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This Article is From Sep 20, 2018

Exclusive: कैग की जांच में बड़ा खुलासाः बिहार में अपात्र ठेकेदारों को दिया करोड़ों का ठेका

बिहार राज्य भवन निर्माण लिमिटेड की ओर से ठेकों के आवंटन में भारी गड़बड़ी बरती गई. बगैर टेंडर के ठेके बंटे और अपात्रों को मिले.

Exclusive: कैग की जांच में बड़ा खुलासाः बिहार में अपात्र ठेकेदारों को दिया करोड़ों का ठेका
राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड में टेंडर घोटाले पर क्या बिहार के सीएम नीतीश कुमार एक्शन लेंगे?
नई दिल्ली: कहीं बिना टेंडर के तो कहीं अपात्र ठेकेदारों को बिना अनुभव प्रमाणपत्र के ही करोड़ों का काम बांट दिया गया. वहीं कहीं पर आंख मूंदकर तयशुदा धनराशि से करोड़ों की ज्यादा रकम ठेकेदार के खाते में भेज दी गई. निर्माण कार्यों का ठेका देते समय हर नियम-कायदे टूट गए. यह सब हुआ बिहार सरकार के सबसे प्रमुख उपक्रम  बिहार राज्य भवन निर्माण लिमिटेड में. वर्ष 2008 में स्थापित यह सरकारी कंपनी तमाम विभागों के नए भवनों के निर्माण और मरम्मत का काम देखती है. कई वर्षों से बगैर मैनेजिंग डायरेक्टर के चल रही इस कंपनी में अंधेरगर्दी का बड़ा खुलासा सीएजी(कैग) की वर्ष 2017-18 की ऑडिट में हुआ है. NDTV.in के पास मौजूद रिपोर्ट में सीएजी ने कहा है कि ठेके बांटे जाते समय न केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) की गाइडलाइंस का पालन हुआ और न ही राज्य सरकार के वित्तीय नियमों का. बानगी के तौर पर देखें तो कृषि महाविद्यालय किशनगंज के निर्माण में ठेकेदार को तो 3.39 करोड़ का अधिक भुगतान कर दिया गया. जिस अवधि के ठेकों पर कैग ने सवाल उठाए हैं, उस दौरान राज्य के जहां दस महीने तक जीतन राम मांझी सीएम रहे वहीं बाकी समय नीतीश कुमार. 

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बिहार स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड का पटना में मुख्यालय है. यह बिहार सरकार के बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन्स डिपार्टमेंट(BCD)के अधीन आता है. इस सरकारी कंपनी की कुल नौ यूनिटें या यूं कहें नौ पीएसयू  हैं. जिन्हें  वर्ष 2017-18 तक कुल 1754.78.05 करोड़ का काम कराने की जिम्मेदारी मिली थी. देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी कैग ने नौ में से पांच पीएसयू के 1309.05 करोड़ रुपये के 699 कार्यों की नमूना जांच की तो भारी गड़बड़ी का खुलासा हुआ. पता चला कि ऑडिट की अवधि में इस सरकारी कंपनी को 27 विभागों से जुड़े भवनों के निर्माण की जिम्मेदारी मिली थी. 

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टूट गए नियम, बंट गया ठेका

बिहार सरकार के वित्त विभाग की ओर से बनाए नियम के मुताबिक दस लाख से ऊपर के सभी कार्यों का ठेकेदारों को आवंटन सिर्फ और सिर्फ खुले टेंडर से होगा. सीवीसी ने भी जुलाई 2007 में आर्डर जारी कर रखा है, जिसमें 10 लाख से ऊपर के कार्यों का आवंटन पब्लिक टेंडर पॉलिसी से ही करने की व्यवस्था है.  ताकि ठेकों में पारदर्शिता होने से भ्रष्टाचार की समस्या दूर हो. मगर बिहार राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड ने न सीवीसी के नियमों का ख्याल रखा और  न ही अपनी सरकार के वित्त विभाग का.  कैग की जांच में पता चला कि वर्ष नवंबर 2014-दिसंबर 2016  के बीच 19.48 करोड़ के अतिरिक्त कामों को ठेका बगैर किसी टेंडर के एक ही ठेकेदार को दे दिया गया. जबकि उससे पहले इस सरकारी कंपनी ने पांच पीएसयू से जुड़े 278.51 करोड़ के  ठेके जनवरी 2013 अप्रैल 2015 तक बांटे थे. बिना टेंडर के ठेके देने पर जब कैग ने स्पष्टीकरण मांगा तो बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन्स डिपार्टमेंट(बीसीडी) ने नवंबर 2017 में सफाई देते हुए कहा कि इन कार्यों को बीपीडब्ल्यूडी कोड के तहत मंजूरी मिली थी. मगर सीएजी ने इस जवाब को खारिज कर दिया. ये ठेके गोदाम और स्वास्थ्य केंद्रों के अप्रग्रेडेशन, स्कूलों के निर्माण आदि से जुड़े रहे. 
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सीएजी ने वर्ष 2018 की रिपोर्ट नंबर 1 में बिहार के सार्वजनिक उपक्रमों की हालत पर चौंकाने वाला खुलासा किया है.

बिना अनुभव प्रमामपत्र के दिए ठेके

बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन्स डिपार्टमेंट ने मई 2009 में व्यवस्था दी कि ठेकेदारों को उच्चस्तरीय अनुभव प्रमाणपत्र पर ही काम मिलेगा. यह प्रमाणपत्र  कम से कम एक्जीक्यूटिव इंजीनियर या पंजीकृत राष्ट्रीयकृत बैंक या बीमा कंपनी के मूल्यनिर्धारक से जारी होना चाहिए. ऑडिट के दौरान खुलासा हुआ कि अगस्त 2014 से दिसंबर 2015 के बीच राज्य भवन निर्माण लिमिटेड ने 125.66 करोड़ रुपये का टेंडर एक बिल्डर शिव शंकर सिंह कॉट्रैक्ट प्राइवेट लिमिटेड को को दिया, जिनके पास एक प्राइवेट कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर द्वारा जारी अनुभव प्रमाणपत्र था, इस अपात्र प्रमाणपत्र पर ठेका मिल ही नहीं सकता था. शिवशंकर सिंह को 1 लाख 39 हजार मीट्रिक टन क्षमता के 60 गोदाम बनाने के नियम-विपरीत ठेके मिले. दूसरी तरफ इस अपात्र ठेकेदार ने टेंडर तो हथिया लिया मगर जून 2017 तक 60 में से 53 गोदाम का निर्माण भी नहीं पूरा किया.

जबकि सात से 15 महीने की अवधि खत्म हो चुकी थी. कैग ने नोटिस दी तो बीसीडी ने वर्कलोड का बहाना बनाया. इसी तरह जनवरी 2015 में बीएस प्रमोटर्स नामक कॉन्ट्रैक्टर्स को 34.41 करोड़ के ठेके तब मिल गए, जबकि कंपनी के पास क्षमता ही नहीं था. जिन कार्यों का ठेका मिला था, वह दिसंबर 2017 तक नहीं बन सके थे. जबकि काम दिसंबर 2015 में ही आवंटित हो गया था. ऑडिट में पता चला कि 122.16 करोड़ के टेंडर बिना स्थानीय प्रशासन के एनओसी के ही अंतिम रूप दे दिए गए. ऑडिट के दौरान पता चला कि 1045.86 करोड़ के 538 गोदाम और 656.87 करोड़ के 201 स्वास्थ्य केंद्रों के अपग्रेडेशन के लिए कोई टाइम लाइन ही नहीं तय मिली. 

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