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अमेरिका-इजरायल के पास महंगे हथियार, सस्ते मिसाइलों से दुश्मन और दुनिया को चौंका रहा ईरान

कर्नल रिटा. राजीव अग्रवाल
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    मार्च 05, 2026 06:54 am IST
    • Published On मार्च 04, 2026 16:01 pm IST
    • Last Updated On मार्च 05, 2026 06:54 am IST
अमेरिका-इजरायल के पास महंगे हथियार, सस्ते मिसाइलों से दुश्मन और दुनिया को चौंका रहा ईरान

इजराइल ने ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा बताया, जबकि अमेरिका ने ईरान की तेजी से बढ़ती बैलिस्टिक मिसाइल ताकत के कारण अपने देश के लिए ‘तत्काल खतरा' बताया. दोनों देशों ने 28 फरवरी को ईरान पर हवाई हमले शुरू किए, जिनमें ईरान के मुख्य ढांचों को निशाना बनाया गया और एक सुनियोजित खुफिया अभियान के तहत शीर्ष नेताओं को मार गिराया गया. साफ है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या अमेरिका-इजराइल का सबसे बड़ा लक्ष्य था. इस अभियान से उम्मीद थी कि कुछ ही दिनों में ईरान को पूरी तरह कमजोर कर दिया जाएगा, उसके पूरे राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को हटा दिया जाएगा और वहां तुरंत सत्ता परिवर्तन हो जाएगा.

हालांकि, उसके बाद जो हुआ उसने दुनिया को चौंका दिया है और अमेरिका व इजराइल के सैन्य अधिकारियों के अनुमान गलत साबित हुए हैं. ईरान का जवाबी हमला सटीक और बहुत तेज रहा है, और उसने सामने खड़ी ताकतवर सेनाओं की परवाह नहीं की. अपने सर्वोच्च नेता और 40 से अधिक बड़े जनरलों की मौत से वह हिम्मत नहीं हारा, बल्कि उसका इरादा और मजबूत हुआ है. खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था की कमी सामने आ गई है क्योंकि अमेरिकी रक्षा सिस्टम पर भारी दबाव है और वे संख्या में कम पड़ रहे हैं. अमेरिकी सैन्य अड्डे और दूतावास खाली कराए जा रहे हैं, फारस की खाड़ी में ऊर्जा सप्लाई रुक गई है, और डर है कि अगर युद्ध लंबा चला तो इसका खर्च जल्द ही इज़राइल और अमेरिका दोनों के लिए संभालना मुश्किल हो जाएगा.

अमेरिका के महंगे मिसाइल बनाम ईरान के सस्ते हथियार

ईरान, इज़राइल और अमेरिका के खिलाफ एक असमान लड़ाई लड़ रहा है. जब ईरान का सामना दुनिया की सबसे आधुनिक और खतरनाक सेनाओं से हो, तो ताकत में बराबरी संभव नहीं है. लेकिन आधुनिक हथियारों की कीमत बहुत ज्यादा होती है. यह युद्ध मिसाइलों, ड्रोन और लड़ाकू विमानों जैसे दूर से मार करने वाले हथियारों से लड़ा जा रहा है. खर्च की तुलना से कई बातें साफ होती हैं. कुछ अनुमान के अनुसार, ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के पहले 24 घंटों में अमेरिका को लगभग 779 मिलियन डॉलर खर्च करने पड़े. पहले तीन दिनों में कुल खर्च करीब 1.24 बिलियन डॉलर बताया जा रहा है. अमेरिका का सैन्य बजट लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर है, इसलिए यह रकम बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन इससे इतने बड़े सैन्य अभियान के खर्च का अंदाजा मिलता है.फिर भी कुल खर्च से ज्यादा अहम बात यह है कि हर एक हथियार की कीमत क्या है और कौन कितना महंगा हथियार इस्तेमाल कर रहा है.

