विज्ञापन

बकरीद के दिन बशीर बद्र ने खुद को खुदा के नाम कुरबान कर दिया

प्रियदर्शन
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मई 28, 2026 16:52 pm IST
    • Published On मई 28, 2026 16:44 pm IST
    • Last Updated On मई 28, 2026 16:52 pm IST
बकरीद के दिन बशीर बद्र ने खुद को खुदा के नाम कुरबान कर दिया

अपने आने या जाने का दिन हम नहीं चुन सकते. लेकिन बरसों से अपनी स्मृति के बियाबान में खोए 90 पार के शायर बशीर बद्र को अगर जाने का दिन चुनने का मौका मिलता तो शायद वे यही दिन चुनते. बकरीद के मुबारक दिन, जब लोग अपनी सबसे प्यारी चीज ख़ुदा के नाम कुरबान करते हैं, बशीर बद्र ने ख़ुद को ख़ुदा के हवाले कर दिया. इत्तिफ़ाक़ से ये वे दिन हैं- बल्कि ऐसे दिन कई बरसों से चले आ रहे हैं- जब कई बदगुमान ताक़तें आपसी मोहब्बत के इस वक़्त पर एक दाग़ लगाने पर तुली हैं और ये भी किसी संवेदनशील शायर के रुख़सत का दिन चुनने की वजह हो सकती है.

हालांकि, बशीर बद्र ने ऐसे दिन देखे थे. उन्होंने लिखा था- ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में / तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.‘ कहते हैं, 1987 के दंगों में मेरठ में अपना घर जला दिए जाने के बाद उन्होंने ये शेर लिखा था. हालांकि, मेरठ अपनी इस हरकत पर शर्मिंदा होता रहा. मेरठ के शास्त्रीनगर की जिस विकास कॉलोनी में उनका घर था, वहां के बाशिंदे दावा करते हैं कि उन्होंने दंगाइयों से लोहा लिया और उन्हें भगा दिया था. लेकिन साल भर बाद बशीर बद्र मेरठ छोड़ कर भोपाल चले गए. मेरठ बदनसीब निकला, वह शहर बड़ा बदनसीब होता है जिसे उसके शायर और कलाकार छोड़ कर चले जाएं.

बशीर बद्र का उर्दू शायरी में बड़ा नाम था. लिखा तो मीर ने था कि ‘शेर मेरे हैं गो ख़वास-पसंद / पर मुझे गुफ़्तगू अवाम से है', लेकिन मीर के अलावा जिन शायरों को अवाम से गुफ़्तगू का यह फ़न आ सका, उनमें बशीर बद्र भी मीर ही ठहरते हैं.  वैसे उर्दू शायरी में मशहूर शायरों की बड़ी रिवायत है. ग़ालिब, इक़बाल या फ़िराक़ जैसे जो शायर आसानी से समझ में नहीं आते, वे भी कुछ ऐसा तिलिस्म कर जाते हैं कि लोग उनके शेर पर वाह-वाह करते, उन्हें गुनगुनाते और मौक़े-बेमौक़े दुहराते पाए जाते हैं. जौक, जिगर, दाग़, फ़ैज़, मजाज़, जोश आदि तो जाने ही इसलिए जाते हैं कि उनके यहां लोगों के बीच मशहूर हो जाने वाले अशआर बहुत ज़्यादा हैं.

बशीर बद्र का हुनर कुछ अलग तरह का

दरअसल, बशीर बद्र का हुनर कुछ अलग तरह का है. ज़ुबान तो उन्होंने बिल्कुल रवायती अख़्तियार की, हुस्नो-इश्क, विसालो-फ़िराक के मुहावरे वही चुने जो पहले से शायरी में चले आ रहे थे. लेकिन उन्हें उन्होंने नए मानी दिए. दूसरा काम यह किया कि इनमें बहुत सारे नए बिंब और प्रतीक भी जोड़े. उन्होंने बहुत मुलायम, बहुत नरम भाषा में शायरी मुमकिन की. उन्हें मालूम था कि पत्थरों को दिल में बदलने में सदियां लग जाती हैं- ‘और जाम टूटेंगे इस शराबख़ाने में /  मौसमों के आने में मौसमों के जाने में / हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं / उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में.‘

उनकी शायरी में हल्की सी मुस्कुराहट वाला तंज...

बशीर बद्र ने एक काम और किया. बड़ी आसान ज़ुबान में लगभग उलटबांसी लगती वे चीज़ें संभव कीं जो अमूमन लोगों की सोच के दायरे से बाहर रह जाती थीं. उनकी शायरी में हल्की सी मुस्कुराहट वाला तंज़ होता, मायूसी होती तो भी कुछ बांकपन से निकलती, दर्द होता तो अपने रंग के साथ बाहर आता- ‘मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला / अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला / घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे / बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला.‘

उनकी शायरी पर हल्की सी नज़र दौड़ाते ही अचरज होता है कि उनके पास लोकप्रिय शेर कितने ज़्यादा थे- ऐसे शेर जो लोगों की ज़ुबान पर चढ़े रहते थे और ऐसे मौक़ों पर याद आते थे कि दूसरे हैरान रह जाएं. शायद बात-बात में एक बहुत इंसानी क़िस्म की नसीहत याद दिला डालने का यह फ़न था जो उन्हें बड़ा बनाता था. ऐसा ही उनका एक शेर है- ‘दुश्मनी जम कर करो, लेकिन यह गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं, तो शर्मिंदा न हों.' कहते हैं, 1972 में जब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो शिमला समझौते के लिए भारत आए तब भी उनके और इंदिरा गांधी के बीच इस शेर का ज़िक्र आया था.

