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बिहार कैबिनेट... उत्तर से दक्षिण तक NDA ने साधा समीकरण, जानें किस क्षेत्र का रहा दबदबा

सीमांचल क्षेत्र से दिलीप जायसवाल और लेसी सिंह का कद बरकरार रखा गया है. पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया वाले इस इलाके में एनडीए ने नए प्रयोग के बजाय पुराने और मजबूत चेहरों पर भरोसा जताया है.

बिहार कैबिनेट... उत्तर से दक्षिण तक NDA ने साधा समीकरण, जानें किस क्षेत्र का रहा दबदबा
  • बिहार की नई कैबिनेट में एनडीए ने क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए व्यापक प्रतिनिधित्व दिया है.
  • मिथिलांचल को सबसे ज्यादा महत्व देते हुए नीतीश मिश्रा, अरुण शंकर और श्वेता गुप्ता को मंत्री बनाया गया है.
  • सीमांचल में पुराने नेताओं दिलीप जायसवाल और लेसी सिंह को शामिल कर पिछड़ा वोट बैंक का संतुलन बनाया गया है.
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पटना:

बिहार में मुख्यमंत्री की नई कैबिनेट का विस्तार सिर्फ मंत्रियों के शपथ ग्रहण तक सीमित नहीं है. मंत्रिमंडल विस्तार में एनडीए ने साफ तौर पर क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है. नई टीम को देखें तो उत्तर बिहार से लेकर दक्षिण बिहार तक लगभग हर बड़े राजनीतिक क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति दिखाई देती है. हालांकि, कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां अपेक्षा के मुताबिक हिस्सेदारी नहीं दिखी. यही वजह है कि अब चर्चा इस बात की हो रही है कि किस क्षेत्र का दबदबा सबसे ज्यादा रहा और कौन सा इलाका अपेक्षाकृत कमजोर साबित हुआ.

मिथिलांचल को सबसे ज्यादा तवज्जो

नई कैबिनेट में सबसे ज्यादा चर्चा मिथिलांचल की हिस्सेदारी को लेकर है. मिथिला क्षेत्र से नीतीश मिश्रा, अरुण शंकर और श्वेता गुप्ता जैसे नेताओं को जगह देकर एनडीए ने साफ संकेत दिया है कि यह इलाका चुनावी रणनीति के केंद्र में है. राजनीतिक तौर पर इसे ब्राह्मण, वैश्य और शहरी वोट बैंक को साधने की कोशिश माना जा रहा है. लंबे समय बाद मिथिलांचल का प्रभाव सरकार में इतना मजबूत दिखाई दे रहा है.

सीमांचल में पुराने चेहरों पर भरोसा

सीमांचल क्षेत्र से दिलीप जायसवाल और लेसी सिंह का कद बरकरार रखा गया है. पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया वाले इस इलाके में एनडीए ने नए प्रयोग के बजाय पुराने और मजबूत चेहरों पर भरोसा जताया है. सीमांचल में मुस्लिम और पिछड़ा राजनीति हमेशा अहम रही है. ऐसे में यहां संतुलन बनाए रखने की कोशिश साफ नजर आती है.

कोसी-अंग क्षेत्र में अति पिछड़ा कार्ड

कोसी और अंग क्षेत्र से बुलो मंडल की एंट्री को बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है. एनडीए ने इस इलाके में अति पिछड़ा वोट बैंक को साधने के लिए खास रणनीति अपनाई है. मल्लाह, धानुक, कानू और तेली समाज को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश हुई है. मधेपुरा और आसपास के इलाकों में इसका सीधा राजनीतिक असर देखने को मिल सकता है.

शाहाबाद में मजबूत मौजूदगी

शाहाबाद क्षेत्र से इस बार अच्छी हिस्सेदारी दिखाई दी है. संजय टाइगर, जमा खान और भगवान सिंह कुशवाहा के जरिए सत्ता में हिस्सेदारी मिली है. शाहाबाद क्षेत्र में बक्सर, भोजपुर, रोहतास और कैमूर जैसे जिले आते हैं. इस इलाके में राजपूत, मुस्लिम और ओबीसी राजनीति का प्रभाव हमेशा मजबूत रहा है. ऐसे में एनडीए ने यहां संतुलन साधने की कोशिश की है.

सारण क्षेत्र को भी मिला प्रतिनिधित्व

सारण प्रमंडल से सुनील कुमार और मिथिलेश तिवारी जैसे नेताओं को मंत्री बनाया गया है. छपरा, गोपालगंज और सिवान वाले इस इलाके में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक सारण क्षेत्र में मजबूत प्रतिनिधित्व देकर एनडीए ने ब्राह्मण और पिछड़े वोट बैंक को साधने का प्रयास किया है.

मगध में संतोष सुमन के जरिए संतुलन

मगध क्षेत्र से संतोष सुमन को फिर से जगह देकर एनडीए ने दलित और महादलित वोट बैंक को साधने की कोशिश की है. गया और आसपास के इलाकों में जीतन राम मांझी की राजनीतिक पकड़ को देखते हुए यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है.

तिरहुत और चंपारण पर भी फोकस

पश्चिमी चंपारण से नन्द किशोर राम की एंट्री और तिरहुत क्षेत्र से जुड़े चेहरों को जगह देकर एनडीए ने उत्तर बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने का संकेत दिया है. सीतामढ़ी, शिवहर और चंपारण इलाके में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ी है. ऐसे में यहां प्रतिनिधित्व बढ़ाना चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

कौन सा क्षेत्र दिखा अपेक्षाकृत कमजोर?

नई कैबिनेट में लगभग हर बड़े क्षेत्र को प्रतिनिधित्व मिला है, लेकिन कुछ इलाके ऐसे हैं जहां उम्मीद के मुताबिक बड़ा राजनीतिक चेहरा सामने नहीं आया.

पटना शहरी क्षेत्र

राजधानी पटना का राजनीतिक प्रभाव हमेशा अहम माना जाता है, लेकिन इस विस्तार में पटना शहर आधारित कोई बड़ा नया चेहरा उभरकर सामने नहीं आया.

दक्षिण-पूर्व बिहार

मुंगेर जैसे इलाकों को इस बार सीमित प्रतिनिधित्व मिला. हालांकि, सम्राट चौधरी खुद इसी क्षेत्र से आते हैं. इसके बावजूद इन इलाकों में राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है कि उनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही.

मिथिलांचल, सीमांचल और कोसी को ज्यादा तवज्जो देकर उत्तर बिहार पर खास फोकस किया गया है. वहीं शाहाबाद, सारण और मगध के जरिए दक्षिण और मध्य बिहार को संतुलित रखने की कोशिश हुई है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह क्षेत्रीय संतुलन आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एनडीए को कितना राजनीतिक फायदा दिलाता है.

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