देश की 65 फीसदी आबादी गांवों में रहती है और इन 97-98 करोड़ में से 76.6 फीसदी यानी कि करीब 75 करोड़ लोगों की खपत बढ़ी है. जाहिर है कि खर्च भी बढ़ा है. NABARD का रुरल इकोनॉमिक कंडीशंस एंड सेंटिमेंट सर्वे ये भी बताता है कि 39.6 फीसदी ग्रामीण परिवारों की आय खूब बढ़ी है, जबकि 20.6 फीसदी परिवारों की सेविंग बढ़ी है.
रिसर्च के क्रम में मिली IBEF यानी इंडिया ब्रैंड इक्विटी फाउंडेशन की एक दूसरी रिपोर्ट कहती है कि गांव का कंज्यूमर अब सिर्फ लो-प्राइस प्रॉडक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रीमियम कैटेगरी में भी उसकी खरीदारी बढ़ रही है.
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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) गांव की इसी ताकत को ही तो समझने की बात करती हैं. वो जब कॉरपोरेट जगत से ये कहती हैं कि सिर्फ अर्बन एलीट (Urban Elite) यानी औपचारिक शहरी अभिजात्य वर्ग यानी को ध्यान में रखकर प्रोडक्ट और बिजनेस स्ट्रैटेजी न बनाएं, तो ये कोई अंदाजा-अनुमान या खयाली बात नहीं.
ये महत्वपूर्ण है कि देश की कंज्प्शन स्टोरी यानी खपत की कहानी सिर्फ बड़े शहरों में नहीं लिखी जा रही, बल्कि गांव भी धीरे-धीरे बड़ा कंज्यूमर मार्केट बन रहा है.
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पहले वित्त मंत्री का ये बयान पढ़ें
देश का कंजप्शन बेस जो है, वो खेती, ग्रामीण कार्यों, ट्रांसपोर्ट और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले परिवारों पर टिका है. अगर कंपनियां सिर्फ शहरी ग्राहकों के लिए प्रीमियमीकरण पर ध्यान देंगी तो ग्रोथ की मजबूती पर असर हो सकता है.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के 53वें नेशनल मैनेजमेंट कन्वेंशन में)
ये सवाल बड़ा है और इस सवाल का दायरा भी कि वित्त मंत्री ने गांव की ओर देखने को क्यों कहा?
क्या वाकई गांव की जेब में इतनी ताकत आ गई है कि जो कंपनियों की बिजनेस स्ट्रैटेजी बदल सकती है?
आंकड़ों से जो तस्वीर बनती है, वो काफी दिलचस्प लगती है.
गांव में खर्च बढ़ा और शहर से तेज बढ़ा भारत के पास ग्रामीण-शहरी खपत का सबसे व्यापक और तुलनीय आंकड़ा HCEC यानी हाउसहोल्ड कंजप्शन एक्सपेंडिचर सर्वे से आता है. अब तक उपलब्ध आंकड़ा 2023-24 का है. HCEC के मुताबिक, ग्रामीण भारत में मंथली पर कैपिटा कंजप्शन एक्सपेंडिचर (MPCE) यानी औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च 4,122 रुपये रहा. हालांकि शहरों में ये 6,996 रुपये था.
यानी गांव अभी भी शहर से कम खर्च करता है. लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा ज्यादा दिलचस्प है. आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए पॉलिसी एक्सपर्ट और लेखक प्रभात सिन्हा कहते हैं कि देश में अगली खपत क्रांति केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि गांवों और छोटे कस्बों से आने वाली है. इसे गांवों में बढ़ती आय और बदलती आकांक्षाओं का परिणाम कहा जा सकता है.
HCEC के आंकड़े दिखाते हैं कि साल 2023-24 में ग्रामीण MPCE एक साल पहले के मुकाबले करीब 9% बढ़ा, जबकि शहरी MPCE करीब 8% बढ़ा.
साल 2011-12 में ग्रामीण MPCE 1,430 रुपये था, जो 2023-24 में 4,122 रुपये हो गया. इसी अवधि में शहरी MPCE 2,630 रुपये से बढ़कर 6,996 रुपये हुआ. ग्रोथ के पैमाने पर देखें तो 12 साल में ग्रामीण खपत में 188.25% ग्रोथ हुई, जबकि शहरों में ग्रोथ 166.01% हुई.
