महारानी वेब सीरीज में एक संवाद है जिसमे एक किरदार दूसरे को कहता है कि टबिहार की एक खासियत है कि जब जब आपको लगता है आप बिहार को समझ गए, बिहार आपको झटका देता है' प्रशांत किशोर की बांकीपुर जीत सिर्फ एक उपचुनाव का नतीजा नहीं है बल्कि यह बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल आरजेडी के लिए राजनीतिक झटका भी है.
बीजेपी के लिए
उम्मीदवार चुनने में गड़बड़ी और कम वोटिंग (34%) के बाद नितिन नवीन का गढ़ हारना यह दिखाता है कि ऊंची जातियों के पक्के वोट अब हमेशा के लिए उनके साथ नहीं हैं. बांकीपुर विधान सभा में कायस्थ, वैश्य और सवर्ण जातियों (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण) की संख्या सबसे अधिक है. भाजपा का समर्थित एक बड़ा तबका भारत तिवारी एनकाउंटर और यूजीसी के नियम से पार्टी से नाराज चल रहा था. बांकीपुर उप चुनाव में इस नाराजगी की अभिव्यक्ति हुई.
- कायस्थ समुदाय: बांकीपुर को कायस्थ मतदाताओं का गढ़ माना जाता है, जिनकी आबादी यहां लगभग 14 से 15 प्रतिशत है.
- अन्य सवर्ण जातियां: भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण वर्ग के मतदाता (लगभग 20-22 प्रतिशत) भी यहां अच्छी संख्या में हैं जो चुनावों में बड़ा असर रखते हैं.
- वैश्य समुदाय: 12 प्रतिशत व्यापारी और वैश्य वर्ग के लोग भी इस शहरी सीट पर निर्णायक माने जाते हैं.
- पिछड़ा वर्ग: यादव वोटर की संख्या करीब दस से बारह फीसदी है.
- मुस्लिम: 7-8 %, कुर्मी, कुशवाहा-10-12% और दलित-महादलित मतदाता 7-8% भी यहां मौजूद हैं.
राजद और तेजस्वी के लिए
RJD अब अपने-आप मुख्य विपक्षी पार्टी नहीं रही. यहां तक कि MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण और मुस्लिम वोटों को भी अब पक्का नहीं माना जा सकता. बांकीपुर के चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजद के समर्थक वर्ग को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता. तेजस्वी यादव का बिहार विधानसभा के हाल ही में संपन्न हुए मानसून में एक दिन भी शामिल नहीं होना यह दिखलाता है कि राजनीति उनके लिए महज़ एक पार्ट टाइम जॉब है. इस चुनावी नतीजे ने यह दिखला दिया है कि मौका मिलने पर राजद समर्थक भी एक सशक्त नेतृत्व और बेहतर राजनीति को चुनना पसंद करेंगे न कि राजद के बंधुवा मजदूर बनकर.
भारतीय लोकतंत्र के लिए
भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को जब जब हल्के में लेने की कोशिश हुई तब तब जनता ने इसका माकूल जवाब दिया. इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त हार इसका सबसे सटीक उदाहरण है. दक्षिण एशिया में भारत ही एकमात्र ऐसा मुल्क है जिसकी लोकतांत्रिक जड़े इतने मजबूत हैं कि स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी न तो सेना ने कभी तख्ता पलट करने की कोशिश की और ना ही कभी इस पैमाने पर सशस्त्र आंदोलन हुआ जिससे अराजकता का माहौल उत्पन्न हुआ.
प्रशांत किशोर ने कौन से मुद्दे उठाए?
प्रशांत किशोर बेरोजगारी, पलायन, आर्थिक और औद्योगिक विकास और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया. इसे मीडिया और आम लोग तरजीह दे रहे हैं. यह मुद्दे पिछले दो-ढाई दशक में चुनावी राजनीति से गायब थे. तो क्या इसका श्रेय सिर्फ प्रशांत किशोर को जाता है या बिहार के सामाजिक-आर्थिक ढांचे में कोई मूलभूत परिवर्तन आया है, जिसके कारण प्रशांत किशोर और उनके द्वारा उठाए जा रहे मुद्दे को तवज्जो मिल रही है.
सामाजिक न्याय के लिए वितरात्मक न्याय का होना आवश्यक है. इसके लिए उत्पादन का होना जरूरी है. बिहार में औद्योगिक उत्पादन न के बराबर है. इसलिए डिस्ट्रीब्यूटिव जस्टिस को सरकारी नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक ही सिमट कर रहना पड़ा. भारत में नई आर्थिक नीति आने के बाद पब्लिक सेक्टर में सरकारी नौकरियां लगातार कम होती गईं. बिहार भी इस नई आर्थिक नीति से अछूता नहीं रहा, यानी कुल मिलाकर बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आसपास ही घूमती रही. इस राजनीतिक प्रतिनिधित्व का फायदा चंद परिवारों तक ही सीमित है. इसका विस्तार तब तक संभव नहीं जब तक बिहार में उत्पादन आधारित डिस्ट्रीब्यूटिव जस्टिस न हो. सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लालू-नीतीश के दो दशक से अधिक के कार्यकाल के बावजूद बिहार में औद्योगिक विकास नहीं हो सका जिसके कारण बिहार आर्थिक तौर पर पिछड़ा राज्य बना हुआ है. अस्मिता की राजनीति के सफल प्रयोग के बावजूद अन्य मोर्चे जैसे भूमि सुधार नहीं होना, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने सामाजिक न्याय की राजनीति को प्रतीकात्मक बना कर रख दिया.
बिहार के लिए
जमीनी पकड़ वाली एक नई राजनीतिक ताकत उभर रही है. 1990 से अब तक बिहार की राजनीति सामाजिक न्याय और जातीय और उपजातीय पहचान की इर्द गिर्द सिमट के रह गई थी. यह राजनीति इतनी सशक्त रही कि हिंदुत्व की राजनीति को भी इसे बिहार में स्वीकार करना पड़ा. इस स्टेटस को की राजनीति में फंसे बिहार को प्रशांत किशोर और जनसुराज की पहली चुनावी जीत ने मतदाताओं के समक्ष एक सशक्त विकल्प देने का काम किया है. पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती मिल रही. यह चुनौती कितना सफल होगी यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन बांकीपुर उप चुनाव के नतीजों ने उम्मीद की किरण तो जागा ही दी है.
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(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)