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बिहार के 20 फीसदी गांवों का खतियान गायब, मुश्किल बढ़ने पर जमीन सर्वे के लिए सरकार लोगों से मांग रही मदद

बिहार में कुल 45,103 गांव हैं. इनमें से 9,334 गांवों के कैडेस्ट्रल खतियान सरकारी रिकॉर्ड रूम में नहीं हैं या पूरी तरह खराब हो चुके हैं.

बिहार के 20 फीसदी गांवों का खतियान गायब, मुश्किल बढ़ने पर जमीन सर्वे के लिए सरकार लोगों से मांग रही मदद
बिहार में लैंड रिकॉर्ड गायब (IANS)
Bihar News:

बिहार में चल रहे जमीन सर्वे के बीच एक बड़ी बात सामने आई है. राज्य के करीब 20 फीसदी गांवों के पुराने खतियान सरकारी रिकॉर्ड में नहीं मिल रहे हैं. कई खतियान पूरी तरह गायब हैं, जबकि कई इतने खराब हो चुके हैं कि उन्हें पढ़ना मुश्किल है. यही वजह है कि अब सरकार को लोगों से मदद मांगनी पड़ रही है. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने लोगों से अपील की है कि जिनके पास पुराने खतियान सुरक्षित हैं, वे कुछ समय के लिए विभाग को दें. विभाग उनकी स्कैनिंग कर डिजिटल कॉपी तैयार करेगा और फिर मूल खतियान वापस कर देगा. सरकार का कहना है कि इससे पुराने रिकॉर्ड को बचाने में मदद मिलेगी और जमीन सर्वे का काम भी आसान होगा.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में कुल 45,103 गांव हैं. इनमें से 9,334 गांवों के कैडेस्ट्रल खतियान सरकारी रिकॉर्ड रूम में नहीं हैं या पूरी तरह खराब हो चुके हैं. यानी राज्य के हर पांच में से एक गांव का मूल जमीन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है. यह संख्या काफी बड़ी मानी जा रही है.

कैडेस्ट्रल खतियान अंग्रेजों के समय तैयार किए गए थे. इनमें यह दर्ज है कि किसके पास कितनी जमीन थी, जमीन की सीमा क्या है और उसका मालिक कौन है. आज भी जमीन के पुराने विवाद सुलझाने में इन्हीं खतियानों की मदद ली जाती है. इसलिए इनका सुरक्षित रहना बहुत जरूरी माना जाता है.

किन जिलों में सबसे ज्यादा परेशानी

सबसे ज्यादा परेशानी उन जिलों में है, जहां हर साल बाढ़ आती है. सहरसा, सुपौल, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, मुजफ्फरपुर और चंपारण के कई इलाकों में पुराने रिकॉर्ड खराब हो गए हैं. माना जा रहा है कि बाढ़, नमी और सही रखरखाव नहीं होने के कारण कई खतियान नष्ट हो गए. बिहार सरकार इस समय पूरे राज्य में विशेष जमीन सर्वे करा रही है. इसका मकसद जमीन का नया और सही रिकॉर्ड तैयार करना है. सरकार चाहती है कि हर जमीन का रिकॉर्ड डिजिटल हो जाए ताकि भविष्य में जमीन खरीदने, बेचने, दाखिल-खारिज कराने और दूसरे सरकारी कामों में परेशानी न हो. सरकार का यह भी कहना है कि इससे जमीन के झगड़े कम होंगे.

लेकिन सवाल यह है कि जब पुराने रिकॉर्ड ही नहीं मिलेंगे तो नया रिकॉर्ड कितना सही बन पाएगा? कई जगह जमीन की सीमा तय करने और असली मालिक की पहचान करने में पुराने खतियान ही सबसे बड़ा आधार होते हैं. ऐसे में इनके बिना सर्वे का काम मुश्किल हो सकता है.

लोगों से मांगा जा रहा खतियान

यही कारण है कि सरकार अब सीधे लोगों के पास पहुंची है. बहुत से परिवारों ने अपने पुराने खतियान वर्षों से संभालकर रखे हैं. विभाग चाहता है कि ऐसे लोग आगे आएं और कुछ समय के लिए अपने दस्तावेज उपलब्ध कराएं. इससे सरकारी रिकॉर्ड फिर से तैयार करने में मदद मिलेगी.

जानकारों का कहना है कि अब केवल लोगों से खतियान लेकर काम नहीं चलेगा. सरकार को अपने रिकॉर्ड रूम भी आधुनिक बनाने होंगे. पुराने दस्तावेजों को सुरक्षित रखने और सभी रिकॉर्ड को जल्द से जल्द डिजिटल बनाने की जरूरत है. तभी भविष्य में ऐसी परेशानी नहीं होगी.

कोर्ट में चल रहे हजारों पुराने जमीन के मामले 

बिहार में जमीन का विवाद कोई नई बात नहीं है. हजारों मामले अदालतों में चल रहे हैं. कई परिवार वर्षों से अपनी जमीन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. अगर जमीन सर्वे सही तरीके से पूरा हो जाता है और सभी रिकॉर्ड ठीक हो जाते हैं तो ऐसे विवाद काफी कम हो सकते हैं. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सर्वे मजबूत और सही रिकॉर्ड के आधार पर हो.

फिलहाल सरकार लोगों से सहयोग की उम्मीद कर रही है. आने वाले दिनों में पता चलेगा कि कितने लोग अपने पुराने खतियान उपलब्ध कराते हैं और इससे जमीन सर्वे को कितनी मदद मिलती है. इतना जरूर है कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि सरकारी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और समय पर डिजिटल बनाना कितना जरूरी है. अगर ऐसा पहले किया गया होता तो आज यह स्थिति शायद नहीं आती.

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