- पद्मश्री से सम्मानित उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद भोपाल में निधन हो गया, उनकी शायरी अमर रहेगी.
- बशीर बद्र ने 91 वर्ष की आयु में डिमेंशिया बीमारी के कारण सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी.
- उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को फैजाबाद में हुआ और उन्होंने मात्र सात वर्ष की उम्र में शायरी लिखना शुरू किया.
पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया. 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए' जैसे कालजयी शेर लिखने वाले बशीर बद्र अपनी शायरी के जरिए लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे. उनके जाने से साहित्य जगत को गहरी क्षति हुई है, लेकिन उनकी रचनात्मक विरासत की गूंज लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी. उनके निधन पर कवि और लेखक प्रसून जोशी ने भी भावुक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की.
प्रसून जोशी ने बशीर बद्र साहब को ऐसे कहा ‘अलविदा'
— NDTV India (@ndtvindia) May 28, 2026
उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया है. वो लंबे वक्त से बीमार थे. उनके निधन के बाद पूरे साहित्य जगत में शोक की लहर है.#BashirBadr @prasoonjoshi_ pic.twitter.com/O2SE6t4eYL
अधूरी है तेरी रचना ज़रा तू पूरा करने दे
यहाँ एक चोट रखने दे वहाँ एक घाव भरने दे
यहीं काग़ज़ पे ये अल्फ़ाज़ सारे सूख जाएँगे
ज़रा सा फैल जाने दे ज़रा बूँदें बिखरने दे
अभी अंगूर में हूँ और मुझे ख़ामोश रहना है
सुराही में ज़रा शीशों में तू मुझको उतरने दे
कहाँ बुझने का डर मुझको मैं कोई शमा थोड़े हूँ
ज़रा सी ज़ुल्फ़ हूँ मुझको तू झोंकों से सँवरने दे
सुनी हैं धड़कनें उसकी कई चुपचाप कानों से
यही उम्मीद है शायद मुझे बाँहों में मरने दे
सुने तू बैठ कर मुझको नहीं ऐसी तमन्ना है
मैं हूँ ट्रक पर लिखा एक शेर तू मुझको गुज़रने दे
बद्र का 91 वर्ष की आयु में भोपाल स्थित उनके घर पर निधन हो गया. डिमेंशिया की बीमारी के बाद उन्होंने कई वर्ष पहले सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी. लेकिन उनकी शायरी ने बशीर बद्र के नाम को कभी धुंधला नहीं होने दिया. जो लोग उनका नाम नहीं जानते थे, वे भी उनकी पंक्तियों से परिचित थे. और जो शायरी की बारीकियों से वाकिफ नहीं थे, वे भी यह जानते थे कि वह साहित्य की दुनिया के एक बड़े हस्ताक्षर थे.
उनकी प्रतिभा बचपन से ही झलकने लगी थी. 15 फरवरी 1935 को फैजाबाद (अब अयोध्या) में जन्मे बशीर बद्र ने महज सात साल की उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था. बद्र की सबसे चर्चित शायरी में से एक-‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…'' को उन्होंने किशोरावस्था में ही लिखा था.
उनके बेटे सैयद बद्र ने कहा, ‘‘यह शेर उनके जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, यही उनकी पहचान है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इसे याद रखें और इसका जश्न मनाएं. उनकी शायरी मोहब्बत और जिंदगी की शायरी है.''
अपनी गजल में बेहद समकालीन उर्दू के इस्तेमाल के लिए मशहूर बशीर बद्र ने शायरी को बातचीत जैसी सादगी और भावनात्मक गहराई दी. उनकी रचनाओं में प्रेम, अकेलापन, जुदाई और मानवीय रिश्तों को ऐसी भाषा में पिरोया गया, जो संसद से लेकर कॉलेज की कैंटीन तक हर जगह सहज और आत्मीय महसूस होती थी.
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