फलों से लदा हुआ वृक्ष सबसे ज्यादा पत्थरबाजों के निशाने पर रहता है!और कुछ ऐसा ही किंग खान शाहरुख खान के बारे में कहा जा सकता है. बांग्लादेश में हाल ही में एक के बाद एक ढूंढ-ढूंढ कर वर्ग विशेष से जुड़े लोगों की हत्या की गई, तो केकेआर के सह-मालिक शाहरुख खान पिछले दिनों 16 दिसंबर को दुबई में हुई मिनी ऑक्शन में खरीदे गए बांग्लादेशी लेफ्टी पेसर मुस्तिफजुर रहमान के कारण साधु-संतों, कुछ राजनीतिज्ञों, फैंस सहित एक बड़े वर्ग के निशाने पर गए. वर्तमान में कोलकाता नाइट राइडर्स में 55% शेयर रखने वाले शाहरुख खान को न जाने क्या-क्या कहा गया, लेकिन 45% शेयर वाले अभिनेत्री जूही चावला के पति और उद्योगपति जय मेहता को लेकर कहीं से कोई आवाज नहीं आई. वजह यह है कि शाहरुख खान के नाम पर टीवी पर दिखना, अखबारों की सुर्खियों में रहना और समाज को भ्रमित करना आसान है, लेकिन अगर आप कड़ियों से कड़ियां जोड़ेंगे, या बिंदु दर बिंदु आगे बढ़ेंगे, तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है:-
-पिछले साल 2025 में मिनी ऑक्शन का आयोजन दुबई में 16 दिसंबर को हुआ, तो बांग्लादेश में पहली जघन हत्या दीपू चंद्र दास की 18 दिसंबर को हुई. मुस्तिफजुर रहमान करीब दो दिन पहले ही खरीदे जा चुके थे, लेकिन इससे पहले तो मिनी ऑक्शन से पहले बहुत कुछ घटित हो चुका था
-क्या भारत सरकार ने बांग्लादेशी खिलाड़ियों को न खरीदे जाने को लेकर कोई निर्देश जारी किए थे?
-बांग्लादेशी खिलाड़ियों की खरीद का पहला दरवाजा बीसीसीआई की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया से गुजरता है, तो शाहरुख पर शोर क्यों?
-मु्स्तिफजुर रहमान के 9.20 करोड़ रुपये में बिकने से पहले दिल्ली कैपिटल्स और चेन्नई सुपर किंग्स ने इस लेफ्टी पेसर को खरीदने के लिए आखिर तक मुकाबला किया. मतलब दो और टीमें मुस्तिफजुर को खरीदने के लिए इच्छुक थीं
- किसी भी टीम द्वारा खिलाड़ी विशेष को खरीदने का फैसला विशेषज्ञ/प्रबंधन टीम (कोच, कप्तान और बाकी लोग) आदि का होता है. जाहिर है कि यह पूरी तरह से स्वायत्त कमेटी होती है और इसमें टीम के मालिक की पसंद न पसंद के कोई मायने नहीं होते. खिलाड़ी का चयन पूरी तरह से योग्यता के आधार पर होता है.
....लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद शाहरुख खान एक वर्ग के निशाने पर आ गए. उनकी जैसी शख्सियत को निशाना बनाना आसान है क्योंकि उनके स्टारडम के सहारे कुछ लोगों के लिए कैमरों या अखबारों में चमकना आसान हो जाता है. ऐसे में इन लोगों के लिए भी सवाल हैं?
-शाहरुख खान को निशाने पर लेने वाले लोगों ने सरकार से सवाल क्यों नहीं किया?
-इन लोगों ने बीसीसीआई से सवाल क्यों नहीं किया?
-इन लोगों ने जय मेहता के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई?