साथ ही शहरों और गांवों के बीच गैप (Urban-Rural MPCE gap) 2011-12 के 84% से घटकर 2023-24 में 70% रह गया.
यानी भले ही गांव अभी शहर से आगे नहीं निकला है, लेकिन खपत की ग्रोथ तेजी से हो रही है.
गांव की खपत में सिर्फ खाना नहीं, बाकी चीजों की हिस्सेदारी भी बड़ी ग्रामीण भारत में कंजप्शन का एक और बदलाव महत्वपूर्ण है. 2023-24 में ग्रामीण परिवारों के कुल MPCE में फूड की हिस्सेदारी 47.04% थी, जबकि नॉन-फूड खर्च की हिस्सेदारी 52.96% थी.
यानी ग्रामीण परिवार अपनी कुल खपत का आधे से ज्यादा हिस्सा भोजन के अलावा दूसरी चीजों और सेवाओं पर खर्च कर रहा है. शहरों में नॉन-फूड की हिस्सेदारी 60.32% थी.
इसमें कपड़े, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, घरेलू सामान, पर्सनल केयर, कम्यूनिकेशन जैसी कई जरूरतें शामिल हैं.
यहां पर आप वित्त मंत्री की सलाह का बिजनेस कनेक्शन समझ सकते हैं. गांव का ग्राहक सिर्फ जरूरी खाद्य सामान खरीदने वाला ग्राहक नहीं है. उसकी कंजप्शन बास्केट में अब नॉन-फूड खर्च की भी बड़ी जगह है.
FMCG में सबसे साफ दिखती है गांव की ताकत अगर ये देखना हो कि ग्रामीण ग्राहक बाजार में कितना सक्रिय है, तो FMCG सेक्टर सबसे साफ तस्वीर देता है. ग्रामीण vs शहरी आंकड़ा की तुलन वाला डेटा RBI की अप्रैल 2026 मॉनेटरी पॉलिसी रिपोर्ट (MPC Report) में मिला, जो कि NielsenIQ डेटा का है.
रिपोर्ट कहती है कि Q3 FY26 में ग्रामीण FMCG वॉल्यूम ग्रोथ 7.7% रही, जबकि शहरी FMCG वॉल्यूम ग्रोथ 4.0% रही. यानी एक तिमाही में ग्रामीण FMCG वॉल्यूम ग्रोथ शहरों की करीब दोगुनी थी.
यहां एक बात समझना जरूरी है. ग्रामीण FMCG की मजबूत ग्रोथ का मतलब ये नहीं कि गांव में हर तरह का सामान शहर से ज्यादा बिक रहा है. इसका मतलब है कि ग्रामीण FMCG बाजार में वॉल्यूम की ग्रोथ रफ्तार ज्यादा रही.
और 2026 की तस्वीर को सिर्फ एक नंबर से नहीं समझना चाहिए. NIQ के Q2 2026 अपडेट के मुताबिक, FMCG मार्केट में मॉडरेटेड ग्रोथ हुई है, जबकि ग्रामीण और शहरी मार्केट्स के ग्रोथ पैटर्न्स अलग-अलग रहे हैं.
यानी गांवों के सामने भी महंगाई(inflation), कीमत (pricing) और बदलते डिस्ट्रीब्यूशन चैनल्स जैसी चुनौतियां हैं, लेकिन ग्रामीण मांग अभी भी मजबूत है.
यही वजह है कि कंपनियों के लिए गांव का सवाल सिर्फ 'कितना बेचें?' नहीं रह गया है. सवाल ये भी है कि किस कीमत पर बेचें, किस पैक साइज में बेचें और किस डिस्ट्रीब्यूशन चैनल से बेचें.
गाड़ियां खरीदने वाले भी गांव में तेजी से बढ़ रहे गांव की बढ़ती कंजप्शन कैपेसिटी का असर सिर्फ साबुन, बिस्कुट, शैंपू या दूसरे FMCG सामान तक सीमित नहीं है. जुलाई 2026 का ऑटो रिटेल डेटा भी ग्रामीण मांग की मजबूत तस्वीर दिखाता है.