अमेरिकी पैट्रियट और टोमाहॉक मिसाइलों की कीमत 1 से 3 मिलियन डॉलर प्रति मिसाइल है, जबकि एक औसत ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल की कीमत लगभग 8 से 10 लाख डॉलर है. इसी तरह, एमक्यू-9 रीपर ड्रोन की कीमत लगभग 30 मिलियन डॉलर है, जबकि ईरान के शाहेद ड्रोन की कीमत सिर्फ 30 से 50 हजार डॉलर है. कीमत में यह बड़ा अंतर इज़राइल और अमेरिका के लिए दो तरह की समस्या पैदा कर रहा है. पहली, बहुत ज्यादा खर्च; और दूसरी, हर साल इनकी कम संख्या में बनना, जिससे युद्ध में जरूरत के समय इनकी कमी हो सकती है.

क्या अमेरिका का स्टॉक खत्म हो जाएगा?

मौजूदा युद्ध में, सिर्फ चार दिनों के बाद, यह चिंता जताई जा रही है कि पैट्रियट और टोमाहॉक मिसाइलों का स्टॉक जल्द खत्म हो सकता है. युद्ध क्षेत्र में पैट्रियट मिसाइलों की संख्या 600 से 800 के बीच बताई जा रही है. ईरान से आने वाली हर मिसाइल को रोकने के लिए चार से छह इंटरसेप्टर मिसाइलें दागी जा रही हैं. अनुमान है कि 150-200 इंटरसेप्टर पहले ही दागे जा चुके हैं. इससे डर है कि अगले चार से सात दिनों में इज़राइल और अमेरिका के पास इंटरसेप्टर कम पड़ सकते हैं. खबर है कि अमेरिका स्टॉक बढ़ाने के लिए जापान और कोरिया से कुछ पैट्रियट मिसाइलें मंगाने पर विचार कर रहा है. इसी तरह, टोमाहॉक मिसाइलों की भी कमी हो सकती है, खासकर अगर समुद्र में लड़ाई तेज हो गई. साल में लगभग 600-650 पैट्रियट मिसाइलों का बनना उस युद्ध के लिए काफी नहीं है, जिसमें हर हफ्ते 250-400 मिसाइलों की जरूरत पड़ रही है.

ईरान यह बात जानता है और उसने पहले से तैयारी कर रखी है. उसके पास बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन हैं, जिनमें से कई पहाड़ों के अंदर बने सुरक्षित ठिकानों में रखे गए हैं, जहां अमेरिकी हमले आसानी से नहीं पहुंच सकते. कुछ अनुमान के अनुसार, ईरान के पास अलग-अलग तरह की 20,000 से 50,000 तक मिसाइलें हो सकती हैं; उसके पास हजारों ड्रोन भी हैं. अपनी अलग तरह की बढ़त को समझते हुए, ईरान पुरानी और नई मिसाइलों और ड्रोन को मिलाकर लगातार हमले कर रहा है, ताकि इजरायल और अमेरिका की रक्षा प्रणाली व्यस्त रहे. उसे पता है कि उसका स्टॉक कई महीनों तक चल सकता है. इसके अलावा, वह हर महीने दर्जनों मिसाइलें बना रहा है, जिससे आने वाले समय में भी उसका स्टॉक भरता रहेगा. खर्च और उपलब्धता, दोनों मामलों में ईरान अमेरिका और इज़राइल पर दबाव बना रहा है.

मानवीय कीमत

युद्ध का नतीजा तय करने में सैनिकों की मौत भी अहम होती है. राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस संघर्ष में हताहतों की संख्या का जिक्र किया है, लेकिन विदेशी जमीन पर मारे गए सैनिकों के शवों की वापसी अमेरिका में लोगों को स्वीकार नहीं होती. निराशा के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं. 2 मार्च को अपने संबोधन में राष्ट्रपति ट्रम्प और युद्ध सचिव ने तीन लोगों की मौत का जिक्र किया और उन्हें सम्मान देने की बात कही. यह युद्ध का सिर्फ तीसरा दिन था. अगर हताहतों की संख्या बढ़ती है, खासकर जब ईरानी मिसाइलें अमेरिकी दूतावासों, सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो और यहां तक कि उन होटलों को भी निशाना बना रही हैं जहां से निकाले गए सैनिक ठहरे हैं, तो यह राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए लंबे समय तक झेल पाना मुश्किल हो सकता है. इज़राइल में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है, भले ही वह ज्यादा सहनशक्ति दिखाने की बात कहे.