पक्ष और विपक्ष के बीच लोकप्रिय बशीर बद्र के शेर

2018 में तो संसद में पक्ष और विपक्ष दोनों ने बशीर बद्र के शेर से ही एक-दूसरे को जवाब दिया था. मल्लिकार्जुन खरगे ने यही ‘दोस्ती जम के करो' वाला शेर सुनाते हुए सत्ता पक्ष को नसीहत दी तो प्रधानमंत्री मोदी भी बशीर बद्र का ही शेर जवाब में उठा लाए- ‘जी बहुत चाहता है कि सच बोलें / क्या करें हौसला नहीं होता.‘ लेकिन बशीर बद्र के शेर इसलिए बड़े नहीं थे कि वे हुक्मरानों की कूटनीतिक ज़ुबान को रास आते थे, वे इसलिए बड़े थे कि वे आम लोगों के ज़ेहन को झकझोरते थे, उनके दिलों में उतरते थे, इतनी सहजता के साथ कि सुनने-पढ़ने वाला मुरीद हो जाता था- ‘यूं ही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो / वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो / कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से / ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो.‘

ये सच है कि बशीर बद्र ने उर्दू की अपनी नज़ाकत को अपने अलग से जादू में लपेट कर बिल्कुल पंखुड़ियों जैसा बना डाला. इसके लिए वे बिल्कुल नई निगाह और ज़रूरत पड़ने पर नई शब्दावली भी ले आते थे. उनकी ग़ज़ल के ये शेर यहां देखने लायक हैं- ‘कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ / वो ग़ज़ल का लहजा नया नया न कहा हुआ न सुना हुआ / जिसे ले गई है अभी हवा वो वरक़ था दिल की किताब का / कहीं आंसुओं से मिटा हुआ कहीं आंसुओं से लिखा हुआ.‘

आंसुओं से लिखी जाने वाली और आंसुओं से ही मिट जाने वाली ज़िंदगी नाम की इस दास्तान में बशीर बद्र जैसे नए पन्ने जोड़ देते थे. उनके यहां कामनाएं भी इतने कमाल के ढंग से प्रगट होती थीं कि हैरत में डाल दें. ग़ालिब में जो ज़ुबान का बांकपन है, जो मानी के खेल हैं, वह कभी-कभी बशीर बद्र में भी चले आते हैं- ‘कभी यूं भी आ मेरी आंख में, कि मेरी नजर को ख़बर न हो / मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो / वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे / तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो.‘

जिस दौर में लिखते रहे वह कई लोकप्रिय शायरों का दौर रहा

यह सच है कि बशीर बद्र जिस दौर में लिखते रहे वह कई लोकप्रिय शायरों का दौर रहा. निदा फ़ाज़ली इनके लगभग हमउम्र रहे, वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी और मुनव्वर राना इनसे कुछ छोटे, मगर समकालीन रहे, अहमद फ़राज़ इनसे पांच बरस बड़े रहे, लेकिन इन सबने बड़ी शोहरत हासिल की. सबने अपना एक लहजा बनाया, अपनी शायरी की अलग पहचान विकसित की. बेशक, उर्दू शायरी की जो विराट परंपरा है, उसमे ग़ालिब, मीर, इक़बाल, फ़िराक़, फ़ैज़ आदि का कोई जवाब नहीं, लेकिन अब भी, जब दुनिया लिखने-पढ़ने से दूर हुई जा रही है, जब उर्दू-हिंदी अपने वजूद में लगभग बेनूर हुई जा रही है, तब जिन लोगों ने उर्दू को उसके जगमग करते जादू के साथ बचाए रखा, उनमें बशीर बद्र भी रहे. सादा और मुलायम ज़ुबान, उदासी और अकेलापन, मोहब्बत और शिकायत, ज़माने की बेरुख़ी और उसकी बदलती नज़र और इन सबके बीच और बावजूद अपनी ख़ुदी को बनाए रखने वाला इक़बाल- यह सब बशीर बद्र की शायरी में मिलते हैं. उनका यह शेर भी बेहद मशहूर है जो अचानक मौजूं हो उठा है- ‘उजाले अपनी यादों के हमारे पास रहने दे / न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए.‘

हालांकि, बशीर साहब के लिए यह शाम न जाने कितने बरसों से ढल ही रही थी, उनकी याद जा चुकी थी, जो मुशायरे वे लूटा करते थे, वे बीत चुके थे, उनकी शायरी लोगों के बीच थी, बस उनकी ज़ुबान पर नहीं थी, उनको देखने वाले मायूस हुआ करते थे कि ज़िंदगी ने उनके महबूब शायर के साथ क्या किया. लेकिन आख़िरकार ये बाज़ी ख़त्म हुई. शायर चला गया, और हमारे पास उसकी शायरी बची हुई है- एक रोशनी की तरह, जिसमें हम अपनी भी शक्ल देख सकते हैं और अपना रास्ता भी पहचान सकते हैं.

ये भी पढ़ें : दंगों में जल गई थीं Bashir Badr की नई गजलें, विशाल भारद्वाज की यादों ने किया कमाल

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com