FADA के डेटा के मुताबिक, बात चाहें, बाइक-स्कूटी की हो, या फिर कार, ट्रैक्टर और ट्रक की, गांवों में खरीदार तेजी से बढ़े हैं. पैसेजर व्हीकल (Passenger Vehicle) और कमर्शियल व्हीकल (Commercial Vehicle) दोनों ही सेगमेंट में गांवों (Rural Market) की ग्रोथ शहर से काफी तेज रही. टू-व्हीलर में ये अंतर भले ही कम रहा, लेकिन गांव की ग्रोथ, शहरों से आगे रही.
कमर्शियल व्हीकल की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है कि जुलाई में कुल CV retail sales 99,666 यूनिट रही और सालाना आधार पर 24.04% बढ़ी. Rural CV retail growth 29.37% रही, जबकि Urban growth 19.36%.
अप्रैल से जुलाई 2026 तक हर महीने गांवों में कमर्शियल वाहनों की सेल्स ग्रोथ, शहरों से ज्यादा रही. FADA के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल में रूरल ग्रोथ 20.25% बनाम शहरी ग्रोथ 10.22% रहा. मई में गांव और शहरों का आंकड़ा 8.10% बनाम 2.62%, जून में 21.63% बनाम 12.75% और जुलाई में 29.37% बनाम 19.36% रही.
ये सिर्फ गाड़ी खरीदने की कहानी नहीं है. कमर्शियल वाहनों की मांग ग्रामीण इलाकों में माल ढुलाई, छोटे कारोबार और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से भी जुड़ी होती है.
लेकिन क्या गांव की आय भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है? भारत की कंजप्शन स्टोरी में यहां थोड़ा संतुलन दिखता है. हालांकि लॉन्ग टर्म में देखें तो ग्रामीण परिवारों की आय में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई है. NABARD के NAFIS डेटा के मुताबिक साल 2016-17 से साल 2021-22 के बीच ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आय 8,059 रुपये से बढ़कर 12,698 रुपये हो गई थी. ये आंकड़ा 2021-22 का है, जाहिर है कि 2026 तक ये कमाई और बढ़ी है.
साल 2025 के मुकाबले साल 2026 में कमाई कितनी बढ़ी है, इसका ताजा संकेत NABARD के रुरल इकोनॉमिक कंडीशंस एंड सेंटिमेंट सर्वे से मिलता है. जुलाई 2026 के सर्वे में 27.7% ग्रामीण परिवारों ने कहा कि उनकी आय पिछले साल के मुकाबले बढ़ी है. वहीं 52.6% परिवारों ने कहा कि उनकी आय में कोई बदलाव नहीं हुआ.
यानी 2026 में ग्रामीण आय की ग्रोथ मोमेंटम कमजोर हुई है, लेकिन लंबी अवधि में आय बढ़ी है. और खपत में बढ़त जारी है.
जुलाई 2026 में 74.1% ग्रामीण परिवारों ने कहा कि खपत पर उनका खर्च पिछले साल के मुकाबले बढ़ा है. हालांकि ये मई 2026 के 77.2% से कम है. यानी इनकम प्रभावित होने के बावजूद खपत अभी काफी हद तक मजबूत है.
ये आंकड़ा वित्त मंत्री के संदेश को और दिलचस्प बनाता है. क्योंकि ग्रामीण बाजार में सिर्फ इनकम नहीं, खर्च करने की प्राथमिकता और परिवार की जरूरत भी डिमांड तय करती है.
गांव में कर्ज की पहुंच भी बढ़ी और कर्ज लेने की क्षमता भी ग्रामीण खपत को समझने के लिए क्रेडिट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. वित्त वर्ष 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक यानी RRBs का ग्रॉस लोन आउटस्टैंडिंग 10.3% बढ़कर 5.78 लाख करोड़ रुपये हो गया. FY2024-25 में ये 5.24 लाख करोड़ रुपये था. कमजोर वर्गों को RRBs का कर्ज 3.49 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा.
इसका मतलब ग्रामीण अर्थव्यवस्था में फॉर्मल इंस्टीट्यूशनल क्रेडिट की पहुंच का दायरा बड़ा है. ग्रामीण कर्ज सिर्फ खेती के लिए नहीं, बल्कि ग्रामीण कारोबार और छोटे उद्यमों की जरूरतों से भी जुड़ा है. सरकार के जुलाई 2026 के रुरल-क्रेडिट नोट में भी बताया गया है कि गांव में लोग खेती, खेती से जुड़े काम, ग्रामीण एंटरप्राइजेज और घरेलू बड़ी जरूरतों के लिए कर्ज लेते हैं.