वजह यह है कि सरकार या बीसीसीआई को कोसने पर इन लोगों को खबरों, चैनलों के डिबेट शो या अखबारों के पन्ने पर उतनी जगह नहीं ही मिलती, जितना किंग खान का नाम उन्हें दिला देता है. शाहरुख के नाम पर इन लोगों को कई दिन तक प्राइम टाइम शो में बतौर गेस्ट जगह मिल जाएगी. वैसे, इस वर्ग की इस प्रतिक्रिया में गंभीरता कम, समझ में आने वाला गुस्सा ज्यादा दिखाई पड़ता है. लेकिन यहां तस्वीर का दूसरा पहलू भी है. और यह सवाल किसी भी व्यक्ति विशेष, सुपरस्टार या मीडिया द्वारा इन्हें दिए गए 'तमगों' से कहीं आगे का है.
सवाल यह है कि 'एक वर्ग' जो साल 2024 में ट्विटर पर-ऑल आइज ऑन राफाह- पोस्ट की झड़ी लगा देता है, वह इस तरह की घटनाओं पर क्यों चुप्पी साध लेता है? यहां एक बार को किंग खान की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन बाकी लोगों को किसी शख्स की जिंदा जला देने, बर्बरतापूर्ण ढंग से मार देने की घटना क्यों नहीं झकझोरती? सवाल ये है कि ऐसे लोगों की संवेदनाएं बांग्लादेश जैसी वीभत्स घटनाओं पर क्यों मर जाती हैं? कौन जानता है कि ऐसे लोगों के लिए बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों के साथ घट रहीं वीभत्स घटनाओं से ज्यादा अपनी फैन फॉलोइंग, छवि, इन देशों में अपनी फिल्मों का धंधा कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो?

कहीं, ये लोग इस डर की वजह से तो इन घटनाओं के खिलाफ मुंह नहीं खोलते कि कहीं ऐसा करने पर बांग्लादेश में इनकी फिल्मों पर प्रतिबंध लग जाएगा? और अगर प्रतिबंध लग भी जाएगा, तो आखिर इन्हें कितना नुकसान हो जाएगा? क्या यह मामूली नुकसान वर्ग विशेष के साथ घट रहीं घटनाओं को लेकर चिंता प्रकट करने/प्रतिक्रिया देने से कहीं ज्यादा बड़ा है? और अगर वास्तव में इनका सोचना ऐसी ही है, तो ये तमाम लोग खोखले नायकों से ज्यादा कुछ नहीं हैं. जब ये लोग ऐसे समय पर भी मुंह नहीं खोलेंगे, तो आखिर कब और किस मौके पर खोलेंगे? किसी भीड़ द्वारा किसी शख्स को जिंदा आग के हवाले कर देने से घृणित/वीभत्स अपराध और क्या हो सकता है?
हैरानी तब होती है कि तुलनात्मक रूप से कहीं कम शिक्षित, सामाजिक सरोकारों, संवेदशील विषयों, घर के छोटे-छोटे कामों से दूर रहकर पूरी तरह से नौकरों और स्टॉफ पर निर्भर रहने वाले ये लोग 'बहुत ही भारी-भरकम' विषयों पर अपनी राय देते हैं. साल 2024 में एक यू-ट्यूब या टीवी शो-फराह की दावत में बतौर गेस्ट आई वर्तमान समय की सबसे महंगी अदाकाराओं में से एक को मौसमी और नींबू के बीच का अंतर नहीं पता था. लेकिन गाहे-बेगाहे बहुत ही 'भारी-भरकम विषयों' पर ऐसे तमाम लोग ऐसे राय देते हैं कि मानो ये हर विषय के विशेषज्ञ हों!
बहरहाल, इस सहित तमाम बातें ऐसे लोगों ही नहीं, बल्कि उस समाज की मनोदशा और समझ पर भी सवाल खड़ा करता है, जो इन्हें नायक, स्टार या सुपरस्टार बनाता है या खुद को इनके भीतर देखता है. ऐसे नायक जो वीभत्स घटनाओं को अलग-अलग चश्मे और अपनी सुविधा के हिसाब से देखते, तौलते या प्रतिक्रिया देते हैं. और जिनकी संवेदनाएं हालात, निजी सहूलियत, किसी और बात, कहीं व्यक्ति विशेष या स्थान से मिले निर्देशों से संचालित होती है.
(मनीष शर्मा ndtv.in में डिप्टी न्यूज़ एडिटर हैं...)
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