ट्रम्प और नेतन्याहू के लिए राजनीतिक दांव

राष्ट्रपति ट्रम्प और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों के राजनीतिक भविष्य के लिए यह युद्ध बहुत अहम है. राष्ट्रपति ट्रम्प इस साल होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले गिरती लोकप्रियता से जूझ रहे हैं. उनके समर्थकों के लिए भी उनका साथ देना आसान नहीं हो रहा. टैरिफ से जुड़े फैसलों और अन्य विवादों ने उन्हें मुश्किल में डाला है. ऐसे में ईरान के साथ युद्ध को कुछ लोग ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं.

प्रधानमंत्री नेतन्याहू को भी इस साल चुनाव का सामना करना है. गाजा युद्ध अभी सुलझा नहीं है. उनके सहयोगी उन पर गाजा में जमीनी कार्रवाई फिर शुरू करने का दबाव बना रहे हैं. न्यायिक सुधार और भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर भी वे कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. 28 फरवरी को, जिस दिन हमले शुरू हुए, उसी दिन उन्हें अदालत में पेश होना था, जिसे बाद में टाल दिया गया. ऐसे में ईरान के खिलाफ साफ जीत से कम कुछ भी उनके राजनीतिक भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है. ईरान यह समझता है और संघर्ष को लंबा खींचने की कोशिश कर रहा है, जिससे अमेरिका और इज़राइल दोनों पर समय और पैसे का दबाव बढ़े.

प्रतिष्ठा दांव पर

खाड़ी देशों ने कई सालों से अमेरिकी सुरक्षा भरोसे पर अपनी सुरक्षा व्यवस्था बनाई थी. इलाके में अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी बाहरी हमले से बचाव का हिस्सा मानी जाती थी. सितंबर 2025 में इज़राइल द्वारा कतर पर मिसाइल हमले के बाद, अमेरिका ने खाड़ी देशों को मजबूत सुरक्षा भरोसा देने की बात कही थी. लेकिन अब यह सुरक्षा ढांचा कमजोर दिख रहा है. कई खाड़ी देश ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों की चपेट में आए हैं. अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी नहीं दिखी है, क्योंकि हमलों में बहरीन में पांचवें बेड़े का मुख्यालय, दोहा का बड़ा सैन्य अड्डा, कुवैत, इराक, यूएई और जॉर्डन के ठिकाने, साथ ही रियाद और कुवैत में दूतावास और वाणिज्य दूतावास प्रभावित हुए हैं.

ओमान, जो बातचीत में तटस्थ माना जाता है, वह भी इससे बच नहीं पाया. होटलों और बंदरगाहों पर भी हमले हुए हैं और इलाके में डर का माहौल है. अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होता है तो तेल सप्लाई रुक सकती है और दुनिया में आर्थिक मंदी आ सकती है.इन घटनाओं से अमेरिकी सुरक्षा की छवि को झटका लगा है. कई सालों में बनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है. ईरान को इसका अंदाजा था और उसने संघर्ष को इलाके में फैलाने का फैसला सोच-समझकर किया है, जिससे अमेरिका को आर्थिक और छवि दोनों तरह का नुकसान हो रहा है.

अप्रत्याशित नतीजे

संघर्ष को अभी एक हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन हालात उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बदल गए हैं. ईरान, जिस पर लगातार हमले हुए और जिसने अपने सर्वोच्च नेता सहित 40 से ज्यादा बड़े नेताओं को खो दिया, उसने झुकने या आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया है. इसके बजाय उसने ऐसी रणनीति अपनाई है, जिसने इज़राइल, अमेरिका और पूरे इलाके को हैरान कर दिया है, और उन पर ऐसा दबाव बना रही है जो आगे चलकर संभालना मुश्किल हो सकता है.

(ये लेख कर्नल रिटा. राजीव अग्रवाल ने लिखा है, लेखक एक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी और चिंतन अनुसंधान फाउंडेशन में वरिष्ठ अनुसंधान सलाहकार हैं)
 

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