प्रतीकात्मक फोटो.
पटना:
क्या बिहार में सीटों के बंटवारे की विधिवत घोषणा में विलम्ब का कारण एनडीए नेताओं को उपेन्द्र कुशवाहा के राजद के साथ जाने का इंतजार है?
बिहार में जनता दल यूनाइटेड, भाजपा और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति के बीच अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के तालमेल पर बातचीत पूरी हो चुकी है. हालांकि सीटों की संख्या के बारे में किसी दल का नेता खुलकर नहीं बोल रहा. लेकिन इसके बारे में पहली बार जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में खुलकर संकेत दिया.
नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी के करीब 260 नेताओं के सामने बोला था कि मेरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से बात हो चुकी है सीटों का बंटवारा हो चुका है. सीटों की संख्या भले नीतीश ने नहीं बताई लेकिन कहा कि सम्मानजनक संख्या है. हालांकि इस बैठक में मजाक करते हुए कहा था कि 'अभी मैं संख्या नहीं बोलूंगा, अलग से उसकी घोषणा होगी. त्यागी जी यहां बैठे हैं इसलिए यहां नहीं बोलूंगा नहीं तो मीडिया को बोल देंगे.'
लेकिन वो चाहे जनता दल यूनाइटेड के नेता हों या भाजपा के, सब मान रहे हैं कि अगर नीतीश बोल रहे हैं तो वे बिना किसी आधार के नहीं बोलेंगे. वे हल्की-फुल्की बात करने वाले नेता नहीं हैं. लेकिन जानकार बताते हैं कि जब भी सीटों को संख्या की घोषणा होगी वे भाजपा जिसके वर्तमान में 22 सांसद हैं और जनता दल यूनाइटेड जिसके दो, उनके बीच एक दो सीटों से ज़्यादा का अंतर नहीं होगा. लेकिन फिलहाल इस घोषणा में अड़चन उपेन्द्र कुशवाहा को लेकर है कि उनका क्या रुख होगा.
बिहार भाजपा के नेता मानकर चल रहे हैं कि अब जब उनके साथ नीतीश कुमार हैं तब उपेन्द्र कुशवाहा राजद के साथ चले भी जाते हैं तो उसका एनडीए के ऊपर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा. इसके पीछे उनका तर्क है बिहार विधानसभा का पिछला चुनाव का परिणाम, जहां इस बात का कोई आधार नहीं दिखा जिससे कुशवाहा वोटरों पर उपेन्द्र की पकड़ दिखे. इसलिए अगर वे चले जाएंगे जिसको लेकर नीतीश और भाजपा दोनो आश्वस्त हैं और चाहते हैं कि इसकी विधिवत घोषणा वे जल्द करें. इसलिए नीतीश ने अपने प्रवक्ताओं को अब उनके बयानों को नोटिस न लेने की सलाह ये कहते हुए दी है कि उनका अगला कदम क्या होगा मुझे अंदाज़ा है.
वहीं कुशवाहा को मालूम है कि वर्तमान एनडीए को उनकी ज़रूरत नहीं रही लेकिन वे जल्दीबाजी में मंत्री पद नहीं छोड़ना चाहते और राजद में दिक्कत है. जिन सीटों पर उपेन्द्र नज़र लगाए हैं वे तेजस्वी यादव के नज़दीकी नेता जैसे आलोक मेहता की पुरानी जीती सीट हैं.
बिहार में जनता दल यूनाइटेड, भाजपा और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति के बीच अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के तालमेल पर बातचीत पूरी हो चुकी है. हालांकि सीटों की संख्या के बारे में किसी दल का नेता खुलकर नहीं बोल रहा. लेकिन इसके बारे में पहली बार जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में खुलकर संकेत दिया.
नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी के करीब 260 नेताओं के सामने बोला था कि मेरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से बात हो चुकी है सीटों का बंटवारा हो चुका है. सीटों की संख्या भले नीतीश ने नहीं बताई लेकिन कहा कि सम्मानजनक संख्या है. हालांकि इस बैठक में मजाक करते हुए कहा था कि 'अभी मैं संख्या नहीं बोलूंगा, अलग से उसकी घोषणा होगी. त्यागी जी यहां बैठे हैं इसलिए यहां नहीं बोलूंगा नहीं तो मीडिया को बोल देंगे.'
लेकिन वो चाहे जनता दल यूनाइटेड के नेता हों या भाजपा के, सब मान रहे हैं कि अगर नीतीश बोल रहे हैं तो वे बिना किसी आधार के नहीं बोलेंगे. वे हल्की-फुल्की बात करने वाले नेता नहीं हैं. लेकिन जानकार बताते हैं कि जब भी सीटों को संख्या की घोषणा होगी वे भाजपा जिसके वर्तमान में 22 सांसद हैं और जनता दल यूनाइटेड जिसके दो, उनके बीच एक दो सीटों से ज़्यादा का अंतर नहीं होगा. लेकिन फिलहाल इस घोषणा में अड़चन उपेन्द्र कुशवाहा को लेकर है कि उनका क्या रुख होगा.
बिहार भाजपा के नेता मानकर चल रहे हैं कि अब जब उनके साथ नीतीश कुमार हैं तब उपेन्द्र कुशवाहा राजद के साथ चले भी जाते हैं तो उसका एनडीए के ऊपर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा. इसके पीछे उनका तर्क है बिहार विधानसभा का पिछला चुनाव का परिणाम, जहां इस बात का कोई आधार नहीं दिखा जिससे कुशवाहा वोटरों पर उपेन्द्र की पकड़ दिखे. इसलिए अगर वे चले जाएंगे जिसको लेकर नीतीश और भाजपा दोनो आश्वस्त हैं और चाहते हैं कि इसकी विधिवत घोषणा वे जल्द करें. इसलिए नीतीश ने अपने प्रवक्ताओं को अब उनके बयानों को नोटिस न लेने की सलाह ये कहते हुए दी है कि उनका अगला कदम क्या होगा मुझे अंदाज़ा है.
वहीं कुशवाहा को मालूम है कि वर्तमान एनडीए को उनकी ज़रूरत नहीं रही लेकिन वे जल्दीबाजी में मंत्री पद नहीं छोड़ना चाहते और राजद में दिक्कत है. जिन सीटों पर उपेन्द्र नज़र लगाए हैं वे तेजस्वी यादव के नज़दीकी नेता जैसे आलोक मेहता की पुरानी जीती सीट हैं.