बालेन शाह ने शुक्रवार को अभिजित मुहूर्त में वैदिक मंत्रोच्चार और बौद्ध शांति पाठ के बीच नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. उनके साथ 15 मंत्रियों ने भी शपथ ली. इसके साथ ही नेपाल ने एक नए युग में प्रवेश किया. अब इस हिमालयी देश को एक स्थिर सरकार मिलती हुई दिख रही है.पांच मार्च को कराए गए चुनाव में जनता ने परिपक्व, निर्णायक और ऐतिहासिक जनादेश दिया.बालेन युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं. पिछले साल सितंबर में हुए जेन जी आंदोलन के बाद वो चर्चा में आए थे.उनकी केवल तीन साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को इस चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला. उसने 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की 165 में से 125 सीटें और समानुपातिक प्रणाली की 57 सीटों के साथ कुल 182 सीटें जीती हैं. आरएसपी को मिला यह जनादेश कई मायनों में ऐतिहासिक है. नेपाल में 1999 के बाद यह पहली बार है जब किसी अकेली पार्टी को अपने दम पर बहुमत मिला है. ऐसा बहुमत तो राजशाही के अंत के बाद 2008 में हुए पहली संविधान सभा के चुनाव में पुष्प कमल दहाल प्रचंड को भी नहीं मिला था. बालेन के शपथ के साथ ही नेपाल में राजनीति अस्थिरता खत्म होने की संभावना प्रबल होती दिख रही है.
बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा और पहले मधेशी प्रधानमंत्री हैं. संविधान लागू होने के केवल दस साल के भीतर ही किसी मधेशी का इस राजनीतिक मुकाम पर पहुंचना नेपाल की राजनीति में एक दुर्लभ और महत्वपूर्ण क्षण है. देश का 35 साल पुराना बहुदलीय इतिहास बताता है कि इस दौरान 30 प्रधानमंत्री बने. लेकिन पार्टियों की अंदरूनी लड़ाई और नेताओं की महत्वाकांक्षा की वजह से कोई भी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. इस दौरान अस्थिरता नेपाल की राजनीतिक नियति बन गई थी. सत्ता के लोभ में नए-नए गठबंधन बनते-बिगड़ते रहे. सत्ता की कुर्सी ओली,प्रचंड और देउबा के बीच घूमती रही. पांच मार्च को हुए चुनाव में आरएसपी ने कुछ हिमालयी जिलों को छोड़कर पूरे नेपाल में बेहतर प्रदर्शन किया है.उसने मधेश में भी उम्मीद से बेहतर सफलता हासिल की. आरएसपी ने वहां की 31 में से 30 सीटें अपने नाम कर लीं. यह हाल तब है जब मधेश में आरएसपी को संघवाद विरोधी माना जा रहा था.
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नेपाल की संसद में कहा हैं दलित, जनजाति और मधेशी
इन चुनाव से नेपाल के लोगों ने एक तरह से ओली,प्रचंड और देउबा के बंधन से काफी हद तक आजादी हासिल कर ली. पुरानी पार्टियां ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं. नेपाल की वृद्धतंत्रशाही को युवाओं से गंभीर चुनौती मिली है. युवाओं का प्रतिनिधित्व भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है. बड़ी संख्या में युवा प्रतिनिधि चुने गए हैं और कुल निर्वाचित सदस्यों में से 33 फीसदी से अधिक सदस्य 40 साल से कम आयु के हैं.
कुछ विश्लेषक इसे नेपाल में लोकतंत्र की दूसरी लहर की संज्ञा दे रहे हैं, लेकिन आंकड़े इस दावे पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं.इस बार के चुनावी नतीजों में ऊंची जाति के सदस्यों की संख्या में पिछली बार की तुलना में बढ़ी है. जेन जी आंदोलन की भावना यह थी कि इससे नेपाल की राजनीति का लोकतांत्रिकरण होगा, लेकिन सत्ता प्रभुत्वशाली खस-आर्य समूह में और ज्यादा केंद्रित होती नजर आ रही है (टेबल देखें). इसके विपरीत दलित, जनजाति और मधेशी जैसे वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व घटा है.
