चंद रोज पहले अशोक गहलोत ने कांग्रेस का वो किस्सा छेड़ दिया, जिसे शायद पार्टी भूल जाना चाहती है. उन्होंने कहा कि विधायक दल की बैठक नहीं होने के पीछे उनका हाथ नहीं था. गहलोत ने कहा कि उन्होंने सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ बगावत नहीं की थी. विधायक खुद ही बैठक में नहीं आना चाहते थे.
दरअसल तब लीडरशिप ने गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनने को कहा था. गहलोत को डर था कि उनके राजस्थान से जाते ही सचिन पायलट को सीएम बनाया जाएगा. लिहाजा कहा यही जाता है कि गहलोत ने 92 विधायकों को जुटाया और सचिन पायलट के हाथ में सत्ता नहीं जाने दी.
7 जून, 2026 को गहलोत ने कहा कि मीडिया की वजह से उन्हें बागी करार दे दिया गया, जबकि मुझे लगता है कि वो एक साजिश थी. इस तरह से अचानक से पार्टी पर्यवेक्षकों का आना, फिर वो तमाशा और आखिर में मुझे बागी कह देना.
गहलोत के बयान के बाद सचिन पायलट ने भी प्रतिक्रिया दी है. पायलट ने कहा कि उनकी किसी से कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है और लोग जानते हैं कि वह हमेशा सोच-समझकर बोलते हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पॉलिटिक्स में संघर्ष और सच्चाई जरूरी हैं, लेकिन सब्र, संयम, सम्मान और विनम्रता भी जरूरी हैं.
पायलट ने कहा, "मैंने पॉलिटिक्स में 25 साल बिताए हैं। मैं इसके अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को समझता हूं। मैंने कई पॉलिटिकल चालें और स्ट्रैटेजी देखी हैं, लेकिन आखिर में, नतीजा जनता ही तय करती है."
लेकिन सवाल ये है कि गहलोत किसपर साजिश रचने का आरोप लगा रहे हैं. राहुल गांधी पर? खरगे पर? अजय माकन पर या केसी वेणुगोपाल पर?
तो आखिर इस असामयिक गुस्से की वजह क्या है? राज्यसभा की सीट ना मिलना या गांधी परिवार एक साथ एक अदद बैठक जिसका इंतजार वो लंबे समय से कर रहे हैं. या उन्हें लग रहा है कि पार्टी उनकी अनदेखी कर सकती है. सूत्र बताते हैं कि परिवार के साथ बैठक न होने से ज्यादा इस बात को लेकर गहलोत चिंतित हैं कि पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है. अगर ऐसा हुआ तो अगले चुनाव के लिए सीएम चेहरा भी वही हो सकते हैं.
कहीं पीछे ना छूट जाएं?
गहलोत की दूसरी चिंता है कि पार्टी में उनकी ताकत कमजोर रही है. अब उन्हें अहम मसलों पर सलाह के लिए नहीं बुलाया जाता. अहम पदों के लिए उनके नाम की चर्चा नहीं हो रही है.
सूत्र बताते हैं कि उनके समर्थकों ने ये हवा भी उड़ाई थी कि अगर उन्हें राज्यसभा भेजा जाता है तो वो 24 अकबर रोड का बंगला लेने की कोशिश करेंगे और उसे 6 साल के लिए पार्टी को दे देंगे. बता दें कि दशकों से ये जगह कांग्रेस का दफ्तर रही है और अब सरकार की तरफ से दबाव है वो इसे खाली करें. सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी ने बंगले को पार्टी के लिए देने वाली को कोई तवज्जो नहीं दी.
दिग्विजय की कहानी
इस मोड़ पर दिग्विजय सिंह की कहानी याद आती है. कहा जा रहा है कि वो भी राज्यसभा के लिए फिर से मौका ना मिलने के कारण असहज हैं. उन्हें भी भविष्य की चिंता सता रही है. रिटायरमेंट, बागवानी, जीवनी लिखना या संगीत सुनना, इन चीजों से दिग्विजय को शायद ही खुशी मिलती हो. लेकिन फिर उन्होंने पार्टी के खिलाफ गुस्सा जताने के बजाय बयान दिया कि वो राहुल और सोनिया के शुक्रगुजार हैं कि उन्हें दो बार राज्यसभा के लिए भेजा गया.
दिग्विजय की हालत गहलोत जैसी ही है. उनके बेटे जयवर्धन सिंह राजनीति में सेटल हो चुके हैं, इसलिए उनकी उनके गृहराज्य में कोई ज्यादा भूमिका रह नहीं गई है. दिल्ली में उनके लिए कोई खास पद है नहीं. हालांकि पार्टी में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि दिग्विजय अब भी बहुत कारगर हैं. ये लोग चाहते हैं कि राहुल गांधी दिग्विजय को साधु संतों को पार्टी के पक्ष में करने का काम दें.
दिग्विजय हिंदुत्व के बजाय सनातन की बात करते हैं. 2018 अप्रैल में उन्होंने मध्य प्रदेश में 192 दिन तक 3,325 किलोमीटर की पदयात्रा की और फिर दिसंबर 2018 में कांग्रेस ने बीजेपी को हरा दिया. लेकिन गहलोत दिग्विजय नहीं हैं. वो नहीं चाहेंगे कि आलाकमान उनकी किस्मत तय करे. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि गहलोत की बयानबाजी आलाकमान को अच्छी नहीं लगी है. लोग तो ये भी कह रहे हैं इसके कारण 2028 के चुनाव में उनकी सरदारपुरा सीट जा सकती है.