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'कहां बुझने का डर मुझको, मैं कोई शमा थोड़े हूं..' : प्रसून जोशी ने बशीर बद्र को कुछ यूं कहा अलविदा

मशहूर उर्दू शायर और पद्मश्री से सम्मानित बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद भोपाल में निधन हो गया. उनकी शायरी ने उन्हें देश-विदेश में खास पहचान दिलाई और वे अपने पीछे समृद्ध साहित्यिक विरासत छोड़ गए हैं. उनके निधन पर कवि-लेखक प्रसून जोशी सहित कई हस्तियों ने भावुक होकर श्रद्धांजलि दी.

'कहां बुझने का डर मुझको, मैं कोई शमा थोड़े हूं..' : प्रसून जोशी ने बशीर बद्र को कुछ यूं कहा अलविदा
प्रसिद्ध उर्दू शायर बशीर बद्र का निधन
  • पद्मश्री से सम्मानित उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद भोपाल में निधन हो गया, उनकी शायरी अमर रहेगी.
  • बशीर बद्र ने 91 वर्ष की आयु में डिमेंशिया बीमारी के कारण सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी.
  • उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को फैजाबाद में हुआ और उन्होंने मात्र सात वर्ष की उम्र में शायरी लिखना शुरू किया.
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पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध उर्दू शायर बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया. 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए' जैसे कालजयी शेर लिखने वाले बशीर बद्र अपनी शायरी के जरिए लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे. उनके जाने से साहित्य जगत को गहरी क्षति हुई है, लेकिन उनकी रचनात्मक विरासत की गूंज लंबे समय तक महसूस की जाती रहेगी. उनके निधन पर कवि और लेखक प्रसून जोशी ने भी भावुक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की. 

अधूरी है तेरी रचना ज़रा तू पूरा करने दे 
यहाँ एक चोट रखने दे वहाँ एक घाव भरने दे 
यहीं काग़ज़ पे ये अल्फ़ाज़ सारे सूख जाएँगे
ज़रा सा फैल जाने दे ज़रा बूँदें बिखरने दे 
अभी अंगूर में हूँ और मुझे ख़ामोश रहना है 
सुराही में ज़रा शीशों में तू मुझको उतरने दे 
कहाँ बुझने का डर मुझको मैं कोई शमा थोड़े हूँ 
ज़रा सी ज़ुल्फ़ हूँ मुझको तू झोंकों से सँवरने दे 
सुनी हैं धड़कनें उसकी कई चुपचाप कानों से 
यही उम्मीद है शायद मुझे बाँहों में मरने दे 
सुने तू बैठ कर मुझको नहीं ऐसी तमन्ना है 
मैं हूँ ट्रक पर लिखा एक शेर तू मुझको गुज़रने दे 

बद्र का 91 वर्ष की आयु में भोपाल स्थित उनके घर पर निधन हो गया. डिमेंशिया की बीमारी के बाद उन्होंने कई वर्ष पहले सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी. लेकिन उनकी शायरी ने बशीर बद्र के नाम को कभी धुंधला नहीं होने दिया. जो लोग उनका नाम नहीं जानते थे, वे भी उनकी पंक्तियों से परिचित थे. और जो शायरी की बारीकियों से वाकिफ नहीं थे, वे भी यह जानते थे कि वह साहित्य की दुनिया के एक बड़े हस्ताक्षर थे.

उनकी प्रतिभा बचपन से ही झलकने लगी थी. 15 फरवरी 1935 को फैजाबाद (अब अयोध्या) में जन्मे बशीर बद्र ने महज सात साल की उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था. बद्र की सबसे चर्चित शायरी में से एक-‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…'' को उन्होंने किशोरावस्था में ही लिखा था.

उनके बेटे सैयद बद्र ने कहा, ‘‘यह शेर उनके जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, यही उनकी पहचान है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इसे याद रखें और इसका जश्न मनाएं. उनकी शायरी मोहब्बत और जिंदगी की शायरी है.''

अपनी गजल में बेहद समकालीन उर्दू के इस्तेमाल के लिए मशहूर बशीर बद्र ने शायरी को बातचीत जैसी सादगी और भावनात्मक गहराई दी. उनकी रचनाओं में प्रेम, अकेलापन, जुदाई और मानवीय रिश्तों को ऐसी भाषा में पिरोया गया, जो संसद से लेकर कॉलेज की कैंटीन तक हर जगह सहज और आत्मीय महसूस होती थी.

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