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बिहार के जमुई, समस्तीपुर और बांका में लड़कियों से बदसलूकी पर जाति क्यों पड़ रही भारी?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कहा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती. विपक्ष के नेताओं ने सवाल उठाया कि अपराध के मामलों में जाति की चर्चा क्यों हो रही है. तेजस्वी यादव ने बांका की घटना पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या सजा तय करते समय जाति देखी जाएगी.

बिहार के जमुई, समस्तीपुर और बांका में लड़कियों से बदसलूकी पर जाति क्यों पड़ रही भारी?
21 मई 2026 को पटना में RJD के नवनिर्वाचित MLC सोनू राय के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, विपक्ष के नेता और RJD नेता तेजस्वी यादव के साथ.
  • बिहार में जमुई, समस्तीपुर और बांका में लड़कियों के साथ बदसलूकी के अलग-अलग मामले सामने आए हैं
  • राजनीतिक दलों ने इन घटनाओं में आरोपियों की जाति को लेकर बयानबाजी की, जिससे विवाद और बहस तेज हुई है
  • मुख्यमंत्री ने अपराधी की जाति को महत्व न देने की बात कही जबकि विपक्ष ने कार्रवाई में जाति भेदभाव का आरोप लगाया

बिहार में पिछले कुछ दिनों में जमुई, समस्तीपुर और बांका से लड़कियों के साथ बदसलूकी के वीडियो सामने आए. तीनों घटनाएं अलग हैं, लेकिन इनके बाद शुरू हुई राजनीति में एक बात समान है—अपराध से ज्यादा चर्चा आरोपियों की जाति को लेकर हो रही है. सवाल यही है कि जब कानून के लिए आरोपी की पहचान उसका अपराध है, तो राजनीति में उसकी जाति इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई?

पहले तीनों मामला समझिए

  1. जमुई की घटना सबसे पहले सामने आई. 19 सितंबर को एक नाबालिग लड़की और उसके साथ मौजूद लड़के को कुछ युवकों ने रोका और उनके साथ बदसलूकी की. पूरी घटना का वीडियो बनाया गया, जो बाद में वायरल हुआ. पुलिस ने मामला दर्ज किया, कई आरोपियों को पकड़ा और मुख्य आरोपी नंदन यादव को गिरफ्तार किया. पुलिस के मुताबिक उसे पकड़ने के दौरान गोली लगी. इस मामले में SIT भी बनाई गई.मगर, जमुई की घटना के बाद राजनीति तेज हो गई. विपक्ष ने कानून-व्यवस्था पर सरकार को घेरा. इसी दौरान आरोपियों की जाति को लेकर भी बयान आने लगे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती और घटना को जाति का रंग नहीं दिया जाना चाहिए. दूसरी तरफ विपक्ष की तरफ से सवाल उठे कि क्या कार्रवाई में भी जाति देखी जा रही है.
  2. इसके बाद समस्तीपुर का मामला सामने आया. यहां एक लड़की को सड़क पर कुछ युवकों ने घेर लिया और उसके साथ बदसलूकी की. वीडियो में लड़की को खींचते और उसके साथ गाली-गलौज करते हुए देखा गया. पुलिस ने वीडियो के आधार पर मामला दर्ज किया और चार लोगों को गिरफ्तार किया. यानी समस्तीपुर का मामला जमुई से अलग था, लेकिन दोनों घटनाओं में वीडियो सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई तेज हुई. मगर, समस्तीपुर की घटना के बाद भी राजनीति में जाति का सवाल उठा. तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि आरोपियों की पहचान और जाति को लेकर अलग-अलग तरीके से बातें की जा रही हैं. उन्होंने पुलिस और सरकार पर सवाल उठाए. दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के नेताओं ने विपक्ष पर घटना को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया.
  3. फिर बांका का मामला सामने आया. यहां मामला मंदार पर्वत का है. पुलिस के मुताबिक, वीडियो जून में हुई घटना का है, लेकिन सितंबर में वायरल होने के बाद मामला सामने आया. वीडियो में एक लड़की के साथ कुछ युवकों द्वारा बदसलूकी और मारपीट दिखाई देती है. तीनों घटनाओं का फर्क इसलिए समझना जरूरी है, क्योंकि इन्हें एक ही तरह की घटना बताना सही नहीं होगा. 

जमुई में नाबालिग लड़की और उसके साथ मौजूद लड़के को रोककर बदसलूकी का मामला है. समस्तीपुर में सड़क पर एक लड़की से बदसलूकी का वीडियो सामने आया. बांका में मंदार पर्वत की पुरानी घटना का वीडियो बाद में वायरल हुआ. पुलिस की कार्रवाई और कानूनी स्थिति भी तीनों मामलों में अलग है.

लेकिन राजनीतिक बहस में तीनों घटनाएं अब एक साथ जुड़ गईं हैं. और यहां सबसे बड़ा सवाल अपराध से ज्यादा जाति का है. मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा के एक बयान ने इस बहस को और बढ़ा दिया. उन्होंने यादव जाति को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिस पर विवाद हुआ. बाद में उन्होंने अपनी बात को दूसरे तरीके से समझाने की कोशिश की. वहीं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कहा कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती. विपक्ष के नेताओं ने सवाल उठाया कि अपराध के मामलों में जाति की चर्चा क्यों हो रही है. तेजस्वी यादव ने बांका की घटना पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या सजा तय करते समय जाति देखी जाएगी.

चुनाव की तरह अपराध पर भी भारी जाति?

बिहार में जाति चुनावी राजनीति का बड़ा हिस्सा है. हर दल अपने सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखता है. लेकिन अपराध के मामले में भी अगर यही हिसाब दिखने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है. क्या राजनीतिक दल अपराधी को पहले अपराधी मान रहे हैं या पहले यह देख रहे हैं कि वह किस जाति से आता है? 

आम लोगों के लिए सवाल इससे ज्यादा सीधा है. लड़की के साथ क्या हुआ? आरोपी कौन हैं? पुलिस ने क्या किया? जांच कितनी आगे बढ़ी? और पीड़ित को न्याय कब मिलेगा? राजनीति में आरोप और जवाब चलते रहेंगे. लेकिन अपराध को जाति के चश्मे से देखने से असली मुद्दा पीछे जा सकता है. जमुई, समस्तीपुर और बांका की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं. अब राजनीतिक दलों के सामने भी यही सवाल है—क्या वे अपराध पर बात करेंगे या अपराधी की जाति पर?

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