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इस चुनाव में मधेशी दलित समुदायों जैसे मुसहर, सदा, पासवान (दुसाध) आदि को सबसे अधिक घाटा हुआ है. संवैधानिक बाध्यता के कारण 40 फीसदी सीटें (110) का बंटवारा विभिन्न समुदायों के बीच उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है. दलितों के लिए 13 फीसदी (14) सीटें आरक्षित हैं. इसमें से कुल 82 फीसदी पर अकेले विश्वकर्मा समुदाय (दलित) ने कब्जा कर लिया है. बाकी बची सीटें पहाड़ी दलितों को मिली हैं. इस वजह से मधेशी दलितों की संख्या संसद में शून्य हो गई है. चूंकि दलितों में विश्वकर्मा समुदाय अपेक्षाकृत संपन्न हैं, ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधित्व शून्य होना मधेशी दलितों की स्थिति को और बदतर कर सकता है. इसलिए इस बदलाव को नए युग का नाम देना सवाल खड़े करता है कि यह किस तरह का नयापन है जो पुराने जातीय वर्चस्व को और मजबूत ही बनता नजर आ रहा है.नेपाल के नवगठित 15 सदस्यीय मंत्रीपरिषद में भी खस-आर्य और पहाड़ी का प्रभुत्व है.

शुक्रवार को राजधानी काठमांडू में आयोजित बालेन शाह के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने आए बौद्ध भिक्षु.
Photo Credit: PTI
आरएसपी की जीत से काठमांडू में सत्ता और अधिक केंद्रीकृत होने की संभावना नजर आ रही है. संघीय व्यवस्था के लिए आरएसपी का नजरिया अभी तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया है. इस बार मधेश की राजनीति करने वाली पार्टियों की संसद में अनुपस्थित और उनकी अनुपस्थिति में संघीय ढांचे में क्या बदलाव होंगे, यह निश्चित नहीं है. इस बात की आशंका अधिक है कि इससे संघीय व्यवस्था कमजोर की जा सकती है. इसका परिणाम यह होगा कि सत्ता काठमांडू में बैठे उच्च वर्गीय समूहों के हाथों में केंद्रित हो सकती है. इस स्थिति में मधेश और जनजातीय क्षेत्र, जहां संघीय व्यवस्था के प्रति समर्थन अधिक है और जिसे वे अपने प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकारों को पाने का एक जरिया समझते हैं, उनकी स्थिति भी नकारात्मक रूप से निचले स्तर पर जा सकती है. इसलिए इस चुनाव और उसके परिणामों का विश्लेषण एक व्यापक दृष्टिकोण से करने की जरूरत है. हमें यह देखना होगा कि जहां एक ओर इन परिणामों ने पारंपरिक सत्ता संरचनाओं को चुनौती दी है, वहीं दूसरी ओर इसने कुछ ऐसी परिस्थितियों भी उत्पन्न की हैं जिससे नए प्रकार के जातीय और क्षेत्रीय वर्चस्व के उभरने की आशंका है.
हिंदुत्व का उभार, क्या फिर हिंदू राष्ट्र बनेगा नेपाल
साल 2006 तक नेपाल को दुनिया के एकमात्र हिंदू राष्ट्र के तौर पर जाना जाता था. राजशाही के अंत के बाद 2008 में नेपाल आधिकारिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बना. हालांकि नेपाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान हमेशा से सवालों के घेरे में रही है. इस संदर्भ में नेपाल का संविधान भी असमंजस की स्थिति पैदा करता है, इसने धर्मनिरपेक्षता को 'धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के तौर पर परिभाषित किया है'. यह परिभाषा नेपाल में नेताओं को राजनीति के साथ धर्म के घालमेल को आमंत्रित करती नजर आती है. ऐसा परिदृश्य हाल के चुनाव में भी नजर आया, जब पहली बार मुख्य तौर पर बालेन शाह ने न सिर्फ जनकपुर में जानकी मंदिर में दर्शन के साथ अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की. बाद में भी वो कई मंदिरों का दौरा करते नजर आए. बालेन शाह, जिनका जन्म मधेशी हिंदू परिवार में हुआ है. वहीं उनकी पत्नी नेवारी हिंदू-बौद्ध परंपरा को मानती हैं. इस सांस्कृतिक संगम का उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक सोच पर प्रभाव साफ नजर आता है.
