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Bihar: तपती गर्मी में बूंद-बूंद पानी को तरस रहे 45 घरों की जिंदगियां, 1 दशक बाद भी नहीं पहुंची नल-जल योजना

​ग्रामीणों का कहना है कि वे इस मृतप्राय नल-जल योजना को दोबारा चालू कराने के लिए स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर जिला स्तरीय आला अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं.

Bihar: तपती गर्मी में बूंद-बूंद पानी को तरस रहे 45 घरों की जिंदगियां, 1 दशक बाद भी नहीं पहुंची नल-जल योजना
एक नल पर आश्रित 45 परिवार
Bihar News:

बिहार में 'हर घर नल का जल योजना' पूर्व सीएम नीतीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजना है. लेकिन इस योजना के एक दशक पूरे होने के बाद भी बिहार में कई जिले और सैकड़ों गांव है, जहां सरकारी पैसे से बोरिंग हो गई और कार्यालय भी बन गए, लेकिन नल-जल योजना का एक बूंद पानी परिवारों के पास नहीं पहुंच पाया है. सरकार भले ही इस योजना का ढिंढोरा पीट रही है. लेकिन इसकी सच्चाई जहानाबाद के कोको प्रखंड अंतर्गत सैदाबाद पंचायत के भत्तन बीघा गांव के 45 परिवार बयां कर रहे हैं. भत्तन बीघा के ग्रामीणों के लिए सरकार का यह ड्रीम प्रोजेक्ट पिछले एक दशक से महज़ एक अधूरा ख्वाब साबित हो रहा है.

ग्रामीणों की बेबसी का मज़ाक उड़ा रहे बंद बोरिंग

भत्तन बीघा गांव में दस साल पहले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 'हर घर नल का जल योजना' के तहत बड़े ही तामझाम के साथ बोरिंग कराई गई थी. पानी की सुचारु सप्लाई के लिए एक सरकारी भवन का निर्माण भी हुआ. लेकिन विडंबना देखिए कि अपनी स्थापना काल से लेकर आज तक, यानी पूरा एक दशक बीत जाने के बाद भी इस योजना से किसी भी ग्रामीण के घर तक एक बूंद पानी नहीं पहुंच सका. आज यह बंद पड़ी बोरिंग और जर्जर होता भवन ग्रामीणों की बेबसी का मज़ाक उड़ा रहे हैं और उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं.

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एक सरकारी चापाकल से 45 घरों की बूझती है प्यास

​इस भीषण गर्मी में जब आसमान से आग बरस रही है, बदन झुलसा देने वाली धूप और लू के थपेड़ों से लोगों के हलक सूख रहे हैं. तब प्यास की शिद्दत क्या होती है, यह भत्तन बीघा के लोगों के चेहरों पर साफ देखा जा सकता है. 45 घरों की इस बस्ती के लोगों की प्यास बुझाने के लिए पूरे गांव में महज़ एकमात्र सरकारी चापाकल चालू स्थिति में है. सुबह होते ही इस चापाकल पर पानी भरने के लिए महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है. पानी लेने की इसी आपाधापी में हर रोज महिलाओं के बीच गाली-गलौज और सिर-फुटौवल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

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गर्मी में बूंद-बूंद को तरस रहे ग्रामीण

​ग्रामीणों का कहना है कि वे इस मृतप्राय नल-जल योजना को दोबारा चालू कराने के लिए स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों से लेकर जिला स्तरीय आला अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके हैं. हर बार उन्हें सिर्फ कोरा आश्वासन मिला, लेकिन धरातल पर नतीजा हमेशा ढाक के तीन पात ही रहा. अधिकारियों की इसी घोर उदासीनता का नतीजा है कि आज पूरा गांव इस जानलेवा गर्मी में पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहा है. ग्रामीणों ने यह भी बताया कि मात्र एक चापाकल के सहारे ग्रामीण अपने प्यास बुझाने को मजबूर हैं. ऊपर से पानी का लेयर भी नीचे भाग रहा है जिससे चापाकल भी पानी कम दे रहा है.

जिलाधिकारी से सवाल पूछने पर मिला आश्वासन

इधर ​जब इस गंभीर संकट को लेकर जिलाधिकारी अलंकृता पांडेय से सीधा सवाल किया गया, तो उन्होंने मामले की गंभीरता को समझा. जिलाधिकारी ने कहा यह मामला मीडिया के माध्यम से मेरे संज्ञान में आया है. भत्तन बीघा गांव में नल-जल योजना क्यों ठप है, इसकी जांच के लिए कल ही एक विशेष टीम भेजकर जांच कराई जाएगी और नल जल योजना को जल्द से जल्द ठीक कराया जाएगा. 

​बहरहाल, जिलाधिकारी के आश्वासन के बाद ग्रामीणों में पानी की आस तो जगी है, लेकिन सवाल अब भी बरकरार है कि दस सालों तक जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे को सफेद हाथी बनाकर रखने वाले दोषी इंजीनियरों और ठेकेदारों पर कार्रवाई कब होगी? क्या जिलाधिकारी की इस मुस्तैदी के बाद भत्तन बीघा के लोगों की प्यास बुझ पाएगी, या कागजी विकास का यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा? यह देखना बाकी है.

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Mukesh Kumar
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