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This Article is From Oct 04, 2025

वंदे भारत एक्सप्रेस हादसा: परिवार की खुशी के लिए खुद को मखाना भट्टियों में झोंका , सपने रहे अधूरे ,रेल-पटरी पर समाप्त हुई जीवन -यात्रा

मृतकों के परिजनों के अनुसार सभी किशोर एक मखाना फोड़ी सेंटर में 5 हजार प्रतिमाह की दर से काम कर रहे थे.

वंदे भारत एक्सप्रेस हादसा: परिवार की खुशी के लिए खुद को मखाना भट्टियों में झोंका , सपने रहे अधूरे ,रेल-पटरी पर समाप्त हुई जीवन -यात्रा

बिहार से बड़े रेल हादसे की खबर सामने आई है. शुक्रवार की सुबह जोगबनी- कटिहार रेल खंड पर जब जोगबनी-दानापुर वंदे भारत एक्सप्रेस अंधेरे को चीरते हुए कसबा थाना क्षेत्र के जवनपुर गुमटी के पास से गुजर रही थी तो पटरी के सहारे चल रहे चार किशोरों को यह पता नही था कि कुछ ही क्षणों में उनकी यह यात्रा अंतिम यात्रा साबित होगी. वहीं, एक अन्य किशोर हादसे में गंभीर रूप से जख्मी हो गया. सभी मृतक बनमनखी प्रखंड के चांदपुर भंगहा के निवासी थे. रात में कसबा, मदारघाट दुर्गा पूजा मेला देखने आए थे. 

मृतकों में बनमनखी प्रखण्ड के चांदपुर भंगहा के ठाकुरपट्टी निवासी ब्रह्मदेव ऋषि का बेटा सुंदर कुमार (15), राजेश ऋषि पुत्र जिगर कुमार (14), स्व. अनमोल ऋषि का पुत्र सिंटू (15) और चांदपुर पोखर टोला निवासी राधेश्याम ऋषि कापुत्र रोहित कुमार(16) शामिल हैं. जख्मी में चांदपुर तिलक निवासी हरिनंदन ऋषि का पुत्र कुलदीप कुमार(14) शामिल है, जिसका इलाज मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चल रहा है.

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परिवार की जरूरतों को पूरा करने को खुद को मखाना भट्ठी में झोंका

मखाना जितना स्याह सफेद होता है,उसकी दुनिया उतनी ही काली होती है. इसको बनाने की प्रक्रिया जटिल ही नही कठिन भी होती है. 50 से 60 डिग्री सेल्सियस तापमान पर आकर मखाना मूर्त रूप ग्रहण करता है. जुलाई-अगस्त महीने की भीषण गर्मी के बीच इस तापमान वाली चूल्हे की भट्ठी में मखाना मजदूरों को खुद को जलाना पड़ता है. इस उद्योग की विडंबना है कि यहां किशोर और मासूम भी आपको मखाना-फोड़ी(मखाना तैयार करने की जगह) के काम मे हाथ बटाते नजर आएंगे. जिन चार किशोरों की मौत हुई, वे सभी मखाना मजदूर ही थे जो मुफस्सिल थाना क्षेत्र में एक मखाना फोड़ी में कार्यरत थे. शायद यही वजह रही कि पटरी पर चारो किशोर के क्षत-विक्षत शव के साथ -साथ कुछ खिलोने के छोटे-छोटे तिनके भी बिखरे हुए थे, जो उन्होंने मेले में खरीदे थे.

सिंटू को पिता के कर्ज उतारने थे तो सुंदर को बनाना था अपना आशियाना

सीमांचल के इलाके में गरीबी और बदहाली का स्थायी बसेरा रहा है. खासकर महादलित समुदाय, जिससे इन मृतकों का सम्बंध था, आर्थिक रूप से हाशिये पर है. सच यही है कि यहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह दिल्ली, पंजाब, हरियाणा से लेकर लेह-लद्दाख तक पसीना बहा रहे मजदूरों की मजदूरी पर टिकी हुई है. हाल के दिनों में मखाना उद्योग भी रोजगार का बेहतर विकल्प साबित हो रहा है, जहां मासूमो और किशोरों को भी आसानी से काम मिल जाते हैं. सिंटू के पिता का जब असामयिक निधन हो गया तो उसके सर पर बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी. पिता के ऊपर कुछ कर्ज भी थे, लिहाजा सिंटू ने मखाना फोड़ी का रुख किया. लेकिन, सपने अधूरे रह गए और परिवार एक ऐसी त्रासदी का शिकार हुआ, जिसके जख्म शायद परिवार के लिए हमेशा नासूर बना रहे. सुंदर की दिली ख्वाहिश थी कि उसकी टूटी झोपड़ी थोड़ी अच्छी हो जाए. इसी ख्वाहिश ने उसे मखाना-फोड़ी तक पहुंचाया लेकिन उसकी यह यात्रा रेल-पटरी पर समाप्त हो गई.

'कहलो रहे अइबे दीपावली में घर, घरे अन्हार कर देल्हो'

शुक्रवार की शाम जब चारों मृतक के शव चांदपुर भंगहा, ठाकुर पट्टी पहुंचे तो परिजनों के चीत्कार से मौजूद हर आंखे नम हो गई. ढांढ़स बंधाने वाले भी फूट-फूट कर रो रहे थे. मृतक जिगर और रोहित की मां विलाप करते हुए कह रही थी, 'हे हो बाबू! कहलो रहे दिपावली में घर ऐबो, अब त सब दिन के लिए घर अन्हार भय गेले'(बाबू, तुम तो बोले थे कि दीपावली में घर आएंगे.लेकिन अब तो घर मे सब दिन के लिए अंधेरा हो गया .). जब घर का चिराग ही असमय बुझ जाए तो हमेशा के लिए अंधेरा छाना स्वाभाविक है. ग्रामीणों ने बताया कि चारों मृतक और घायल किशोर ने कहाल था कि वे इस बार दशहरा में नही दीपावली में घर आएंगे. लेकिन, घरवालों से किया वादा भी मुकम्मल होने से पहले पटरी पर दम तोड़ दिया.

परिजनों ने मखाना फोड़ी ठेकेदार पर लगाये गंभीर आरोप

मृतकों के परिजनों के अनुसार सभी किशोर को बेनीपुर ,दरभंगा निवासी ठेकेदार अमर कुमार द्वारा  मुफस्सिल थाना क्षेत्र के सपनी स्थित एक मखाना फोड़ी सेंटर में 5 हजार प्रतिमाह की दर से काम कर रहे थे.मृतक रोहित के पिता का आरोप है कि ठेकेदार बच्चों को अक्सर प्रताड़ित किया करता था. उनका मानना है कि, प्रताड़ना की वजह से ही बच्चे मखाना -फोड़ी से भागे और अब बचने के लिए सड़क मार्ग की जगह रेल-पथ को चुना और फिर यह हादसा हो गया. सच चाहे जो भी हो पर मुफलिसी और मजबूरी की पटरी पर आगे भी कई जिंदगियां जमींदोज होती रहेंगी और यह सिलसिला अंतहीन है.

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