अब यहां ये कहना सही नहीं होगा कि 'गांव ज्यादा कर्ज ले रहा है'. NABARD के जुलाई 2026 सर्वे में एक्सक्लूसिव फॉर्मल बॉरोइंग पर निर्भर ग्रामीण परिवारों की हिस्सेदारी 51% रह गई, जबकि एक्सक्लूसिव फॉर्मल बॉरोइंग 23.6% तक पहुंच गई.
इसलिए ग्रामीण कर्ज की कहानी में एक्सेस बढ़ने के साथ कर्ज की क्वालिटी और सोर्स भी महत्वपूर्ण है.
गांव की कमाई सिर्फ खेती से नहीं... यही शायद वित्त मंत्री के बयान का सबसे अहम हिस्सा है.
ग्रामीण भारत को सिर्फ किसान और खेती के चश्मे से देखना अब पर्याप्त नहीं है. गांव की इकोनॉमी में खेती के साथ कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट, छोटे कारोबार, सविसेज और असंगठित क्षेत्र का बड़ा योगदान है. शहरों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की कमाई और घर भेजे जाने वाले पैसे भी कई ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति का हिस्सा हैं.
हालांकि घरेलू प्रवासी मजदूर (domestic migrant workers) शहरों से जो पैसे गांव भेजते हैं, उसका आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन ऐसा माना जा सकता है कि वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा अपने गांव-घर बेचते हैं, जो गांव की कंजप्शन स्टोरी का हिस्सा बनता है.
अब समझिए वित्त मंत्री का 'गांव वाला' मंत्र पूरी तस्वीर को एक साथ रखें तो कहानी और ज्यादा साफ हो जाती है.
एक ओर: ग्रामीण MPCE अब 4,122 रुपये से ज्यादा पहुंच गया है, ग्रोथ तेज है और शहरी-ग्रामीण खपत का अंतर कम हुआ है. दूसरी ओर: FMCG में तुलनात्मक डेटा में में ग्रामीण वॉल्यूम ग्रोथ, शहर से तेज रही है. तीसरी ओर: वाहनों की बात करें तो बड़े-टिकट सेगमेंट में भी रुरल ग्रोथ, शहर से आगे रही है. चौथी ओर: ग्रामीण बैंकों की लोन आउटस्टैंडिंग 5.78 लाख करोड़ के पार पहुंच गई है. लेकिन पांचवीं तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि 2026 में सिर्फ 27.7% ग्रामीण परिवारों ने अपनी आय बढ़ने की बात कही. यानी ग्रामीण बाजार बढ़ रहा है, लेकिन उसकी परचेजिंग पावर को हमेशा तेज और एकसमान बढ़ती हुई मान लेना सही नहीं होगा.
यही वजह है कि वित्त मंत्री का संदेश सिर्फ 'गांव में ज्यादा बेचिए' नहीं है. असल संदेश है- कंपनियां ये समझें कि ग्रामीण ग्राहक क्या चाहता है, कितना खर्च कर सकता है, किस कीमत पर खरीदना चाहता है, किस पैक साइज में खरीदता है, उसके गांव तक प्रॉडक्ट्स पहुंचेगा कैसे और एक बात और कि गांव के ग्राहकों को कर्ज या फाइनेंसिंग की जरूरत है या नहीं.
कुल मिलाकर बात ये है कि भारत की कंजप्शन स्टोरी में शहरों की भूमिका बड़ी रहेगी, लेकिन आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि गांव को सिर्फ भारत का पिछड़ा बाजार मानकर चलना अब पूरी तस्वीर नहीं है.
ग्रामीण भारत एक ऐसा बाजार बन चुका है जहां खपत बढ़ी है, कई कैटगरीज में डिमांड तेज हुई है और क्रेडिट की पहुंच बढ़ी है, लेकिन इनकम ग्रोथ और अफॉर्डिबिलिटी को लेकर चुनौतियां भी बनी हुई हैं.
यही वो संतुलित तस्वीर है, जिसके बीच वित्त मंत्री ने कॉरपोरेट जगत से ये बात कही कि- गांव को समझिए, गांव की जरूरत के हिसाब से प्रोडक्ट और बिजनेस प्लान बनाइए.
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