शपथ ग्रहण समारोह में 108 वैदिक बटुकों द्वारा स्वस्तिवाचन और 108 बौद्ध भिक्षुओं द्वारा शांति-मंगलगान और शंख वादन भी नेपाल में राजनीति और धर्म के इस नए समीकरण को उभरते हुए दिख रहा है. एक अवसर पर हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न पर अपने नजरिए को साझा करते हुए बालेंद्र शाह ने कहा था कि कागज पर क्या लिखा है हमें इस पर ध्यान देने के बजाय अपने आचरण में उसे उतारना अधिक महत्वपूर्ण है. वे अपने इस विचार को व्यवहार में लागू करते नजर आ रहे हैं. इससे नेपाल में धर्मनिरपेक्षता बनाम हिंदू राष्ट्र की बहस एक नए मोड़ पर पहुंच गई है. इसके आलोचकों का मानना है कि इससे नेपाल की धर्मनिरपेक्ष पहचान को इससे नुकसान पहुंच सकता है. फिर भी, समग्र रूप में देखा जाए तो धर्म अब नेपाली राजनीति में एक नए और महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभर रहा है, जो एक नई किस्म के नेपाली हिंदुत्व को जन्म दे रहा है.

राजधानी काठमांडू में शुक्रवार को शपथ लेते बालेन शाह सरकार के मंत्री.
लोगों ने आरएसपी को कितनी बड़ी जिम्मेदारी दी है
आरएसपी को जितनी बड़ी जीत मिली है, उतनी ही बड़ी अपेक्षाएं भी नेपाल के लोगों ने उसके कंधे पर डाली हैं. बालेन शाह की सरकार को पहले दिन से ही आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से खाड़ी के देशों में काम कर रहे नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा इस सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी, क्योंकि ये प्रवासी नेपाली नेपाल की अर्थव्यवस्था में एक बड़ा योगदान देते हैं. खाड़ी संकट के चलते नेपाल को संभावित ईंधन संकट का भी सामना करना पड़ सकता है, जिसका त्वरित समाधान निकालना जरूरी होगा. इसके साथ ही, पिछले साल के 'जेन जी आंदोलन' के पीड़ितों को न्याय दिलाना भी उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, खासकर तब जब जांच आयोग ने रिपोर्ट सौंप दी है. इस जांच रिपोर्ट में उस समय के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली समेत कई बड़े पदाधिकारियों पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है.भ्रष्टाचार,बेरोजगारी, भाई भतीजावाद, नौकरी के लिए पलायन को रोकना और सुशासन ऐसे मुद्दे हैं जिन पर नई सरकार को काम करना होगा.
बालेन शाह के सामने आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ विदेश नीति की चुनौतियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. कम्युनिस्ट दलों की चुनावी हार के बाद भले ही उनका प्रभाव कम हुआ हो, लेकिन नेपाल को भारत-चीन के बीच बेहतर तालमेल बनाना होगा. इसके अलावा हाल के सालों में विकास अनुदान, एनजीओ, छात्रवृत्तियों आदि के माध्यम से अमेरिका ने भी नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाया है. नई सरकार के कई सांसद भी इन कार्यक्रमों के लाभार्थी रहे हैं, इसलिए सरकार पर अमेरिकी प्रभाव भी नजर आ सकता है. कुल मिलाकर नेपाल की विदेश में नीति में इन तीनों शक्तियों भारत , चीन और अमेरिका के बीच संतुलन की रणनीति अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों और विकास लक्ष्य को हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा.
डिस्क्लेमर: मोहन कुमार मिश्र वाराणसी के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में शोधार्थी हैं और नेपाल के सपतरी (मधेश) की रहने वाली रसना यादव भी उसी विभाग में शोधार्थी हैं.इसे लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं,उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं हैं.