजिक विभाजन को ही गहरा करता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के बाबासाहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के राजनीति विज्ञान विभाग में रिसर्च स्कॉलर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)